महात्मा बुद्ध और बौद्ध धर्म

जैन धर्म और बौद्ध धर्म का उदय भारतीय इतिहास की एक अत्यंत क्रांतिकारी घटना है यह दोनों धर्म अथवा संप्रदाय हिंदू धर्म के कर्मकांड एवं बाह्य आडम्बर और सामाजिक कुरीतियाँ जो उस समय समाज में प्रचलित हो चुकी थीं की प्रतिक्रिया स्वरूप लोगों में खूब प्रचलित हुये।महात्मा बुद्ध ने अपने उपदेश जनसाधारण की भाषा पाली में दिये।

जैन धर्म का प्रचार प्रसार तो भारत में ही हुआ जबकि बौद्ध धर्म का प्रचार भारत के अलावा एशिया के विभिन्न भागों में हुआ महात्मा बुद्ध को एशिया का प्रकाश (light of Ashia) कहा जाता है। बौद्ध धर्म के संस्थापक महात्मा बुद्ध का जन्म 563 ईसा पूर्व में कपिलवस्तु के लुंबिनी वन नामक स्थान पर हुआ था लुंबिनी वन वर्तमान में रुक्मिन देई नामक स्थान पर स्थित है।

कपिलवस्तु शाक्य गण की राजधानी थी सिद्धार्थ के पिता शुद्धोधन शाक्य गण के गण मुख्य थे और उनकी माता मायादेवी थी जो देवदह के गण मुख्य अंजन की पुत्री थी। जब सिद्धार्थ का जन्म हुआ उस समय उनकी माता माया देवी अपने पिता के घर जा रही थी और मार्ग में लुंबिनी वन के पास सिद्धार्थ का जन्म हुआ सिद्धार्थ के जन्म के सात दिन के पश्चात ही माया देवी का देहांत हो गया अब सिद्धार्थ का लालन-पालन उनकी मौसी प्रजापति गौतमी ने किया था।

महात्मा बुद्ध की मौसी प्रजापति गौतमी उनकी पहली महिला शिष्य बनीं।

सिद्धार्थ बचपन से ही विरक्त स्वभाव के थे जिसके कारण उनके पिता उनकी तरफ से चिंतित रहते थे बाद में एक सन्यासी उनके दरबार में आया और सिद्धार्थ के पिता के सपने के विषय में भविष्यवाणी किया तथा बताया कि सिद्धार्थ या तो बहुत बड़े राजा होंगे या बहुत बड़े सन्यासी इसके पश्चात राजा शुद्धोधन ने सिद्धार्थ के चारों तरफ विलास मय सामग्रियों को इकट्ठा कर दिया और मात्र 16 वर्ष की आयु में ही उनका विवाह राम ग्राम के कोलिय-गण के राजकुमारी यशोधरा से कर दिया जो अत्यंत ही सुंदर थी जिससे उन्हें एक पुत्र भी हुआ जिसका नाम राहुल था।

सिद्धार्थ प्राणियों के दुख को देखकर अत्यंत ही दुखी हो जाते थे और उनके अंदर विरक्ति भाव प्रबल होने लगता था इसलिए राजा शुद्धोधन ने यह व्यवस्था कर दी थी सिद्धार्थ को महल से बाहर नहीं जाने दिया जाए और यदि वे बाहर घूमना भी चाहें तो उनके निकलने के पहले ही सारी व्यवस्था कर दी जाए , मार्गो को स्वच्छ कर दिया जाए और दुखी, वृद्ध बीमार व्यक्तियों को दूर रखा जाए चारों तरफ केवल प्रसन्नता का ही वातावरण प्रदर्शित किया जाए। परंतु होनी को कुछ और ही मंजूर था।

एक बार नगर भ्रमण करते समय उन्हें एक बूढ़ा व्यक्ति दिखाई दिया उन्होंने अपने सारथी से पूछा कि यह व्यक्ति इतना अधिक जर्जर कैसे हो गया उनके सारथी ने उत्तर दिया कि प्रत्येक व्यक्ति को इसी प्रकार से बुढ़ापा अवश्य आएगा। उसके पश्चात एक बीमार व्यक्ति दिखा सिद्धार्थ के पूछने पर सारथी ने बताया कि कोई भी व्यक्ति बीमार हो सकता है। उसके पश्चात कुछ आगे जाने पर कुछ व्यक्ति एक शव को लेकर जा रहे थे सिद्धार्थ के पूछने पर उनके सारथी ने बताया कि प्रत्येक व्यक्ति को इसी प्रकार से मृत्यु प्राप्त होती है और मृत्यु से कोई भी नहीं बच सकता। अंत में सिद्धार्थ को एक सन्यासी दिखाई दिया।

इसके पश्चात राजकुमार सिद्धार्थ के मन में अत्यंत तीव्र विरक्ति भाव जागृत हो गया एक दिन सिद्धार्थ अपनी पत्नी यशोधरा और पुत्र राहुल को सोता हुआ छोड़कर रात में चुपके से उठे और दुख से छुटकारा पाने का उपाय खोजने के लिए निकल पड़े। महात्मा बुध के गृह त्याग को बौद्ध धर्म के अनुयाई महाभिनिष्क्रमण कहते हैं।

रात में शाक्य राज्य को पार करके सुबह सुबह वे गोरखपुर के पास ओमाना नदी के तट पर पहुंचे और अपने सारथी से कहा कि मेरे राजसी बाल काट दो और अपने राजसी वस्त्र और आभूषण सारथी को देकर विदा कर दिया।ज्ञान की खोज में घूमते हुए सिद्धार्थ मगध की राजधानी राजगृह पहुंचे जहां वे अलार और उदरक नामक दो ब्राह्मण तपस्वियों से मिले जिनके साथ मिलकर उन्होंने कठिन तपस्या किया परंतु उससे उन्हें कोई लाभ ना मिला। अंत में वे वहां से जाकर उरुवेला नामक स्थान पर पहुंचे जो गया के पास निरंजना नदी के किनारे स्थित था वहां उन्हें कौण्डिन्य ,वप्पा ,भादिया ,महानामा और अस्सागी नामक पांच अन्य साथी मिले और उनके साथ मिलकर उन्होंने कठोर तपस्या प्रारंभ कर दिया जिससे उनका शरीर अत्यंत कृशकाय हो गया परंतु इस पर भी उन्हें कोई ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ।

फिर उन्होंने शरीर को गला देने वाली कठिन तपस्या को व्यर्थ जानकर सीमित मात्रा में आहार-विहार लेना शुरू कर दिया जिससे उनके साथी उन्हें अपने मार्ग से भ्रष्ट जानकर उनसे अलग हो गए,उनसे अलग होने के बाद सिद्धार्थ लगातार एकाग्र चित्त होकर तपस्या करते रहे।

एक दिन वे एक पीपल के वृक्ष के नीचे ध्यान मग्न होकर बैठे थे उसी समय एक वैश्य की सुजाता नामक कन्या उनके पास खीर लेकर आयी खीर खाने के पश्चात उन्हें अपने हृदय में शक्ति का आभास हुआ और उसके पश्चात ध्यान लगाने पर उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई इस प्रकार लगातार छः वर्ष की कठिन तपस्या के पश्चात लगभग 35 वर्ष की आयु में सिद्धार्थ को बोधगया में पीपल वृक्ष के नीचे वैशाख पूर्णिमा के दिन ज्ञान की प्राप्ति हुई इसे बौद्ध ग्रंथों में सम्बोधि कहा जाता है और अब सिद्धार्थ बुद्ध कहलाने लगे। क्योंकि वे गौतम गोत्र के थे इसलिए गौतम बुद्ध कहलाये।ज्ञान प्राप्ति के पश्चात गौतम बुद्ध काशी की ओर चले गए और सारनाथ पहुंचे जहां पर उनके तपस्या के समय के 5 साथी उन्हें मिले।

साथियों ने उन्हें देखा तो उन्हें भोगवादी गौतम कहा परंतु उनके समीप पहुंचने पर महात्मा बुद्ध के मुख से अत्यंत तेजस्वी प्रकाश निकल रहा था इसे देखकर वे उनके साथी अत्यंत प्रभावित हुई और उठ कर उनका स्वागत किया। भगवान बुद्ध ने सबसे पहला उपदेश अपने उन पांच साथियों को ही दिया इसे बौद्ध ग्रंथों में धर्म चक्र प्रवर्तन कहा जाता है यह पांचों साथी उनके शिष्य हो गए और ये पंचवर्गीय कहलाए।इसके पश्चात भगवान बुद्ध जब तक जीवित रहे उन्होंने अपने धर्म का प्रचार प्रसार किया और लगातार 45 वर्षों तक अपने धर्म का प्रचार करते रहे।

महात्मा बुद्ध द्वारा बौद्ध धर्म का प्रचार एवं शरीर त्याग :-

महात्मा बुद्ध ने बौद्ध धर्म का प्रचार आम जनमानस की भाषा पाली में किया।

महात्मा बुध की कीर्ति जब चारों तरफ फैलने लगी तो काशी की एक बड़े सेठ का लड़का यश बुध का शिष्य हो गया और काशी में ही उनके 60 शिष्य हो गए। महात्मा बुद्ध ने अपने शिष्यों का एक संघ(संगठन) बनाया क्योंकि उनका जन्म गणराज्य में हुआ था इसलिए वह गणराज्य की व्यवस्था से पूर्णतया परिचित थे और इसी आधार पर उन्होंने बौद्ध संघ का निर्माण किया। विभिन्न स्थानों पर भिक्षुओं के अलग अलग संघ थे और सभी संघ अपने आप में स्वतंत्र थे। भिक्षु लोग संघ सभा में एकत्र होकर अपने कार्य का संपादन करते थे।

बौद्ध संघ के लिए सात अपरिहार्य धर्म उप दिष्ट किए गए-

1. एक साथ एकत्र होकर अपनी सभाएं करते रहना।
2.एक होकर संघ की बैठक करना और संघ के कार्यों का संपादन करना।
3.जो संघ द्वारा निश्चित नियम है उसका कभी भी उल्लंघन ना करना और जो संघ द्वारा निश्चित नियम नहीं है उसका अनुसरण नहीं करना। जो भिक्षुओं के लिए नियम चले आ रहे हैं उनका सदा पालन करना
4. जो अपने से बड़े स्थविर भिक्षु हैं धर्म अनुरागी एवं संघ के पिता हैं उनका आदर करना और उनकी बात को ध्यान से सुनना और अनुसरण करना।
5. तृष्णा का का सर्वथा त्याग करना।
6. एकांत में अपनी कुटिया में निवास करना।
7. सदैव यह स्मरण रखना कि संघ में केवल ब्रह्मचारी ही सम्मिलित हो और जो लोग सम्मिलित हो वह ब्रह्मचर्य का पालन करें।
बौद्ध संघ में स्थित भिक्षुओं के बैठने के स्थान नियत रहते थे। इस प्रकार से प्रचार करने से बौद्ध धर्म का बहुत तीव्र गति से प्रसार हुआ। काशी से लौटकर बुद्ध गया गए वहां से होते हुए राजगृह गए जहां पर सारिपुत्र और मोग्गलान नामक दो ब्राह्मण कुमारों को अपना शिष्य बनाया जिन्होंने बाद में बौद्ध धर्म के प्रचार में बहुत महत्वपूर्ण योगदान दिया। इसके पश्चात महात्मा बुद्ध अपनी जन्मभूमि शाक्य गणराज्य गए। जहां पर उनका पुत्र राहुल और सौतेला भाई नंद उनके शिष्य हो गए।

इसके पश्चात महात्मा बुद्ध ने वज्जि संघ , कोशल , अंग राज्यों में अपने धर्म का प्रचार- प्रसार किया। महात्मा बुद्ध अपने शिष्यों के साथ स्थान -स्थान पर जाते वहां किसी बाग बगीचे या गांव के बाहर किसी स्थान पर रुक जाते ,लोग उनके दर्शनों के लिए आते और वहाँ पर भी लोगों को उपदेश देते थे। नगर के धनवान व्यक्ति उन्हें अपना अतिथि बनाकर भोजन के लिए ले जाते थे वहां रह कर आम लोगों को अपने धर्म का उपदेश देते और अंत में अपने यजमान को भी उपदेश देते थे।

80 वर्ष की अवस्था में मल्लों की एक राजधानी पावापुरी में आकर उन्होंने चुन्द कर्मार नामक एक स्वर्णकार का आतिथ्य स्वीकार किया जहां पर उन्हें अतिसार रोग हो गया इसके पश्चात वे पैदल ही चल कर मल्ल राज्य की मुख्य राजधानी कुशीनगर के पास शालवन में पहुंचे वहां हिरण्यवती नदी के तट पर उन्होंने अपना डेरा डाला ।उनके स्वास्थ्य को देखते हुए उनके शिष्य बहुत चिंतित हुए उन्होंने अपने शिष्यों का आश्वासन दिया कि तुम लोग चिंता मत करो मेरे ना रहने पर मैंने तुम्हें जो उपदेश दिया है वही तुम्हारा गुरु होगा तुम लोग उसी का अनुसरण करना। उन्होंने कहा शिष्यों जो आता है वह जाता अवश्य है इसलिए बिना रुके प्रयत्न करते रहो और अंत में उन्होंने 483 ईसा पूर्व में अपने प्राण त्याग दिए इस घटना को महापरिनिर्वाण कहा जाता है।

कहा जाता है कि महात्मा बुध ने अपना अंतिम उपदेश भद्रक नामक शिष्य को दिया था।

बुद्ध के शरीर का दाह संस्कार कुशीनगर में राम संभार सरोवर के किनारे  किया गया जहां पर एक स्तूप बना दिया गया ।उनका मुख्य निर्वाण स्तूप शालवन में उनकी देह त्याग के स्थान पर बना है।

महात्मा बुद्ध की शिक्षाएं :-

महात्मा बुद्ध के अनुसार संसार में दुख ही दुख है और इन दुखों के संदर्भ में उन्होंने चार आर्य सत्यों का उपदेश किया-

दुख , दुख समुदाय , दुख निरोध , दुख निरोध गामिनी प्रतिपदा।

महात्मा बुद्ध ने दुख से मुक्ति के लिए भी मार्ग बताया जिसे अष्टांगिक मार्ग कहा जाता है यह साधन है :-

सम्यक दृष्टि ,सम्यक संकल्प ,सम्यक वाणी , सम्यक कर्मान्त , सम्यक जीवन , सम्यक व्यायाम , सम्यक स्मृति और सम्यक समाधि

बुद्ध ने निर्वाण प्राप्ति करने के लिए उन्हें सरल बनाने के लिए 10 शीलों पर भी बल दिया।

सत्य ,अहिंसा ,अस्तेय (चोरी न करना ) ,अपरिग्रह (आवश्यकता से अधिक चीजों का संचय न करना ) ,मद्द(मदिरा ) सेवन ना करना , असमय भोजन ना करना ,सुखप्रद बिस्तर पर नहीं सोना ,धन संचय ना करना ,स्त्रियों से दूर रहना ,नृत्य गान आदि से दूर रहना।

गृहस्थों के लिए केवल 5 शील तथा भिक्षुओं के लिए दसों शील मानना अनिवार्य था।

महात्मा बुद्ध ने मध्यम मार्ग यानी मध्यम प्रतिपदा का उपदेश दिया। इसका अर्थ होता है ना तो अधिक कठोर तप करना ना ही भोगवादी बनना वरन सीमित मात्रा में आहार-विहार करना।

भिक्षु और उपासक दो प्रकार के व्यक्ति थे भिक्षु वे होते थे जिन्होंने बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार के लिए सन्यास ग्रहण कर लिया है। जबकि उपासक वे होते थे जो गृहस्थ जीवन व्यतीत करते थे और बौद्ध धर्म अपनाते थे।

बौद्ध संघ में प्रवेश करने की न्यूनतम आयु सीमा 15 वर्ष थी।

बौद्ध धर्म में प्रविष्ट होने को उप संपदा कहा जाता था।

बौद्ध धर्म के त्रिरत्न हैं :- बुद्ध, धम्म र्और संघ।

बौद्ध धर्म अनीश्वर वादी और अनात्मवादी है अर्थात वह ईश्वर की सत्ता को नहीं मानता तथा यह आत्मा को भी नहीं मानता ,जबकि जैन धर्म ईश्वर को नहीं मानता जबकि वह आत्मा को मानता है किन्तु बौद्ध धर्म कर्म एवं पुनर्जन्म को मानता है। बौद्ध धर्म के अनुसार ईश्वर और आत्मा जैसी कोई चीज नहीं होती सभी जीव प्रकृति के नियमों से बंधे हैं और उसी से आपने आप सब काम होता है।

बौद्ध संगतिया-

महात्मा बुद्ध के परिनिर्वाण के पश्चात बौद्ध धर्म में संगतियों का आयोजन किया गया बौद्ध धर्म में कोई चार संगतिया आयोजित की गई।

प्रथम बौद्ध संगति :-

प्रथम बौद्ध संगति 483 ईसा पूर्व में उस समय के मगध की राजधानी राजगृह में आयोजित की गई इसकी अध्यक्षता महा कश्शप ने की थी और उस समय मगध का राजा अजातशत्रु था।

द्वितीय बौद्ध संगति :-

बौद्ध धर्म की द्वितीय बौद्ध संगीति का आयोजन 383 ईसा पूर्व में वैशाली में आयोजित की गई थी इस संगति की अध्यक्षता सर्वकामी ने की थी और इसका आयोजन मगध के शासक कालाशोक ने किया था।

तृतीय बौद्ध संगति :-

तृतीय बौद्ध संगीति का आयोजन 250 ईसा पूर्व में पाटलिपुत्र में हुआ था इसकी अध्यक्षता मोगलिपुत्त तिस्स ने की थी और इसका आयोजन सम्राट अशोक के शासनकाल में हुआ था इस बौद्ध संगति में विनय पिटक और सुत्त पिटक की पृष्ठभूमि में ही एक अन्य धर्म ग्रंथ को जोड़ा गया जिसे कथावत्थु कहा गया बाद में इसे अभिधम्म पिटक भी कहा गया इस प्रकार त्रिपिटक बने।

चतुर्थ बौद्ध संगति(संप्रदाय का विभाजन) :-

चौथी बौद्ध संगति 80 ईसवी में कुषाण शासक कनिष्क के शासनकाल में कश्मीर के कुन्डन वन में आयोजित की गई इसकी अध्यक्षता वसुमित्र ने की थी और उपाध्यक्ष आचार्य अश्वघोष थे इस बौद्ध संगति में महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं से संबंधित एक अन्य ग्रंथ विभाषाशास्त्र को भी जोड़ा गया और अश्वघोष रचित बुद्धचरित भी इसी का हिस्सा है। इसी बौद्ध संगति में बौद्ध धर्म हीनयान और महायान में विभाजित हो गया।

हीनयान बौद्ध महात्मा बुद्ध को भगवान नहीं मानते थे वे उनकी शिक्षाओं को ग्रहण करके उनका अनुसरण करते थे जबकि महायान बौद्ध बुद्ध को ईश्वर का रूप मानकर उनकी पूजा करते थे।

बौद्ध धर्म ग्रंथ:-

त्रिपिटक :-

पिटक का अर्थ होता है पिटारा जिस प्रकार पिटारा में बहुत सारी सामग्री बंद होती है उसी प्रकार से त्रिपिटक में भी जो कि 3 ग्रंथ हैं उसमें बौद्ध धर्म से संबंधित विभिन्न प्रकार की सामग्रियां भरी पड़ी हैं त्रिपिटक में महात्मा बुद्ध के उपदेश  आचार शील आदि से संबंधित नियम महात्मा बुध की शिष्यों के साथ चर्चाएं लंबे प्रवचन आदि सभी स्थित है आइए त्रिपिटक के बारे में एक-एक करके जानते हैं

विनय पिटक :-

विनय पिटक के अंदर भिक्षु संघ और भिक्षुणी संघ की विनय शील व आचार संहिताओं का संकलन है इसने विनय शील आचार्य आदि की उत्पत्ति का कारण वह वर्णन तथा महात्मा बुद्ध के द्वारा विभिन्न परिस्थितियों में विभिन्न शील व विनय के पालन के संबंध में उपदेश दिए गए हैं।

सुत्त पिटक :-

सुत्त पिटक में भगवान बुद्ध की उनके निकटतम शिष्यों के साथ देशनाओं और विभिन्न वार्ताओं एवं चर्चाओं का संदर्भ सहित वर्णन किया गया है त्रिपिटक को पांच भागों में विभाजित किया गया है-

दीघ निकाय, मज्झिम निकाय , समुत्त निकाय ,अंगुत्तर निकाय ,खुद्दक निकाय।

दीघ निकाय :-

दीघ निकाय लंबे प्रवचनओं का संग्रह है। दीघ निकाय के अंतर्गत 34 सूत्रों का संकलन किया गया है इसके अंतर्गत स्थित `सिगालोबाद सुत्त में गृहस्थों के विनय का उल्लेख किया गया है।

मज्झिम निकाय :-

मज्झिम निकाय में छोटे प्रवचन हैं. मज्झिम का अर्थ होता है मध्यम। मज्झिम निकाय के अंतर्गत भी 34 सूत्र हैं इनमें से आनापान सति सूत्र में भगवान बुद्ध ने भिक्षुओं को ध्यान की विधि सिखाई है। अंगुलिमाल सूत्र में अंगुलिमाल डाकू के डाकू से भिक्षु बनने की घटना का वर्णन दिया गया है।

समुत्त निकाय :-

समुत्त निकाय में बौद्ध भिक्षुओं को संयुक्त रूप से भगवान बुद्ध के द्वारा दी गई शिक्षाओं का वर्णन है।

अंगुत्तर निकाय :-

अंगुत्तर निकाय के अंतर्गत 8777 सूत्रों को संकलित किया गया है यह सूत्रों का ही एक अंग है इसीलिए इसे अंगुत्तर निकाय कहा जाता है।

खुद्दक निकाय :-

खुद्दक का अर्थ होता है खुदरा अर्थात इसमें छोटे-छोटे ग्रंथों का संकलन किया गया है। इसके अंतर्गत कुल 15 ग्रंथ हैं इनमें से धम्म पद अत्यंत महत्वपूर्ण है। धम्म पद को बौद्धों की बाइबल कहा जाता है।

अभिधम्म पिटक :-

अभिधम्म पिटक विनय पिटक और सुत्त पटक से निकला है यह इन दोनों की दार्शनिक व्याख्या है अभिधम्म पिटक एक वैज्ञानिक ग्रंथ है इसमें भगवान बुद्ध की शिक्षाओं को वैज्ञानिक रूप देने का प्रयास किया गया है मनुष्य के शरीर मन वाणी इंद्रियों अणु परमाणु आदि का तात्विक विवेचन किया गया है अभिधम्म पिटक में 7 मुख्य ग्रंथ हैं जिनमें कथावत्थु प्रमुख है। प्रारम्भ में कथावत्थु था बाद में व्यापक होकर अभिधम्म पिटक हो गया।

बौद्धधर्म प्रसार भारत के बाहर :-

बौद्ध धर्म का प्रचार- प्रसार महात्मा बुद्ध ने 80 वर्ष की उम्र तक पूरी तन्मयता से किया जिसके कारण बौद्ध धर्म मैं लोगों की आस्था बलवती होती चली गई और इसका विकास बहुत तीव्र गति से भारत के विभिन्न भागों में हुआ। बौद्ध धर्म भारत तक ही सीमित नहीं रहा वरन यह एशिया के अन्य भागों में फैलने लगा। भारत के बाहर बौद्ध धर्म के प्रचार का प्रमुख श्रेय सम्राट अशोक को था। भब्रु के अभिलेख के अनुसार अपने शासन के 18 वें वर्ष में  देवानाम प्रिय प्रियदर्शी अशोक ने पाटलिपुत्र में तीसरी बौद्ध संगति का आयोजन किया इस संगति के पूर्ण होने के पश्चात सम्राट अशोक ने विभिन्न प्रतिभाशाली भिक्षुओं के दल को भारत के अन्य भागों और एशिया के विभिन्न भागों में बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार के लिए भेजा इसका इसका उल्लेख श्रीलंकाई ग्रंथ दीपवंश एवं महावंश में भी मिलता है। अशोक ने विभिन्न स्थानों पर विभिन्न भिक्षु दल भेजे इनमें से-

उन्होंने अपने पुत्र महेंद्र एवं पुत्री संघमित्रा को श्रीलंका भेजा।

महारक्षित को यवन देश  भेजा।

सोन और उत्तर को स्वर्ण भूमि( म्यामार ,जावा ,सुमात्रा) में भेजा।

मज्झिम को नेपाल भेजा।

चीन में बौद्ध धर्म के प्रचार का श्रेय आचार्य काश्यप मातंग और आचार्य धर्म रक्षा को जाता है जिन्होंने हान साम्राज्य में बौद्ध धर्म का प्रचार किया।

तिब्बत और भूटान में बौद्ध धर्म का प्रचार पद्मसंभव ने किया था।

महायान संप्रदाय के प्रभाव के कारण बाद में महात्मा बुद्ध की मूर्तियाँ भी बनने लगीं। महात्मा बुद्ध की सर्वाधिक मूर्तियों का निर्माण गांधार शैली में किया गया। सम्भवतया इनकी सबसे पहली मूर्ति का निर्माण मथुरा कला के अंतर्गत किया गया था।

इस प्रकार हमने देखा कि महात्मा बुद्ध के विषय में उनके बचपन में ही राजा शुद्धोधन के सम्मुख सन्यासी द्वारा की गई भविष्यवाणी कि या यह चक्रवर्ती सम्राट बनेगा या फिर बहुत बड़ा संत होगा सही सिद्ध हुई क्योंकि महात्मा बुद्ध एक महान संत हुये और बौद्ध धर्म के माध्यम से उनका एक विशाल धार्मिक चक्रवर्ती साम्राज्य स्थापित हुआ और उन्हें एशिया का प्रकाश (light of Ashia) कहा गया ।

बाद के समय में महात्मा बुद्ध को भगवान विष्णु का नौवाँ अवतार माना जाने लगा।

बौद्ध धर्म की विश्व को देन:-

महात्मा बुद्ध ने मानवता को सत्य, अहिंसा, जीवों पर दया की शिक्षा दी। सम्पूर्ण संसार को शांति,सौहार्द पालन का मार्ग दिखाया।

बौद्ध धर्म का भारतीय समाज पर प्रभाव:-

राजकुमार सिद्धार्थ ने संसार में व्याप्त दुखों से द्रवित होकर अपना घर बार त्याग दिया और छ: वर्ष की कठिन साधना के पश्चात बोधगया में बोधि वृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ जिससे उन्होंने संसार में व्याप्त दुखों से मुक्ति का उपाय जान लिया।

महात्मा बुद्ध ने बताया कि प्रत्येक व्यक्ति अपने स्वयं के परिश्रम से संसार के दुखों से मुक्त हो सकता है उनके अनुसार संसार में ना तो ईश्वर है ना ही आत्मा सभी जीव जंतु प्रकृति के नियमों से बंधे हुए हैं इसी कारण बार-बार जन्म लेते हैं।

महात्मा बुद्ध ने जब बौद्ध धर्म का प्रचार शुरू किया तो लोगों को इसकी शिक्षाएं सुनकर नवीन अनुभव हुआ। वैदिक धर्म के कर्मकांडों की अधिकता वह जात पात से तंग आकर लोगों ने इसे तीव्र गति से अपनाना शुरू कर दिया। अनेक देशी विदेशी राजाओं ने भी इसे अपनाया। जिनमें सम्राट अशोक और कनिष्क का नाम उल्लेखनीय है।

महात्मा बुद्ध ने मानवता को सत्य, अहिंसा, जीवमात्र से प्रेम का पाठ पढ़ाया।

बौद्ध धर्म राष्ट्रीयता के स्थान पर अंतर्राष्ट्रीयता में विश्वास करता था इसका हानिकारक प्रभाव समाज पर पड़ा। राष्ट्रीयता के स्थान पर अंतर्राष्ट्रीयता का विकास हुआ। राष्ट्रीय भावना,शत्रु से घृणा का भाव , युद्ध वीरता यह सारे भाव समाप्त होने लगे । राष्ट्र की सुरक्षा के लिए शत्रुओं से घृणा और राष्ट्रीयता का भाव आवश्यक होते हैं जबकि अंतरराष्ट्रीयता राज्य की सुरक्षा के लिए घातक होती है।

बौद्ध धर्म की अहिंसक नीति भारत की जनता के लिए उपयोग में आने वाली थी परंतु  मध्य एशिया और यूनानी आक्रमणकारियों के लिए जो केवल शस्त्र की भाषा समझते थे कैसे कारगर हो सकती थी।

बौद्ध धर्म स्थलों को विहार,चैत्य,स्तूप,पैगोडा आदि कहा जाता है।

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