16 महाजनपद का समय

16 महाजनपद काल भारतीय इतिहास के बड़े-बड़े राज्यों के विकास का काल था।

आर्य सभ्यता और संस्कृति पूर्व वैदिक काल से उन्नत होती गयी और उत्तरोत्तर उन्नति करते हुए राजनैतिक रूप से अधिक संगठित हो गयी।

प्रारम्भ में आर्यों के राज्य छोटे होते थे इन्हे जन और विश पुकारा जाता था जो धीरे -धीरे विकसित व विस्तारित होकर बड़े राज्यों का रूप लेते गए अब इन्हे महाजनपद पुकारा जाने लगा। महाजनपदों का काल 1000 ई.पू. से 600 ई.पू. के बीच माना जाता है। महाजनपदों का प्रारम्भ इस समय से होने लगा था और 600 ई.पू. आते आते ये पूर्ण रूप से स्थापित हो गए थे। महात्मा बुद्ध के समय से ही मगध और कोशल में काशी को लेकर संघर्ष प्रारम्भ हो गया था।

जब अजातशत्रु 490 ई.पू. में मगध के सिंहासन पर बैठा तब से उसने साम्राज्य वादी नीति का पालन किया और अंत में काशी के साथ वज्जि व मल्ल संघ को अपने राज्य में मिला लिया। कुछ महाजनपदों का अस्तित्व लगभग 325 ई.पू.तक रहा।

16 महाजनपद का सर्वाधिक उल्लेख बौद्ध ग्रन्थ अंगुत्तर निकाय में किया गया है। इसके अतिरिक्त अन्य विभिन्न ग्रंथों में भी महाजनपदों का उल्लेख मिलता है।

जनपदों का उल्लेख मुख्यतया उपनिषदों ,वराहपुराण ,बौद्ध साहित्य और जैन साहित्य में मिलता है।

बौद्ध साहित्य सूत्र –अंगुत्तर निकाय ,विनय पिटक ,जातक साहित्य ,बुद्धचरित ,ललित विस्तार आदि।

जैन साहित्य स्रोत –आचारांग ,नंदी सूत्र ,भगवती सूत्र,पद्मचरित ,परिशिष्ट वर्णन आदि।

आइये जानते हैं 16 प्रमुख महाजनपदों के बारे में –

1.अंग :-

अंग राज्य प्राचीन समय में वर्गीकृत 16 महाजनपदों में से एक है। यह राज्य पूर्वोत्तर बिहार में स्थित था। इस राज्य की राजधानी चंपा थी जहाँ वर्तमान भागलपुर और मुंगेर(बिहार) जिला बसा है। चंपा का प्राचीन नाम मालिनी था।

अंग राज्य अति प्राचीन है महाभारत ग्रन्थ में भी इसका उल्लेख है। दुर्योधन ने कर्ण को अंग देश का राजा बनाया था।

2.मगध :-

यह राज्य दक्षिणी बिहार के आस -पास स्थित था। इसकी राजधानी राजगृह या गिरिव्रज थी।

मगध का अपना एक गौरवशाली इतिहास है। महाभारत काल में यहाँ वृहद्रथ वंश का राज्य था। वृहद्रथ का पुत्र जरासंध हुआ जो एक दिग्विजयी राजा हुआ। श्री कृष्ण ने भीम के हाथों जरासंध का वध करवाया था।

बाद में काफी समय तक मगध का इतिहास अंधकारपूर्ण रहा। अंत में वहां हर्यक वंश का राज्य हुआ जिससे मगध पुनः अपने गौरव को प्राप्त कर सका। मगध में हर्यक वंश ,शिशुनाग वंश ,नन्द वंश और मौर्य वंश ने क्रमशः शासन किया।

543 ई.पू. में बिम्बसार ने हर्यक वंश की स्थापना की। वह महात्मा बुद्ध का शिष्य हुआ फिर उसे बंदी बनाकर उसका पुत्र अजातशत्रु और अजातशत्रु को हटाकर उसका पुत्र उदयन गद्दी पर बैठा जिसने मगध की राजधानी राजगृह से हटाकर पाटलिपुत्र किया।

3.काशी :-

काशी को वाराणसी भी कहा जाता है यह उत्तर प्रदेश के दक्षिण पूर्व में स्थित है। वाराणसी नगरी विश्व की अति प्राचीन नगरियों में से एक है।

काशी हिन्दुओं का सांस्कृतिक स्थल है यह शिक्षा ,शिल्प ,व्यापार के लिए प्रसिद्ध था। काशी का कोशल राज्य से सदैव संघर्ष होता रहता था प्रारम्भ में काशी ने कोशल को दबाया परन्तु बाद में कोशल के राजा प्रसेनजित के समय काशी कोशल का भाग हो गया जिससे कोशल और मगध का संघर्ष शुरू हो गया। अंत में बिम्बसार के समय प्रसेनजित की बहन महाकोशला का विवाह बिम्बसार से हो जाने के कारण काशी मगध को दहेज़ में मिल गया

4 .कोशल :-

यह राज्य प्राचीन अयोध्या राज्य पर ही स्थित था जो प्राचीन अयोध्या के गौरवशाली इतिहास के समाप्त होने के बाद स्थापित हुआ था। इसकी राजधानी श्रावस्ती थी जो उत्तर में राप्ती नदी के किनारे स्थित थी। कोशल का प्रसिद्ध शासक प्रसेनजित था जिसने बिम्बसार के पुत्र और मगध के शासक अजातशत्रु को बंदी बनाया था।

5.वज्जि :-

वज्जि संघ 8 गणराज्यों का संघ था। यह एक गणतान्त्रिक राज्य था। यह राज्य उत्तरी बिहार के आसपास था। इसकी राजधानी वैशाली थी जो राजा विशाल द्वारा बसायी गयी थी। इसकी अन्य राजधानी विदेह अथवा मिथिला थी।

6.मल्ल :-

यह एक गणतान्त्रिक राज्य था जो प्राचीन कोशल से अलग होकर बना था इसमें कोशल का पूर्वी भाग सम्मिलित था। यह राज्य वज्जि संघ के पश्चिमोत्तर भाग में हिमालय की तराई में स्थित था। मल्ल संघ में 9 राज्य सम्मिलित थे। मल्ल राज्य की राजधानी कुशावती थी।

मल्ल राज्य का इतिहास रामायण में भी मिलता है –

चन्द्रकेतोश्च मल्लस्य मल्ल भूम्यां निवेशिता। चन्द्रकान्तेति विख्याता दिव्या स्वर्गपुरी यथा।।

चन्द्रकेतु मल्ल(पहलवान) के समान तगड़े थे। उनके लिए मल्ल भूमि में चन्द्रकान्त नामक नगरी बसाई जो इंद्रपुरी के सामान थी।

7.वत्स :-

काशी जनपद के दक्षिण पश्चिम में वत्स नामक जनपद था। इसकी राजधानी कौशाम्बी थी जो यमुना के किनारे स्थित थी। वत्स राज्य का झगड़ा सदैव अवन्ति से होता रहता था। यह राज्य वर्तमान प्रयाग के आस-पास था।

8.चेदि :-

वत्स राज्य के दक्षिण में चेदि राज्य था जिसकी राजधानी शुक्तिमती थी। चेदि राज्य अत्यंत प्राचीन है महाभारत काल में चेदि राज्य का शासक शिशुपाल था जिसका वध भगवान कृष्ण ने किया था और शिशुपाल पुत्र महिपाल को वहाँ का राजा बनाया था।

9. कुरु :-

कुरु राज्य का भी वर्णन महाभारत ग्रन्थ में है। कुरु राज्य वर्तमान मेरठ के आस-पास स्थित था। इसकी राजधानी इन्द्रप्रस्थ थी। महाजनपद काल में इसका प्राचीन गौरव नहीं रह गया था फिर भी कुरु एक प्रमुख राज्य था।

10.पांचाल :-

यह राज्य कुरु के दक्षिण और कोशल के उत्तर में स्थित था ये राज्य वर्तमान बरेली ,बदायूं व फर्रुखाबाद के आस -पास स्थित था। पांचाल राज्य के दो भाग थे उत्तरी भाग की राजधानी अहिच्छत्र व दक्षिणी भाग की राजधानी काम्पिल्य थी।

पांचाल देश भी अत्यंत प्राचीन है महाभारत काल में यहाँ का राजा द्रुपद था जिसकी पुत्री द्रौपदी का विवाह पाण्डवों के साथ हुआ था।

11. मत्स्य :-

मत्स्य राज्य में आधुनिक भरतपुर, अलवर और जयपुर का भाग सम्मिलित था। इसकी राजधानी विराटनगर थी।

महाभारत काल में मत्स्य देश का राजा विराट था। शकुनि के षड्यंत्र के कारण जब पाण्डवों को वनवास जाना पड़ा था तो यहीं पर पांचों पाण्डवों ने अज्ञातवास के दौरान एक वर्ष तक शरण ली थी।

12.शूरसेन :-

यह राज्य आधुनिक मथुरा के आस-पास बसा था। शूरसेन राज्य कुरु के दक्षिण और चेदि राज्य के पश्चिमोत्तर प्रान्त में था। इसकी राजधानी मथुरा थी।

13.अवन्ति :-

अवन्ति राज्य आधुनिक मालवा (मध्य प्रदेश ) राज्य के भाग में स्थित था। इसकी राजधानी पौराणिक नगरी उज्जयनी थी और उप राजधानी महिष्मती थी।

14.गांधार :-

यह सीमान्त प्रदेश था। यह पूर्वी अफगानिस्तान और वर्तमान पाकिस्तान प्रदेश में स्थित था। इसकी राजधानी तक्षशिला थी।

महाभारत काल में गांधार का शासक शकुनि था जो राज्य अपने पुत्र को सौंपकर अपनी बहन गांधारी के घर हस्तिनापुर में रहता था। यूनानी योद्धा सिकंदर के समय गांधार का शासक आम्भि था जिसने सिकन्दर से भारतीय राजाओं के विरुद्ध मित्रता कर ली थी। गांधार की राजधानी तक्षशिला थी।

15.कम्बोज :-

यह राज्य जम्मू -कश्मीर के राजौरी से गांधार के उत्तर पामीर तक था। इसकी राजधानी राजपुर थी।

16.अश्मक :-

अश्मक राज्य एक मात्र ऐसा महाजनपद था जो दक्षिण भारत में स्थित था। यह गोदावरी नदी के आस -पास स्थित था। अश्मक राज्य की राजधानी पौदन्य थी जिसे वर्तमान समय में पोटिल या पोतन कहा जाता है।

उपरोक्त महाजनपदों में 14 राजतंत्रात्मक थे जबकि मल्ल और वज्जि संघ गणतंत्रात्मक थे।

16 महाजनपद का उल्लेख होने से यह नहीं समझना चाहिए कि उस समय मात्र 16 राज्य ही थे इन महाजनपदों के आलावा अन्य अनेक राज्य भी थे जिनमें यौधेय ,मद्र ,त्रिगर्त ,सिंधु ,सौवीर आदि राज्य भी थे परन्तु उनका राजनैतिक महत्व कम हो गया था। इसके अलावा पूर्व में वंग ,पुण्ड्र व पश्चिम में सौराष्ट्र राज्य था। दक्षिण के राज्यों में आंध्र ,पुलिंद ,शबर का उल्लेख आता है इसके अलावा सुदूर दक्षिण में द्रमिल व सिंघल राज्यों के नाम आते हैं।

इस प्रकार हमने देखा कि महाजनपद काल में राज्य संगठित रूप ले चुके थे परन्तु उनमें आपसी प्रतिस्पर्धा भी बहुत बढ़ गई थी जिससे एकता का अभाव हो गया था। काशी और कोशल में आपस में प्रतिस्पर्धा थी फिर कोशल और मगध में प्रतिस्पर्धा हो गई। मगध और अंग आपस में लड़ते थे। वत्स और अवन्ति आपस में संघर्षरत रहते थे।

महात्मा बुद्ध के समय में पश्चिमोत्तर और दक्षिण भारत का महत्व कम दिखाई देता है। इस समय प्रमुख 14 राज्यों का वर्णन अधिक है।

16 महाजनपद काल में सामाजिक स्थित :-

16 महाजनपद का समाज विभिन्न वर्णो में बंटा था। मुख्य वर्ण ब्रह्मण,क्षत्रिय ,वैश्य और शूद्र थे जबकि अनेक उपजातियाँ भी थी जिनमे जुलाहा,माली ,रथकार ,शिल्पी ,कुम्हार आदि।

स्त्रियों का स्थान :-

16 महाजनपद काल में स्त्रियों का उच्च स्थान था उनकी शिक्षा का भी उचित ध्यान रखा जाता था। उनके विवाह के लिए अभिभावक स्वयं वर चुनते थे। कभी कभी कन्या को अपना वर चुनने के लिए स्वतंत्रता दी जाती थी। पर्दा प्रथा का अभाव था।

इसे भी देखें:-

भारत पर ईरानी और यूनानी आक्रमण

6 thoughts on “16 महाजनपद का समय

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