हर्षवर्धन

गुप्त साम्राज्य के ध्वंस के पश्चात छठी सदी ईसवी में पुष्यभूति वंश का उदय हुआ। हर्षवर्धन पुष्यभूति वंश का सबसे प्रतापी शासक था। पुष्यभूति वंश का संस्थापक पुष्यभूति नामक राजा था उसने थानेश्वर में इस वंश की स्थापना किया तथा श्रीकंठ को अपनी राजधानी बनाया बाणभट्ट ने हर्ष चरित में उसे प्रतापी राजा कहा है।

पुष्यभूति वंश की उत्पत्ति:-

बाणभट्ट ने उन्हें क्षत्रिय कहा है । परंतु चीनी यात्री ह्वेनसांग ने हर्ष को फी शे कहा है जिसका अर्थ वैश्य होता है।आर्य मंजुश्री मूलकल्प में भी उसे वैश्य कहा गया है।
कनिंघम ने इसका खंडन करते हुए कहा है कि संभवतः ह्वेनसांग ने वैश्य और बैस को एक ही समझ लिया। बैस एक क्षत्रिय वंश था।

पुष्यभूति वंश का प्रभावशाली राजा आदित्य वर्धन का पुत्र प्रभाकर वर्धन हुआ जो पूर्ण स्वतंत्र शासक हुआ उसने महाराजाधिराज की उपाधि धारण की थी।

प्रभाकर वर्धन की मृत्यु के पश्चात उसका बड़ा पुत्र राज्यवर्धन सिंहासन पर बैठा। प्रभाकर वर्धन की मृत्यु का लाभ उठाकर गौड़ नरेश शशांक ने मालवा के शासक देव गुप्त के साथ मिलकर कान्यकुब्ज पर आक्रमण कर दिया और राज्यवर्धन के बहनोई गृहवर्मा को मार डाला तथा उसकी बहन राजश्री को बंदी बना लिया परंतु वह बंदी गृह से भाग निकली तथा विंध्याचल की ओर चली गई।

यह खबर मिलने पर राजवर्धन ने सेना लेकर  कान्यकुब्ज की ओर प्रस्थान किया जहां उसका सामना मालवा के देव गुप्त से हुआ देवगुप्त को पराजित करके कान्यकुब्ज को उसने अपने अधिकार में कर लिया परंतु धोखे से गौड़ नरेश शशांक के षणयंत्र में फंस गया क्योंकि शशांक ने अपनी राजकुमारी के विवाह का प्रस्ताव उसके पास भेजा इस निमंत्रण को स्वीकार करके वह अकेले ही शशांक के शिविर में चला गया जहां शशांक ने अकेला पाकर उसे मार डाला।

हर्षवर्धन:-

अपने भाई की आकस्मिक मृत्यु के पश्चात अनिच्छा से 606 ईसवी में मात्र 16 वर्ष की आयु मे हर्षवर्धन श्रीकंठ के सिंहासन पर बैठा। सिंहासन पर बैठने के समय उसके सामने अनेक समस्याएं थी। गौड़ नरेश शशांक ने धोखे से उसके बड़े भाई राज्यवर्धन की हत्या कर दी थी।उसकी बहन का राज्य अरक्षित था। सबसे पहले कान्यकुब्ज राज्य के उत्तराधिकार की समस्या को हल किया गया।

वहां के शासक गृह वर्मा के कोई पुत्र नहीं था इसलिए मंत्रियों ने हर्ष को शासन संभालने के लिए आमंत्रित किया हर्षवर्धन ने इसके लिए अनिच्छा प्रकट की परंतु मंत्रियों के समझाने पर उसने अपनी बहन राज्यश्री के साथ संयुक्त रूप से कान्यकुब्ज का शासक बनना स्वीकार कर लिया।

हर्षवर्धन ने अधिकारियों के सामने यह सौगंध खाई कि वह कुछ ही दिनों में धरती को गौड़ो से रहित कर देगा नहीं तो पतंगे की भांति चिता में जलकर भस्म हो जाएगा।

दिग्विजय की योजना बनाई गई।

इसी समय असम के राजा भास्कर वर्मा ने हंसवेग नामक अपने विशेष दूत को हर्षवर्धन के दरबार में बहुमूल्य उपहारों के साथ मैत्री प्रस्ताव लेकर भेजा।

हर्षवर्धन ने इस प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार कर लिया भास्कर वर्मा के दूत को बहुमूल्य उपहार देकर विदा किया गया।

उसके पश्चात उसकी भेंट सेनापति भांडी से हुई। भांडी ने उसे सारा समाचार बताया कि किस प्रकार राजवर्धन ने मालवा को पराजित किया था और उसकी बहन राज्यश्री बंदी गृह से छूट कर विंध्याचल की ओर भाग गई है इस परिस्थिति में हर्षवर्धन ने भांडी को गौड़ राज्य पर आक्रमण करने के लिए नियुक्त किया तथा बताया कि स्वयं वह राजश्री की खोज में जाएगा।

मालव राज को पुनः पराजित करके सेना को आगे भेजा गया और हर्षवर्धन अपनी बहन को खोजने के लिए विंध्याचल की ओर गया वहां उसकी भेंट दिवाकर मित्र नामक बौद्ध आचार्य से हुई। उसने राज्यश्री का पता हर्षवर्धन को बताया जिस समय हर्षवर्धन राज्यश्री के पास पहुंचा वह चिता जलाकर भस्म होने जा रही थी परंतु गृह वर्मा के बचपन के मित्र बौद्ध भिक्षु दिवाकर मित्र के समझाने पर वह हर्षवर्धन के साथ वापस आ गई।

गौड़ नरेश शशांक का इसके पश्चात क्या हुआ इस विषय में बाणभट्ट और चीनी यात्री ह्वेनसांग दोनों ही मौन है यह अनुमान लगाया जाता है कि हर्षवर्धन अपनी बहन को खोजने के लिए गया था उसी मौके का फायदा उठाकर शशांक दक्षिण पश्चिम बंगाल की ओर भाग गया। गंजाम में मिले एक लेख से यह पता चलता है कि शशांक 619 ईसवी तक जीवित रहा हालांकि अपने शासन के अंत तक हर्षवर्धन ने उन सभी क्षेत्रों पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया था।

हर्षवर्धन ने वल्लभी के राजा ध्रुव सेन द्वितीय को पराजित किया था परंतु बाद में अपनी लड़की का विवाह उससे करके उसे अपना मित्र बना लिया।

ह्वेनसांग के अनुसार पूर्व की तरफ बढ़ते उसने पञ्च गौड़ों को अपने अधीन कर लिया पञ्च गौड़ों में सारस्वत(पंजाब,कश्मीर), गौड़(दिल्ली), कान्यकुब्ज(उत्तर प्रदेश, पश्चिमी बिहार,विंध्याचल), मैथिली(पूर्वोत्तर बिहार,आसाम,बंगाल) और उत्कल(उड़ीसा,दक्षिणी बिहार) आते हैं। 

हर्षचरित में हर्षवर्धन को सकल उत्तरापथ नाथ कहा गया है इसका अर्थ यह है कि वह उत्तर भारत का शासक था उसका राज्य कश्मीर से लेकर असम तक और नेपाल से लेकर नर्मदा तक था यद्यपि इनमें से कई राज्यों को उसने प्रत्यक्ष रूप से अपने  अधिकार में नहीं लिया था परंतु वे इसके पूर्ण प्रभाव क्षेत्र में थे।

उत्तर भारत की विजय के पश्चात हर्षवर्धन ने दक्षिण भारत पर आक्रमण किया वहां चालुक्य वंश का शासन था जिसका राजा पुलकेशिन द्वितीय शक्तिशाली था। हर्षवर्धन की उत्तर भारत के विजय से ही पुलकेशिन के साथ उसकी खींचातानी शुरू हो गई थी। पुलकेशिन महाराष्ट्र और कर्नाटक का शासक था।

चीनी यात्री ह्वेनसांग के वर्णन के अनुसार इस युद्ध में हर्ष हार कर वापस आ गया था। पुलकेशिन द्वितीय के एहोल अभिलेख के अनुसार-

जिसके चरण कमलों पर अपरिमित समृद्धि के युक्त सामंतों की सेना नतमस्तक होती थी उस हर्ष का हर्ष युद्ध में मारे गए हाथियों के वीभत्स दृश्य को देखकर विगलित हो गया। 

पुलकेशिन द्वितीय ने हर्ष की पराजय का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं किया है वह केवल इतना लिखता है कि मारे गए हाथियों से हर्ष का हर्ष विगलित तो गया। यदि वह संपूर्ण उत्तर भारत के स्वामी हर्ष को पराजित कर पाया होता तो उसका महिमामंडन अवश्य करता।

पुलकेशिन के उत्तराधिकारियों ने उससे आगे बढ़कर हर्ष की पराजय की घोषणा कर दी जो पुलकेशिन के मात्र गौरव का गान ही प्रतीत होता है। यह युद्ध नर्मदा नदी के किनारे लड़ा गया। इसके बाद नर्मदा नदी दोनों राज्यों की सीमा रेखा बन गई।

हर्ष का साम्राज्य पर्याप्त विशाल था उत्तर भारत में मिले हुए उसके अनेक अभिलेखों से उसके राज्य विस्तार का अनुमान लगाया जा सकता है।

बांसखेड़ा के लेख में उसे श्रावस्ती, अहिछत्र का राजा स्वीकार किया गया है।

हर्ष ने बौद्ध मठ को उड़ीसा के 80 ग्राम की राजकीय आय दी थी इससे उड़ीसा पर उसके अधिकार की पुष्टि होती है।

उसका साम्राज्य मालवा दिल्ली, पंजाब, बिहार, बंगाल और उड़ीसा तक विस्तृत था इसके अलावा उसके प्रभाव क्षेत्र में कश्मीर, आसाम, सौराष्ट्र, नेपाल आदि राज्य थे।

शासन व्यवस्था:-

हर्षित कालीन शासन व्यवस्था अत्यंत सुदृढ़ एवं शक्तिशाली थी क्योंकि बिना उचित शासन व्यवस्था के इतने बड़े राज्य का संचालन संभव नहीं हो सकता था।

हर्ष के समय के शासकीय अधिकारियों के कार्यों का विस्तृत वर्णन हमें नहीं प्राप्त हो पाता है परंतु जो भी वर्णन प्राप्त होता है उससे कुछ अनुमान अवश्य लगाया जा सकता है।

केंद्रीय शासन:-

केंद्रीय शासन कई विभागों में बांटा गया था जो विभाग के अध्यक्ष या मंत्री के अधीन कार्य करते थे।राजा राज्य का सर्वोच्च अधिकारी होता था वह सैनिक एवं प्रशासन दोनों मामलों में सबसे बड़ा अधिकारी था। न्याय का अंतिम निर्णय राजा के पास सुरक्षित रहता था वह अपने अधिकारियों के निर्णय को मानने के लिए बाध्य नहीं था। परंतु सम्राट निरंकुश नहीं था वह अपनी मंत्रिपरिषद की प्रत्येक सलाह का सम्मान करता था तथा उसका प्रमुख उद्देश्य प्रजा पालन ही था।

मंत्रिपरिषद:-

प्रधानामात्य:-

यह मंत्रियों में सबसे प्रमुख अधिकारी था इसे प्रधानमंत्री कहा जा सकता है इसका कार्य सभी मंत्रियों के कार्यों की देखभाल और महत्वपूर्ण राजकीय कार्यों को देखना था प्रधानामात्य राजा के बाद सबसे शक्तिशाली व्यक्ति होता था।

महा संधि विग्रहिक:-

यह विदेश मंत्री के समान होता था। गुप्त काल में भी इसका महत्वपूर्ण स्थान था। अन्य राज्यों से संधि और विग्रह और अन्य कार्यों की देखभाल करता था।

सेनापति:-

सेना का सबसे प्रमुख अधिकारी था इसका कार्य सैन्य संगठन व संचालन था।

अक्षपटलिक:-

यह सरकारी कागज पत्र की देखभाल करता था।

पुरोहित:-

इसका कार्य राजा के लिए यज्ञ अनुष्ठान कराना, युद्ध आदि विशेष अवसरों पर राजा की मंगल कामना करना था।

प्रतिहार:- 

यह राजा के अंगरक्षक सेना का प्रधान था इसका काम राजा एवं राज्यसभा की सुरक्षा करना था।

विनयानुसार:-

इसका काम आगंतुकों को राजसभा में ले जाना और उनके आगमन की घोषणा करना था।

स्थापित:-

इसका कार्य रनिवास के कर्मचारियों का निरीक्षण करना व उनकी नियुक्त करना था।

लेखक:-

यह प्रधान लेखक था। इसका कार्य विभिन्न विषयों को लिपिबद्ध करना था। 

प्रांतीय शासन:-

हर्षवर्धन का साम्राज्य कई इकाइयों में बांटा हुआ था।  इन्हें भुक्ति अथवा प्रदेश कहा जाता था। प्रदेश विषयों में बंटे हुए थे। विषय पठकों में और पठक ग्रामों में बंटे हुए थे।

भुक्ति के अधिकारी को भोगपति,भोक्ता, महाराज आदि कहा जाता था इनकी नियुक्ति सम्राट द्वारा की जाती थी परंतु ये अपने नीचे के अधिकारियों की नियुक्ति करने के लिए स्वतंत्र थे।

विषय:-

विषय के अधिकारी को विषय पति कहा जाता था यह आधुनिक काल के जिले का प्राचीन रूप था।

ग्रामीण शासन:-

ग्राम के प्रमुख को महत्तर या ग्रामणी कहा जाता था ग्राम शासन केंद्रीय और प्रांतीय शासन की तरह पूरी तरह से संगठित था। ग्रामीण शासन के कई अधिकारी होते थे जिनके के नाम निम्नलिखित हैं:-

ध्रुवाधिकरण:- 

यह भूमि कर का अध्यक्ष होता था।

तलवाटक:-

तलवाटक गांव का लेखा-जोखा रखता था।

उत्खेटयित:-

यह कर वसूल करने के लिए नियुक्त किया गया था।

करणिन:- 

यह रजिस्ट्रार की कोटि का अधिकारी होता था।

पुस्तपाल:-

इसका कार्य सभी कार्यवाहियों का लेखा-जोखा रखना था।

अग्रहारिक:-

यह अधिकारी ब्राह्मणों को दान में दी गई भूमि की देखभाल करता था।

अष्टकुलाधिकरण:-

यह आठ कुलों का निरीक्षक होता था।

इसके अतिरिक्त अन्य कर्मचारी भी कार्य करते थे।

राज्य की आय के साधन:-

बड़े साम्राज्य को व्यवस्थित रूप से चलाने के लिए धन की आवश्यकता होती है पुष्यभूतियों ने इसके लिए विशेष व्यवस्था की थी। हर्षवर्धन के समय में राजकीय व्यय बढ़ गया था क्योंकि वह लोक कल्याण पर अत्यधिक धन व्यय करता था। चीनी यात्री ह्वेनसांग के अनुसार राजकीय आय को चार भागों में बांटा गया था।

पहला भाग सरकारी कामकाज व धार्मिक कृत्य में खर्च होता था, दूसरा भाग बड़े-बड़े अधिकारियों के ऊपर खर्च किया जाता था, तीसरा भाग विद्वानों को पुरस्कार और वेतन देने के लिए खर्च होता था और चौथा भाग दान पुण्य में खर्च किया जाता था।

राज्य की आय के प्राप्ति के निम्नलिखित साधन थे:-

उद्रंग :-

यह भूमि कर था। भूमि की उपज का छठवां भाग सरकार द्वारा लिया जाता था।

धान्य:-

यह शुल्क विशिष्ट प्रकार के अनाजों पर लगाया जाता था।

उपरिकर:-

उपरिकर सरकारी जमीन से लिया जाता था। सरकारी जमीन पट्टे पर लेकर किसान खेती करते थे।

शारीरिक श्रम:-

जो व्यक्ति कर नहीं दे पाता था उस कर के बदले में उससे निश्चित मात्रा में शारीरिक श्रम लिया जाता था।

हिरण्य:-

यह खनिज पदार्थ पर लगने वाला शुल्क था।

न्यायालय शुल्क:-

न्यायालय के कामकाज से वसूली जाने वाली राज्य की आमदनी।

अर्थदंड:-

जिस अभियोग में अभियुक्तों को शारीरिक दण्ड नहीं दिया जाता बल्कि उनसे धन वसूला जाता है इस प्रकार से राज्य की आमदनी होती थी।

भूमि कर:-

कृषि कर से राज्य की सबसे अधिक आय होती थी। भूमि की पैमाइश अच्छी तरह से की जाती थी पैमाइश करने वाले अधिकारी को प्रमाता कहा जाता था। भूमि संबंधी विषयों को लिखित रूप में रखा जाता था और सिंचाई की उपयुक्त व्यवस्था थी।
भूमि कर उपज का छठा भाग था।

न्याय व्यवस्था:-

राजा न्याय विभाग का सबसे बड़ा अधिकारी होता है। न्याय के लिए न्यायालय बने हुए थे यहां पर कोई भी व्यक्ति अपना वाद लेकर आ सकता था। सामान्य अपराधों के लिए कठोर दंड नहीं दिया जाता था अधिकांशतया अर्थ दंड ही मिलता था। कुछ विशेष अपराधों के लिए अंग-भंग, देश निकाला का दंड मिलता था।  फौजदारी अपराधों के लिए कठोर दंड दिया जाता था। अपराधियों का वर्ग छोटा था परंतु अपराध होते थे।
चीनी यात्री ह्वेनसांग अपने यात्रा विवरणसी यू की में लिखता है कि वह दो बार डाकुओं के चंगुल में फंस गया था।

हर्ष के लोक हितकारी कार्य:-

हर्षवर्धन एक प्रजा पालक सम्राट था उसका सरा समय प्रजा रंजन में लगा रहता था। उसने अपने दैनिक कार्यक्रमों को तीन भागों में बांट रखा था पहले भाग में वह शासकीय कार्यों को करता था तथा शेष दो भागों में धार्मिक और सामाजिक कार्यकलाप करता था।

बाणभट्ट के हर्षचरित में तथा ह्वेनसांग के जीवनी ग्रंथ सी यू की में भी हर्षवर्धन को प्रजा के कष्ट का निवारण करने वाला शासक बताया गया है।

हर्षवर्धन अपने नाटक नागानंद में लिखता है- 

संपूर्ण प्रजा उचित मार्ग पर चल रही है सत्पुरुष अपने अनुकूल मार्ग पर हैं बंधु बांधव मेरी तरह ही सुख भोग कर रहे हैं राज्य की सब प्रकार की सुरक्षा निश्चित हो गई है प्रत्येक नागरिक अपनी आवश्यकताओं को इच्छानुकूल ढंग से संपादित कर रहा है। 

इसे अनुमान लगता है कि राज्य की तरफ से प्रजा के दैनिक कार्यकलापों में किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं किया जाता था तथा सभी अपने हिसाब से अपनी उन्नति करते थे।

हर्षवर्धन परम भट्ठारक, महाराजाधिराज, चक्रवर्ती, सार्वभौम, आदि उपाधियों को धारण करता था। राजा स्वयं राज्य के सभी महत्वपूर्ण कार्य कलाप का निरीक्षण करता था सेना के संगठन और संचालन की देखभाल करता था बड़े अधिकारियों की नियुक्ति करता था। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने उसके प्रजा पालक प्रवृत्ति की बहुत प्रशंसा किया है ह्वेनसांग के अनुसार सम्राट ईमानदार और न्याय प्रिय था।

इतना सब करने के बाद भी हर्षवर्धन को इससे संतोष नहीं होता था वह प्रजा की गतिविधि और उनके सुख-दुख का स्वयं निरीक्षण करता था इसके लिए शांति काल में बड़ी-बड़ी यात्राएं की जाती थी चीनी यात्री ह्वेनसांग के अनुसार यात्राओं का उद्देश्य आमजन के रहन-सहन एवं जीवन को देखना था यात्रा के समय विभिन्न स्थानों पर पड़ाव डाला जाता था। हर्षवर्धन प्रत्येक 5 वर्ष में प्रयाग में मेला लगाता था जहां पर अत्यधिक दान किया जाता था।

हर्षवर्धन एक लोक कल्याणकारी शासक था। हर्षवर्धन ने सड़कों का निर्माण कराया। यात्रियों के निवास के लिए पंथागार का निर्माण कराया।

शिक्षा के ऊपर वह बहुत धन खर्च करता था शिक्षण संस्थाओं को दान देता था। नालंदा विश्वविद्यालय को आर्थिक सहायता देने के लिए कई गांव की आय विश्वविद्यालय के नाम कर रखी थी।

नालंदा विश्वविद्यालय:-

नालंदा विश्वविद्यालय को कुमारगुप्त प्रथम में बनवाया था। उसके पहले वह एक छोटा विद्यालय था। हर्षवर्धन ने इस विश्वविद्यालय को काफी आर्थिक सहायता प्रदान की।

चीनी यात्री ह्वेनसांग  के यात्रा विवरण से हमें इस विश्वविद्यालय के विषय में काफी जानकारी प्राप्त होती है ह्वेनसांग इस विश्वविद्यालय में शिक्षा ग्रहण करने गया था वह इसकी बहुत प्रशंसा करता है।

ह्वेनसांग के अनुसार विश्वविद्यालय के दरवाजे पर ही द्वारपंडित द्वारा छात्रों की परीक्षा ली जाती थी जो छात्र इस परीक्षा में उत्तीर्ण होता था उसे ही विश्वविद्यालय के अंदर प्रवेश दिया जाता था। 

नालंदा विश्वविद्यालय में छ: विद्यालयों के विशाल भवन थे तथा महाविहार के एक भाग में पुस्तकालय था इसको धर्मगंज कहा जाता था और इसके अंदर तीन भवन थे जिन्हें रत्नदधि, रत्नसागर,रत्नरंजक कहा जाता था। रत्नदधि नौ मंजिला बना हुआ विशाल भवन था वहां पर विशाल ईट की दीवार थी जिसमें बड़े-बड़े दरवाजे लगे हुए थे तथा  उसके अंदर आने जाने के लिए पत्थर के रास्ते बने हुए थे,जगह जगह कुएं व जलघड़ी लगी थी। 

विश्वविद्यालयों के आचार्यों की संख्या एक हजार और छात्रों की संख्या लगभग दस हजार थी यहां के आचार्य अत्यंत योग्य व विद्वान थे उनका चरित्र उच्च कोटि का था महाविहार को चलाने के लिए राज्य की ओर से 200 से अधिक गांव की आय दी गई थी।

विद्यार्थियों को भोजन में मुख्यतया चावल दिया जाता था उसके अलावा घी, तेल और अन्य खाद्य सामग्री भी दी जाती थी तथा गांवों से भी दूध,सब्जी पहुंचाई जाती थी।

विहार के नियम अत्यंत कठिन थे जो उसमें प्रवेश करने में सफल हो जाते थे उन्हें कठोर परिश्रम कराया जाता था जिससे अनेक विद्यार्थी विद्यालय को बीच में ही छोड़कर चले जाते थे परंतु जो रह जाता था उसका ज्ञान निखर जाता था। 

चीन के साथ संबंध:-

हर्ष वर्धन के शासनकाल में चीनी यात्री ह्वेनसांग भारत आया था इसके पश्चात भारत और चीन के संबंध तैयार हुए। हर्षवर्धन ने 641ईसवी में चीन के सम्राट ताह त्संग के पास अपना ब्राह्मण दूत भेजा था।इसके पश्चात चीनी शासक ने भी अपने दूत भारत भेजे।

हर्ष की मृत्यु:-

हर्ष की मृत्यु 648 ईसवी में हुई उस का शासनकाल बहुत लंबा था उसने 42 वर्षों तक शासन किया। हर्ष के कोई पुत्र नहीं था उसकी मृत्यु के पश्चात उसके मंत्री अरुणाश्व ने राज्य पर अधिकार स्थापित कर लिया। अरुणाश्व के पश्चात उसके राज्य के विषय में कोई विशेष जानकारी नहीं मिलती है। हर्ष की मृत्यु के कुछ समय पश्चात उसका राज्य नष्ट हो गया और भारत में विकेंद्रीकरण की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिला तथा अनेक छोटे-छोटे राज्य स्थापित हुये। 

हर्षवर्धन भारत का अंतिम सम्राट था जिसने देश को राजनीतिक एकता के सूत्र में बांधा था।

समाज और संस्कृति:-

हर्ष कालीन समाज विभिन्न वर्गों में बटा हुआ था, इसकी जानकारी हर्षचरित,ह्वेनसांग के यात्रा विवरण और अन्य लेेख  से प्राप्त होती है। 

समाज चार वर्णों में बंटा हुआ था जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र थे। सभी अपने अपने धर्म में स्थित होकर अपने नियमों का पालन करते थे।

ब्राह्मण का जीवन अत्यंत उच्च कोटि का समाज के लिए आदर्श था ह्वेनसांग ने भी भारत देश को ब्राह्मणों का देश कहा है और उसने ब्राह्मणों के आचार विचार की प्रशंसा की है इसी प्रकार क्षत्रिय, वैश्य, और शूद्र अपने अपने कर्तव्य पालन में रत थे। समाज के विषय में जानकारी ह्वेनसांग के यात्रा विवरण हर्षचरित से प्राप्त होती थी।
चार वर्णों के अतरिक्त अंत्यज भी थे जिनमें चांडाल, स्वपाक(कुत्ता खाने वाले), मृतप(मरे जानवर खाने वाले),जल्लाद आदि थे। इन्हें लोग छूते नहीं थे।

विवाह:-

अनुलोम और प्रतिलोम विवाह प्रचलित थे यद्यपि अधिकांश लोग अपने वर्णों में विवाह करते थे समाज में बहु विवाह की भी प्रथा प्रचलित थी परंतु साधारण जन में एक पत्नी विवाह होते थे।

पुरुषों के पुनर्विवाह होते थे परंतु स्त्रियों का पुनर्विवाह नहीं होता था यद्यपि निम्न वर्ग की स्त्रियों में पुनर्विवाह की प्रथा प्रचलित थी। विवाह के कई प्रकार समाज में प्रचलित थे परंतु ब्रह्मा विवाह सर्व स्वीकृत था दहेज प्रथा का भी हर्षचरित में वर्णन मिलता है।

हर्ष कालीन समाज में सती प्रथा के अनेक उदाहरण प्राप्त होते हैं हर्षवर्धन के पिता की मृत्यु के पहले ही उसकी माता सती हो गई थी हर्ष की बहन राजश्री भी अपने पति की मृत्यु के पश्चात सती होने जा रही थी हर्ष ने उसे रोक लिया। नागानंद नाटक में जीमूत वाहन की मृत्यु के पश्चात उसकी पत्नी रेवती ने सती होने की इच्छा प्रकट की थी।

जो सती नहीं होती थी वे श्वेत वस्त्र पहनती थी और बालों को एक चोटी बांधती थी।

बालकों के साथ-साथ कन्याओं की भी शिक्षा का उचित प्रबंध किया जाता था बाणभट्ट के नाटकों से इसका पता चलता  है। समाज में स्त्रियों का स्थान माता, पुत्री और पत्नी के रूप में सम्माननीय था।

धार्मिक जीवन:-

राज परिवार के सदस्य अलग-अलग संप्रदायों के मानने वाले थे इस वंश का संस्थापक पुष्यभूति शैव धर्म का अनुयाई था। राजा प्रभाकर वर्धन सूर्य का उपासक था उसका बड़ा पुत्र राज्यवर्धन बौद्ध था और छोटा पुत्र हर्षवर्धन शैव धर्म का अनुयाई था । उसने अपनी मुद्राओं और लेखों में अपने आप को माहेश्वर कहा है परंतु उसका झुकाव बौद्ध धर्म की तरफ होने लगा था। पुष्यभूति राजा धार्मिक रूप से साहिष्णु थे वे सभी धर्मों का सम्मान करते थे। हर्षवर्धन प्रत्येक पांचवे वर्ष में प्रयाग में धर्म सभा का आयोजन करता था जिसे महा मोक्ष परिषद कहा जाता था। चीनी यात्री ह्वेनसांग हर्षवर्धन के दरबार में रहा था जिसमें छठी धर्म सभा में उपस्थित भी था। उसके अनुसार धर्म सभा में प्रत्येक संप्रदाय के व्यक्ति सम्मिलित होते थे जिनमें वैदिक, पौराणिक, बौद्ध, जैन आदि।  समाज में वैदिक धर्म के अनुयायियों की संख्या बहुतायत में थी यह अपनी स्वाभाविक वृत्ति के कारण अन्य संप्रदायों को प्रभावित करता जा रहा था।

वैदिक धर्म:-

वैदिक धर्मावलंबियों के वैष्णव, शैव, शाक्त आदि संप्रदाय बने हुए थे जिनमें विष्णु, शिव, दुर्गा, सूर्य आदि की पूजा होती थी और उनकी मूर्ति और मंदिर बहुतायत में बने हुए थे। 
आज के समय में मंदिरों में की जाने वाली पूजा विधि उस समय परिष्कृत रूप में आ गई थी। प्राचीन वैदिक धर्म के यज्ञ संस्कार कर्मकांड अभी भी होते थे परंतु उसके साथ साथ वाममार्गी विचारधारा का प्रचार होने लगा था।

बौद्ध धर्म:-

बौद्ध धर्म काफी प्रचलित था परंतु धीरे-धीरे उनके अनुयायियों की संख्या कम होती जा रही थी। बौद्ध धर्म में हीनयान और महायान के अतिरिक्त अन्य उपविभाग भी हो गए थे जिनमें स्थविर, महासांघिक, योगाचार आदि थे।

जैन धर्म:-

जैन धर्म के मानने वालों की संख्या कम होती जा रही थी क्योंकि इनका आचार और नियम अत्यंत कठिन था परंतु फिर भी भारत में जैन धर्म के अनुयायियों की संख्या पर्याप्त थी। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने इसका वर्णन किया है वह श्वेतांबर संप्रदाय का वर्णन करता है।

जैन धर्म पहले ही दो भागों में दिगंबर और श्वेतांबर में विभक्त हो गया था दिगंबर वस्त्र नहीं पहनते थे तथा उनकी मान्यता थी कि स्त्रियां मोक्ष नहीं प्राप्त कर सकती हैं, इसके अलावा तीर्थंकरों की पूजा में वे वस्त्र, गंध और पुष्प का उपयोग नहीं करते थे।

जबकि श्वेतांबर जैन श्वेत वस्त्र पहनते थे और तीर्थंकरों की पूजा में वस्त्र, पुष्प का उपयोग करते थे।

बाणभट्ट के हर्षचरित से उस समय प्रचलित विभिन्न संप्रदायों का पता चलता है जो निम्न हैं –

भागवत, धर्मशास्त्री, पौराणिक, शैव, कापिल(ज्ञान प्राप्ति के लिए सांख्य दर्शन को मानने वाले) लोकायतिक(चार्वाक दर्शन को मानने वाले), वर्णी(ब्रह्मचारी) ,औपनिषदिक, ऐश्वरकारणिक(न्याय दर्शन को मानने वाले), अर्हत(जैन भिक्षु), श्वेतपट(श्वेतांबर जैन), केशलुंचक (ऐसे जैन साधु जो अपना बाल स्वयं ही उखाड़ कर फेंक देते थे), पांडु(श्वेत वस्त्र धारण करने वाले जैन साधु),कणाद, हीनयानी, महायानी,स्थविर,माध्यमिक, योगाचार मस्करी(परिव्राजक)आदि।

साहित्य:-

इस काल में साहित्य की काफी उन्नति हुए अनेक नाटक, काव्य, दर्शन आदि लिखे गए। हषर्वर्धन एक अच्छा लेखक था उसने रत्नावली, प्रियदर्शिका और नागानंद जैसे प्रसिद्ध नाटक लिखे। वह विद्वानों का आश्रय दाता था। उसका दरबारी कवि बाणभट्ट विद्वान व्यक्ति था। उसने हर्षचरित और कादंबरी नामक प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना की। हर्ष चरित से हर्ष के जीवन से संबंधित, राज्य शासन से संबंधित उस समय के समाज से संबंधित जानकारी प्रचुर मात्रा में प्राप्त होती है।

बाणभट्ट ने इसके अतिरिक्त पार्वती परिणय, चंडी शतक, मुकुताडितक नामक ग्रंथ की रचना की।

मयूर ने सूर्य शतक, मयूर शतक और खंड प्रशस्ति नामक ग्रंथ की रचना की। भर्तृहरि ने श्रृंगार शतक, वैराग्य शतक और नीति शतक की रचना की।

हरिदत्त और जयसेन जैसे प्रसिद्ध विद्वान हर्ष कालीन थे।

स्थापत्य एवं मूर्तिकला:-

नालंदा में हर्षवर्धन ने पीतल के चादर से चढ़ाकर एक मठ बनवाया था। हर्ष कालीन मंदिरों में बिहार स्थित भभुआ का मुंडेश्वरी मंदिर, रायपुर जिले में स्थित सिरपुर का लक्ष्मण मंदिर तथा अजंता की कुछ कलाकृतियां भी इसी युग की देन है।  

हर्षवर्धन ने भद्र विहार की स्थापना नालंदा में की थी।

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