हूण

हूण (हिंग नू) पश्चिमोत्तर चीन में रहने वाली बर्बर जाति थी इस जाति ने यूूूू ची (कुषाण जाति) को 165 ईसा पूर्व में वहां से बाहर निकाल दिया था। कुछ समय पश्चात जनसंख्या दबाव के कारण इन्होंने भी पश्चिम की ओर प्रस्थान किया और पश्चिमी यूराल पर्वत को पार करके यूरोप की ओर बढ़ गई और वहां पर रहने वाली गाथ जाति को बाहर धकेल दिया। अब हूण वोल्गा और डेन्यूब नदी के बीच के भाग में फैल गये,धीरे धीरे उनकी शक्ति कमजोर पड़ने लगी बाद में उनका शक्तिशाली शासक अत्तिला हुआ जिसने बिखरती हूण शक्ति को सम्हाला। जबतक वह जीवित रहा तबतक लगभग सारा यूरोप उससे आतंकित रहा।

हूणों की दूसरी शाखा दक्षिण की ओर बढ़कर आक्सास नदी के किनारे पहुंची। यहां उसका सामना सासानी साम्राज्य से हुआ जिसकी शक्ति ने उनके आगे बढ़ने के मार्ग को रोक दिया। 450 ईसवी में उन्होंने फाारस के राजा फिरोज को मारकर उसके साम्राज्य को नष्ट कर दिया।

सासानी साम्राज्य के पतन के पश्चात वे फिर आगे बढ़े और हिंदुकुश को पार करके भारत की ओर बढ़ने लगे।

अब उनके भारत पर आक्रमण का मार्ग प्रशस्त हो गया। हूणो का भारत पर शक्तिशाली आक्रमण गुप्त शासक कुमारगुप्त प्रथम के समय में हुआ परंतु उस समय गुप्त शासन प्रबल था। भारत की सीमा पर हूणों की लगातार पराजय हुई। परंतु जैसे-जैसे भारत में गुप्तों का शासन कमजोर होता गया हूण पश्चिमोत्तर भारत में बढ़ गए।

हूणों का शक्तिशाली शासक तोरमाण था। जिसके बारे में कल्हण की राजतरंगणी से जानकारी प्राप्त होती है। 510 ई में  बालादित्य नामक राजा ने हूणों को मार कर बाहर निकाल दिया और उन्हें सियालकोट तक सीमित कर दिया था। यह बालादित्य कौन था इसके विषय में विद्वानों में विवाद है परन्तु अधिकतर विद्वान मानते है की ये बालादित्य गुप्त शासक भानुगुप्त बालादित्य था। इस युद्ध की पुष्टि भानुगुप्त के गुप्त सम्वत 191 के एरण लेख से होती है इसमें भानुगुप्त के साथी गोपराज ने अत्यंत वीरता का परिचय दिया था।

तोरमाण के पश्चात उसका पुत्र मिहिरकुल हूणों का नेता हुआ वह तोरमाण से भी अधिक क्रूर शासक था उसकी क्रूरता का वर्णन कल्हण की राजतरंगिणी में किया गया है। वह शैव धर्म का अनुयाई और बौद्धों का घोर शत्रु था। उसकी क्रूरता की एक अन्य कथा प्रचलित है जिसके अनुसार मिहिरकुल हाथियों का भी घोर शत्रु था वह हाथियों को पहाड़ की चोटी से गिरा देता था जब वे दर्द से चिंघाड़ते थे तो वह प्रसन्न होता था।

उसने अपने पिता की भांति मगध पर आक्रमण किया परंंतु बालादित्य ने उसे पराजित करके बंदी गृह में डाल दिया परंतु अपनी धार्मिक माता के कहने पर उसे क्षमा कर दिया। इसका वर्णन  चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपनी पुस्तक में किया है।

वहां से भागकर मिहिरकुल कश्मीर पहुंचा। कश्मीर के राजा ने उसे शरण दी परंतु राजा को मारकर स्वयं कश्मीर का शासक बन गया। कश्मीर में वह लगभग एक वर्ष तक शासन कर सका।

यशोधर्मन के मंदसौर स्तंभ लेख के अनुसार  528 ईसवी में मालवा के राजा यशोधर्मन ने  मुल्तान के पास हूणों को पराजित किया ।यशोधर्मन की यह हूणों पर पूर्ण विजय थी। इसके पश्चात हूणों का स्वतंत्र अस्तित्व समाप्त हो गया वे भारतीय समाज में विलीन हो गए।

हूणों की पराजय के कारण:-

हूण एक बर्बर आक्रमणकरी थे उनमे सभ्यता को कोई अंश नहीं था परन्तु वे कुशल सैनिक थे। यह देखने में आया है कि उनकी सफलता उनकी गति,क्रूरता और सैनिक आक्रमण में थी। वे एक लुटेरे की भांति थे। युद्ध के समय उन्हें पराजित करना मुश्किल होता था परन्तु युद्ध के पश्चात विजित प्रदेश के संगठन में वे असफल हो जाते थे क्योँकि शासन का उन्हें कोई अनुभव नहीं था। इसी कारण हूण जहां भी गए अधिक समय तक नहीं टिक सके।

Leave A Comment