पुष्यमित्र शुंग और शुंग वंश

मौर्य वंश के पश्चात शुंग राजवंश ने मगध पर आधिपत्य स्थापित किया शुंग वंश का संस्थापक पुष्यमित्र शुंग था । पुष्यमित्र शुंग ने मौर्य वंश के अंतिम शासक बृहद्रथ को मारकर मगध के सिंहासन पर अधिकार किया था इसलिए कुछ ग्रंथों में जैसे हर्ष चरित्र में उसे अनार्य कह दिया गया है । यह घटना 185 ईसा पूर्व की है।


भागवत महापुराण के अनुसार-

हतवा बृहद्रथ मौर्य तस्य सेनापति: कलो।पुष्यमित्र स्तु शुंगाह्वा स्वयं राज्यम करिष्याती।।१६

बृहद्रथ नामक मौर्य शासक को मारकर उसके सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने स्वयं राज्य किया।

पुष्यमित्र शुंग(185 ईसापूर्व -149 ईसापूर्व ):-


पुष्यमित्र शुंग प्राचीन ब्राह्मण वंश से संबंधित था इनके ब्राह्मण होने के प्रमाण कई ग्रंथों से प्राप्त होते हैं जिनमें पतंजलि कृत महाभाष्य प्रमुख ग्रंथ है पतंजलि पुष्यमित्र शुंग के समय में थे।

इतिहासकार तारा नाथ ने पुष्यमित्र शुंग को साफ ब्राह्मण कहा है इसके अलावा हर्षचरित में भी उन्हें ब्राह्मण कहा गया है।

पुष्यमित्र से संबंधित अयोध्या में दो अभिलेख भी मिले हैं जिनमें उसे भारद्वाज गोत्रीय कहा गया है।

पुष्यमित्र शुंग और उनके पूर्वज मूल रूप से विदिशा के निवासी थे यह लोग प्रारंभ में मौर्य राजाओं के पुरोहित थे. मौर्य राजाओं के बौद्ध हो जाने के पश्चात संभवतया उनका पुरोहित्य जाता रहा और इन्होंने सैनिक के रूप में सेना में उच्च पदों पर अपनी सेवाएं देनी प्रारंभ की।


अंतिम मौर्य शासक वृहद्रथ के समय में पुष्यमित्र शुंग उसका सेनापति था बृहद्रथ अत्यंत दुर्बल एवं भोग विलासी शासक था हर्षचरित में उसे प्रतिज्ञा दुर्बल(प्रजा की रक्षा की प्रतिज्ञा में असमर्थ) कहा गया है उसकी दुर्बलता से शासन की सारी व्यवस्था शिथिल पड़ने लगी थी और राज्य के प्रमुख अधिकारी असंतुष्ट थे । इन परिस्थितियों में पुष्यमित्र शुंग ने सेना दिखाने के बहाने ले जाकर वृहद्रथ की हत्या कर दी और स्वयं मगध के सिंहासन पर आसीन हुआ।

इस घटना से पता चलता है कि वृहद्रथ अत्यंत दुर्बल शासक था वह सेना को भी अपने अधिकार में रखने में असमर्थ हो गया था। क्योंकि पुष्यमित्र का कोई विरोध नहीं हुआ ।

सिंहासन पर बैठने के पश्चात पुष्यमित्र शुंग के सामने अनेक कठिनाइयां आयीं। उत्तरवर्ती मौर्य शासकों की लगातार दुर्बलता से मगध का साम्राज्य षडयंत्र का केंद्र बन गया था षड्यंत्रकारी शक्तियां शासन को विभिन्न भागों में तोड़ने में लगी हुई थीं।

विदेशी आक्रमणकारियों ने देश के सीमावर्ती भागों पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया था।

राज्य का संगठन :-

पुष्यमित्र शुंग ने शासक बनने के पश्चात राज्य की समस्याओं को हल करने का प्रयास किया और काफी मात्रा में इसमें सफलता भी प्राप्त की थी।

उसने विदिशा(बेसनगर) को दूसरी राजधानी बनाया और वहां अपने पुत्र अग्निमित्र को सेना के साथ अवंति प्रांत का शासक नियुक्त किया।


सिंहासनारूढ़ होने के पश्चात पुष्यमित्र शुंग ने विदर्भ पर आक्रमण किया इसका विवरण कालिदास ने अपने ग्रंथ मालविकाग्निमित्रम् में दिया है ।


अंतिम मौर्य शासक वृहद्रथ का साला यज्ञसेन  विदर्भ का शासक था । पुष्यमित्र के पुत्र अग्निमित्र ने कूटनीति से काम लेकर यज्ञसेन के चचेरे भाई माधवसेन को अपनी ओर मिलाकर उसे अपनी अधीनता स्वीकार करने के लिए विवश कर दिया।

यवन आक्रमण :-

पुष्यमित्र शुंग के शासन की सबसे महत्वपूर्ण घटना देश पर यवनों का आक्रमण था यवन आक्रमणकारियों से देश की सुरक्षा पुष्यमित्र शुंग की इस राष्ट्र की बहुत बड़ी सेवा मानी जाती है।
यवनों के आक्रमण के विषय में विद्वानों में बहुत अधिक मतभेद है कुछ विद्वान मानते हैं कि उन्होंने दो बार भारत पर आक्रमण किया जबकि कुछ के अनुसार  यह आक्रमण एक ही बार हुआ।

भारत पर यूनानी आक्रमण का विवरण पतंजलि के महाभाष्य, गार्गी संहिता और कालिदास कृत मालविकाग्निमित्रम् में भी मिलता है। 

पतंजलि कृत महाभाष्य के अनुसार उन्होंने माध्यमिका (चित्तौड़ के पास) तथा साकेत(अयोध्या) का घेरा डाल दिया था।

गार्गी संहिता के अनुसार यूनानियों ने मथुरा, पांचाल, साकेत और पाटलिपुत्र पर अधिकार कर लिया था परन्तु उनमें फूट पड़ गई और वे आपस में ही लड़ने लगे।

कालीदास कृत मालविकाग्निमित्रम् के अनुसार पुष्यमित्र शुंग के पौत्र वसुमित्र ने यवन सेना को सिंधु नदी के किनारे घनघोर युद्ध करके परास्त किया जिससे वे सियालकोट (शाकल) तक ही सीमित रह गए।

यवनों के साथ युद्ध के विषय में विद्वानों के अलग अलग मत हैं कुछ के अनुसार यवन शासक डेमेट्रियस ने अपने सेनापति मिनांडर के साथ भारत पर आक्रमण किया था । एक सेना को लेकर डेमेट्रियस चित्तौड़ के पास पहुंचा और दूसरी सेना को लेकर मिनांडर अयोध्या की तरफ गया जबकि कुछ विद्वानों के अनुसार डेमेट्रियस के आदेश पर मिनांडर ने पहला आक्रमण किया और दूसरा आक्रमण उसने तब किया जब वह सियालकोट का शासक था।

कुछ विद्वानों के अनुसार यवनों ने तीन आक्रमण किए। परंतु इतना निश्चित है कि वे पराजित किए गए।

पुष्यमित्र शुंग मौर्यों द्वारा स्थापित भारत के साम्राज्य के एक बड़े भाग को बचाने में सफल हुआ और उसके पश्चात उसने अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया। अयोध्या में मिले एक लेख से पता चलता है कि पुष्यमित्र शुंग ने दो अश्वमेध यज्ञ किए थे।

उसके अश्वमेध यज्ञ का विवरण कालिदास कृत मालविकाग्निमित्रम् में मिलता है जिसमें पुष्यमित्र शुंग ने अपने पुत्र अग्निमित्र को एक पत्र लिखा था और यज्ञ में शामिल होने का निमंत्रण दिया था तथा उसने बताया था कि एक वर्ष के लिए छोड़े गए घोड़े को सिंधु नदी के तट पर घूमते हुए यवन शासक ने पकड़ लिया था और उस घोड़े को यवनों से उसके पुत्र (अग्निमित्र के पुत्र वसुमित्र) ने घनघोर युद्ध करके बलपूर्वक छुड़ा लिया।

शुंग साम्राज्य उत्तर में कश्मीर से लेकर दक्षिण में विदर्भ तक पूर्व में समुद्र से लेकर पश्चिम में सिंधु नदी के पास सियालकोट तक विस्तृत था। तिब्बती इतिहासकार तारानाथ के विवरण और दिव्यावदान से भी पता चलता है कि पुष्यमित्र शुंग का साम्राज्य सियालकोट तक था।


शुंग शासक मौर्य शासकों के विपरीत वैदिक मार्गी थे उन्होंने वैदिक धर्म का पुनरुत्थान किया जिसके कारण बौद्ध धर्मावलंबी उनसे ईर्ष्या करने लगे और बौद्ध ग्रंथों में उन्हें बौद्धों का शत्रु कहा गया।

बौद्ध ग्रंथ दिव्यावदान में वर्णन है कि पुष्यमित्र शुंग ने बहुत से बौद्ध विहारों को जलवा दिया और शाक़ल के पास यह घोषणा किया कि जो भी एक श्रमण(बौद्ध भिक्षु) के सिर को लाकर देगा उसे एक सौ दीनार का इनाम दिया जाएगा।

यह वर्णन अतिशयोक्ति पूर्ण है क्योंकि शुंग शासन में भी अनेक बौद्ध स्तूप बने थे व साँची के स्तूप की वेदिका बनी थी जो बौद्ध विरोधी होने पर संभव नहीं था । संभवतया सीमावर्ती क्षेत्र शाकल (सियालकोट) में इस घोषणा का कारण यह था कि बौद्ध विहार व्यभिचार का केंद्र बनते जा रहे थे और बौद्ध लोग शासन के विरुद्ध षड्यंत्र करते थे तथा विदेशियों को सहायता प्रदान करते थे जिसके कारण क्रुद्ध होकर पुष्यमित्र ने सीमावर्ती क्षेत्रों में  कुछ बौद्ध विहारों को नष्ट करने का आदेश दिया था।


पुष्यमित्र शुंग ने 36 वर्षों तक सफलतापूर्वक शासन किया और उसने भारतीय साम्राज्य को सुदृढ़ और सुरक्षित कर दिया उसके पश्चात उसका पुत्र अग्निमित्र सिंहासन पर बैठा परंतु उसके विषय में कोई विवरण हमें प्राप्त नहीं होता । अग्निमित्र के पश्चात उसका भाई ज्येष्ठ मित्र और उसके पश्चात अग्निमित्र का पुत्र वसुमित्र मगध के सिंहासन पर आरूढ़ हुआ ।


हर्ष चरित्र के लेखक बाणभट्ट के अनुसार मित्रदेव नामक एक व्यक्ति ने नाटक देखते समय वसुमित्र का सिर काट लिया था ।

पुराणों के अनुसार शुंग वंश के दस शासक हुए जिनके नाम हैं:-

  1. पुष्यमित्र
  2. अग्निमित्र
  3. सुज्येष्ठ
  4. वसुमित्र
  5. औद्रक
  6. पुलिंदक
  7. घोष
  8. वज्रमित्र
  9. भागवत
  10. देवभूति

शुंग वंश का नौवां शासक भागवत हुआ जिसने लगभग 32 वर्ष शासन किया। उसके शासनकाल में तक्षशिला के यूनानी शासक एंटियालकिदास के राजदूत डियास का पुत्र हेलिओडोरस विदिशा में आया था और उसने भागवत धर्म ग्रहण किया था और इसी याद में उसने बेसनगर में गरुड़ स्तंभ स्थापित कराया था ।इससे पता चलता है कि शुंग शक्तिशाली शासक थे और यवन उनसे मित्रता रखना चाहते थे।

शुंग वंश का अंतिम शासक और इसकी समाप्ति :-

शुंग वंश का अंतिम शासक देवभूति था वह अत्यंत ही भोग विलासी था। देवभूति के मंत्री वसुदेव ने 73 ईसापूर्व में रानी के वेश में छिपकर दासी के द्वारा उसका वध करवा दिया। इस प्रकार शुंग शासकों का 112 वर्ष का शासन समाप्त हुआ।
वसुदेव ने मगध के सिंहासन पर बैठ कर कण्व वंश की नींव डाली।

शुंग कालीन सभ्यता और संस्कृति:-है

शुंग कालीन शासकों के बारे में जानकारी बहुत कम प्राप्त होती है जो भी जानकारी मिलती है वह विभिन्न ग्रंथों में इधर-उधर बिखरी हुई है।
मौर्य शासकों के शासनकाल में बौद्ध धर्म का विकास हुआ सम्राट अशोक ने तो उसका प्रचार भारत के बाहर भी किया जिसके कारण वैदिक धर्म दब गया था। पुष्यमित्र शुंग वैदिक धर्मावलंबी था और उसके शासक बनने के पश्चात वैदिक धर्म का पुनरुत्थान हुआ ।

धार्मिक आचार:-

शुंग शासकों ने यज्ञ ,हवन और अन्य वैदिक कर्मकांडों को प्रोत्साहन दिया। श्रमण परंपरा के स्थान पर आश्रम व्यवस्था स्थापित की और यह निश्चित किया गया कि ब्रह्मचर्य ,गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास ये चारो आश्रम क्रम से पालन में लाए जाएंगे क्योंकि उस समय युवावस्था में ही बहुत सारे नवयुवक और नवयुवतियां भिक्षु वा भिक्षुणी बनते जा रहे थे।

शुंग वंश के नवें शासक भगवत के शासनकाल में तक्षशिला के शासक एंतियालकिदास का दूत हेलिओडोरस मगध में आया था ,वह भागवत धर्म का अनुयाई हो गया था और बेसनगर में विष्णु मंदिर के सामने उसने एक गरुड़स्तंभ स्थापित करवाया था।

साहित्य व कला :-

पुष्यमित्र शुंग के शासनकाल में पतंजलि कृत्य महाभाष्य की रचना हुई जो पाणिनि के अष्टाध्यायी पर लिखा गया संस्कृत का एक उच्च कोटि का ग्रंथ है। मनुस्मृति की रचना भी इसी काल में हुई। कुछ विद्वानों के अनुसार इसी काल में महाभारत के शांति पर्व और अश्वमेध पर्व का भी विस्तार हुआ। इस युग में संस्कृत भाषा का पुनुरुत्थान हुआ।

इसी काल में बेसनगर का गरुण स्तम्भ बना जो स्थापत्य कला का उत्कृष्ट नमूना है इसके अतिरिक्त अनेक भवन ,विहार बनाये गए। साँची के स्तूप की पत्थर की वेदिका भी इसी समय में बनी। इसमें पत्थर पर अंकित विभिन्न प्रकार की मुर्तिया प्रकृति के अधिक निकट हैं। शुंग कालीन कला का सम्बन्ध लौकिक जीवन से अधिक है।

स्त्रियों का स्थान :-

इस युग में स्त्रियों को सम्माननीय स्थान प्राप्त था परन्तु कुछ मात्रा में उनके अधिकार सीमित कर दिए गए थे।अब उन्हें मौर्य काल की व्यस्था के अनुसार पति से अलग होने का अधिकार नहीं था। कुछ विद्वान् इसका कारण बताते हैं कि पति से अलग होने के पश्चात बहुत सी स्त्रियां भिक्षुणी संघ में सम्मिलित हो कर उनकी संख्या बढ़ा देती थी।

व्यापार और मुद्रा :-

शुंग शासन काल में भी भारत का विदेशों से प्रचुर मात्रा में व्यापार होता था।

शुंग काल में विभिन्न प्रकार के सिक्कों का प्रचलन था सोने की मुद्रा को सुवर्ण,दीनार,सुवर्ण मासिक आदि कहा जाता था।

चांदी के सिक्के को पुराण अथवा धारण कहा जाता था।

तांबे के सिक्के को कर्षापण कहा जाता था।

इस प्रकार शुंग वंश का 112 वर्ष का शासन 185 ईसा पूर्व से 73 ईसा पूर्व तक चला। शुंगों ने अंतिम मौर्य शासकों के समय की बिखरती हुई व्यवस्था को सँभालने में अहम् भूमिका निभाई।

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