शक

शक जाति मध्य एशिया में सीर दरिया के उत्तर में रहने वाली खानाबदोश जाति थी। यह बर्बर और  असभ्य लोग थे।

शकों का भारत की ओर बढ़ना पश्चिमोत्तर चीन में उथल पुथल का परिणाम था। पश्चिमोत्तर चीन में यू ची(ऋषिक) नामक जाति रहती थी जिसको हिंग-नू(हूंण) जाति ने अपने स्थान से निर्वासित कर दिया और वे अपने स्थान से खिसक कर दक्षिण पश्चिम की ओर बढ़ने लगे वहां उनका सामना सीर दरिया के उत्तर में रहने वाले शक जाति से हुआ और शक जाति उनके दबाव से दक्षिण पश्चिम की ओर बढ़ गई और वहां बैक्ट्रियन साम्राज्य से टकराई और इस टकराव के परिणाम स्वरुप बैक्ट्रियन साम्राज्य उनके हाथों से ध्वस्त हो गया परंतु जब उन्होंने पार्थिया साम्राज्य पर आक्रमण किया तो उनका तीव्र विरोध हुआ।

शकों के प्रारंभिक आक्रमण से पर्थियन साम्राज्य को काफी हानि उठानी पड़ी परंतु 123-88 ईसा पूर्व में हुए शासक  मिथ्रदात द्वितीय ने शकों को बुरी तरह परास्त करके पूर्व की ओर धकेल दिया।

इसके कारण शक पूर्व में आकर सिंधु नदी के उस पार बलूचिस्तान और अफगानिस्तान के क्षेत्रों में बस गए उनका स्थान बाद में शकस्थान (सीस्तान) के नाम से जाना जाने लगा।

उस समय उज्जैनी में गर्दभिल्ल नामक शासक राज्य करता था वह शैव मतावलंबी था। उसके राज्य में रहने वाले जैन मतावलंबियों से उसका विरोध हो गया इसका विस्तृत वर्णन जैन ग्रंथ कालकाचार्य कथानक में दिया गया है इसमें कालकाचार्य नामक एक आचार्य ने शकों को भारत पर आक्रमण करने के लिए प्रोत्साहन प्रदान किया।

उस समय सीस्तान के शक पर्थियन शासक के अधीन थे वह किसी कारण से शकों से अप्रसन्न हो गया और शक सरदारों को कहलवा भेजा कि अपने सिर को काट कर मेरे सामने पहुंचा दो वरना पूरे परिवार को नष्ट होता देखना। इस समय कालकाचार्य ने शक स्थान पहुंचकर शक सरदारों को भारत पर आक्रमण करने का प्रस्ताव दिया और सहायता का पूरा आश्वासन दिया और इन परिस्थितियां में सरदारों ने भारत पर आक्रमण करने का निर्णय लिया यह घटना 71 ईसा पूर्व की है।

शकों ने बोलन दर्रे को पार किया और सिंधुक्षेत्र के गणराज्य को नष्ट किया उसके पश्चात उन्होंने सुराष्ट्र प्रांत पर आक्रमण करके उसपर अपनी सत्ता स्थापित किया।

फिर अवंति प्रांत पर आक्रमण किया और राजा गर्दभिल्ल को पराजित करके उज्जैनी पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया।

परन्तु वे अधिक समय तक उज्जयिनी पर अधिकार नहीं रख सके। 57 ईसा पूर्व में गर्दभिल्ल के पुत्र विक्रमादित्य ने अपनी शक्ति को संगठित किया और गणराज्यों का संघ बनाकर शकों पर आक्रमण किया। भीषण युद्ध के पश्चात शक पराजित हुए और उन्हें उज्जैनी से बाहर कर दिया गया। इस याद में विक्रम संवत का प्रवर्तन किया गया।

दूसरा शक आक्रमण:-

भारत पर दूसरा शक आक्रमण 78 ईसवी में हुआ। शकों ने अवंति ,सौराष्ट्र को जीतते हुए महाराष्ट्र पर भी अधिकार कर लिया। महाराष्ट्र पर आंध्र शासकों का शासन था ,शकों ने आंध्रों को महाराष्ट्र से धकेल कर अपनी सत्ता स्थापित किया था। महाराष्ट्र पर शकों के क्षहरात वंश ने शासन किया जिन्हें बाद में गौतमीपुत्र शातकर्णी ने महाराष्ट्र से निकला।
महाराष्ट्र व सुराष्ट्र प्रांत में शक वंश के प्रथम शासक का नाम भूमक था । उसने अपने नाम के सिक्के चलवाए जो सुराष्ट्र,गुजरात आदि स्थानों पर प्राप्त होते हैं।

भूमक के पश्चात क्षहरात वंश का सबसे शक्तिशाली  शासक नहपान था। नहपान एक विस्तृत राज्य का शासक था। उसने भारतीय राजनीति में भाग लिया और अपने पड़ोसी शासकों को प्रभावित किया उसने नासिक, कार्ले  आदि स्थानों पर अपने गुहा लेख भी  लिखवाए,अपने नाम के सिक्के भी चलवाये। उसकी लड़की का नाम दक्षमित्रा था वह वैदिक  धर्मावलंबी थी।

बाद में रुद्रदामन शक वंश का एक  प्रभावशाली शासक हुआ जिसने विभिन्न स्थानों को विजित किया तथा वशिष्ठ पुत्र श्री पुलवामी को भी परास्त किया था।रुद्रदामन के गिरनार अभिलेख से इन बातों का पता चलता है।

जैसे-जैसे शकों का निवास का समय भारत में बढ़ता गया वैसे-वैसे वे भारतीय धर्म और सभ्यता से प्रभावित होते गए और उन्होंने बौद्ध, जैन और वैदिक  धर्म अपनाया।

शकों का भारत पर जब पहला आक्रमण हुआ था तब वे गांधार क्षेत्र में तक्षशिला से आगे अधिकार नहीं कर  सके थे तथा अवन्ति पर अधिकार करने के बाद भी वहां ठहर नहीं सके थे । परंतु जैसे-जैसे भारतीय शासकों की शक्तियां कमजोर पड़ती गई। ये भारत के अंदरूनी भागों पर पहुंचना प्रारंभ कर दिए।

तक्षशिला के शक:-

अपने पहले आक्रमण के पश्चात शकों के कुछ जथ्थे तक्षशिला के पास रुक गए। तक्षशिला शाखा के शकों का सबसे प्रसिद्ध शासक मोग था उसने महाराज की उपाधि धारण किया था। इसमें सीमावर्ती क्षेत्रों पर और पंजाब के आसपास यूनानी सत्ता को समाप्त करके अपने अधिकार स्थापित किए थे।

मोग के पश्चात अय नामक शासक हुआ वह भी शक्तिशाली शासक था। अय के पश्चात शकों के जो शासक हुए वे दुर्बल थे और उनको समाप्त करके पल्हवों ने अपनी सत्ता स्थापित किया।

उज्जैनी के शक :-

भारत पर शकों का पहला आक्रमण 71 ईसा पूर्व में हुआ था और उन्होंने यह आक्रमण सीस्तान अथवा शक स्थान से किया था । बोलन दर्रा पार करके सिंधु नदी के क्षेत्र से होते हुए सुराष्ट्र पहुंचे और वहां से उन्होंने अवंति राष्ट्र पर आक्रमण किया और उज्जैनी को अपने अधीन कर लिया था परंतु वे अधिक समय तक वहां ना रह सके उज्जैनी के शासक गर्द भिल्ल के पुत्र विक्रमादित्य ने मालव गण का संघ बनाया और शकों पर आक्रमण करके उन्हें बाहर निकाल दिया।

 इस प्रकार लगभग 134 वर्ष तक उज्जैनी पर शकों ने आक्रमण करने का साहस नहीं किया।

परंतु उसके पश्चात 78 ईसवी में जामोतिक के पुत्र चष्टन ने उज्जैन में शक वंश की स्थापना किया।चष्टन का पुत्र जयदामन हुआ। जयदामन को पराजित करके आंध्र शासक गौतमीपुत्र शातकर्णी ने शकों को  बाहर निकाल दिया।

जयदामन का पुत्र रुद्रदामन हुआ जो अत्यंत शक्तिशाली शासक हुआ। वह एक बड़ा विजेता था उसने न केवल अवंति पर वरन मारवाड़, सिंधु, विदर्भ आदि स्थानों पर अपना राज्य स्थापित किया। रुद्रदामन ने आंध्र शासक वशिष्ठ पुत्र श्री पुलवामी को जो उसका दामाद भी था, दो बार  पराजित किया यह उसके गिरनार लेख से पता चलता है।

रुद्रदामन वैदिक धर्म का उपासक था और उसने संस्कृत भाषा और साहित्य को आश्रय दिया वह न्याय प्रिय और योग्य शासक था उसने जनता की भलाई के लिए  काफी धन खर्च करके चंद्रगुप्त मौर्य द्वारा  निर्माण कराई गई सुदर्शन झील की मरम्मत करवाई।

रूद्रदामन के पश्चात शकों की शक्ति दुर्बन होने लगी। सुराष्ट्र के आभीर शासक ईश्वर दत्त ने शकों को अत्यंत दुर्बल कर दिया परंतु उन्होंने पुनः अपनी शक्ति को संगठित किया और गुप्त शासन आने तक अपने अस्तित्व को बनाए रहे परंतु अंत में गुप्त शासक चंद्रगुप्त द्वितीय ने शकों की शक्ति को पूरी तरह से समाप्त कर दिया।

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