परमार वंश

परमार वंश का उदय दसवीं शती ईसवी में मालवा में हुआ था ये राष्ट्रकूट वंश से संबंधित थे।

मालवा में पहले प्रतिहार शासकों का राज्य था। परंतु जैसे-जैसे उनकी शक्ति क्षीण होती गई परमार वंश के वीरों ने वहां पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया।

भारत के चार क्षत्रिय राजवंशों का अग्नि कुंड से  उत्पत्ति का सिद्धांत प्रचलित हुआ जिसमें प्रतिहार,चालुक्य, चौहान और परमार हैं।

अनुश्रूति  के अनुसार परमार को वशिष्ठ ने नंदिनी की रक्षा के लिए अग्निकुंड से बनाया था।

परमार वंश का संस्थापक परमार नामक व्यक्ति था परंतु सुदृढ़ राजनीतिक शक्ति के रूप में इस वंश की स्थापना 910 ईसवी में कृष्णराज ने की थी जिसे उपेंद्र भी कहा जाता है।

वह राष्ट्रकूट शासकों का सामंत था।

परमार वंश का प्रथम स्वतंत्र शासक श्रीहर्ष था और इसने खोट्टिक नामक राष्ट्रकूट राजा को हराया था और राजस्थान में स्थित हूणों को भी पराजित किया। 

उसने 948 से 973 ईसवी तक राज्य किया।

परमार शासक वाक्पति मुंज:- 

वाक्पति मुंज 973 ईसवी में सिंहासन पर बैठा।


वह अपने वंश का एक शक्तिशाली शासक था उसने श्रीवल्लभ की उपाधि धारण की थी उसने  कलचुरी वंश के त्रिपुरी के शासक युवराज द्वितीय को पराजित किया था तथा उदयपुर प्रशस्ति के अनुसार कर्णाट, केरल और लाट(गुजरात) के राजाओं को पराजित किया था।

वाक्पति मुंज ने कल्याणी के चालुक्य शासक तैलप द्वितीय को पराजित किया जो एक शक्तिशाली शासक था। मेरुतुंग के प्रबंध चिंतामणि के अनुसार उसने तैलप द्वितीय को 6 बार हराया और उसके कुछ भाग पर अपना अधिकार भी कर लिया।

जब सातवीं बार चालुक्य शासक तैलप द्वितीय को पराजित करने के लिए गोदावरी नदी के उस पार गया तो स्वयं पराजित हो गया और बंदी बना लिया गया परंतु बंदी ग्रह से भागने का षड्यंत्र करने पर उसे मार दिया गया। 

वाक्पति मुंज विद्वानों का आश्रयदाता था। उसकी सभा में दशरूपक के लेखक धनंजय, धनिक,भट्ट हलायुधा,अमित गति आदि विद्वान रहते थे।

उसने अनेकों मंदिरों व सरोवरों का निर्माण कराया। 

वाक्पति मुंज के बाद उसका भाई सिंधु राज जिसने नवसाहसांक की उपाधि धारण की थी सिंहासन पर बैठा वह भी एक वीर शासक था उसने राजस्थान के हूण राज्य दक्षिण कोशल, लाट और दूसरे राज्यों पर भी आक्रमण किया। परिमलगुप्त के नवसाहसांक चरित्र में उसके सिंहासन पर बैठने का वर्णन है। 

भोज:-

सिंधुराज के पश्चात 1018 ईसवी में उसका पुत्र भोज सिंहासन पर बैठा यह परमार वंश का सबसे अधिक प्रतापी शासक था। उदयपुर प्रशस्ति के अनुसार उसने गुजरात, कर्णाट, गुर्जर और  तुरुष्कों(तुर्कों) से युद्ध किया।
उसने अपने चाचा वाक्पति मुंज की मृत्यु का बदला लेने के लिए चालुक्य राज्य पर आक्रमण किया है और राजा विक्रमादित्य चतुर्थ को परास्त किया परंतु कुछ समय बाद ही जयसिंह द्वितीय ने उसे पराजित कर दिया और मालवा संघ को विखंडित कर दिया।

इसके पश्चात भोज ने कलचुरी शासक गांगेय देव को पराजित किया तथा कान्यकुब्ज पर अधिकार कर लिया। कहा जाता है कि बिहार के पश्चिमी भाग पर भोज परमार के आधिपत्य के कारण आरा और उसके आसपास का प्रदेश भोजपुर कहलाता है।

जब सौराष्ट्र राज्य पर तुर्कों ने आक्रमण किया तो राजा भोज ने उन्हें पराजित करके भगा दिया।

गुजरात के सोलंकी राज्य पर भी उसने आक्रमण किए और वहां से काफी धन दौलत प्राप्त किया।

परंतु से निरंतर युद्ध करने पड़े जिसके कारण उसकी शक्ति कमजोर पड़ने लगी और अंत में चंदेल राजा विद्याधर के साथ युद्ध में पराजय का सामना करना पड़ा।

उदयपुर प्रशस्ति के अनुसार अंत में भोज के राज्य पर गुजरात के सोलंकियों और त्रिपुरी के कलचुरियों ने एक संघ बनाकर आक्रमण कर दिया परंतु राजा भोज युद्ध से पहले ही मृत्यु को प्राप्त हो गया था और उसके शत्रुओं ने उसकी राजधानी धारा व मालवा में लूटपाट की।

भोज की सामाजिक एवं सांस्कृतिक उपलब्धियां:-

राजा भोज एक वीर योद्धा होने के साथ योग्य शासन प्रबंधक, न्याय प्रिय, विद्या एवं कला को आश्रय देने वाला, विद्वानों का आदर करने वाला शासक था।

उसने कविराज की उपाधि धारण की थी वह स्वयं विद्वान था और उसने व्याकरण, दर्शन, गणित, वास्तु कला, साहित्य आदि पर अनेक पुस्तकें लिखीं। उसके द्वारा लिखित पुस्तकें समरांगण सूत्रधार आयुर्वेद सर्वस्व, शब्दानुशासन, सरस्वती कंठाभरण, युक्त कल्पद्रुम आदि हैं।

राजा भोज ने धारा में सरस्वती कंठाभरण नामक विद्यालय की स्थापना की जो भोजशाला कहलाया बाद में मुसलमानों ने उसको तोड़कर मस्जिद बना दिया।

उदयपुर प्रशस्ति के अनुसार राजा भोज ने करीना गुरु भवनों का निर्माण कराया तथा शिव मंदिरों का निर्माण कराया।

धारा के पास उसने भोजपुर नगर बसाया।

उसने भोज सागर नामक विशाल तालाब का निर्माण कराया जिसके जरिए किसानों के खेतों के बड़े भाग पर सिंचाई होती थी ।

बाद में मुसलमानों के कब्जे के पश्चात मांडू के शाह हुसैन ने उसके बांधों को तुड़वा दिया और उस तालाब को सुखा दिया जिससे लोग पानी के लिए त्राहि -त्राहि करने लगे।

भोज की मृत्यु 1060 ईसवी में हुए और उसने एक लंबे काल तक शासन किया।

उदयपुर प्रशस्ति के अनुसार:- 

शासितम विहितम दत्तम ज्ञातम यद्यन्न केनचित।

किमन्यत कविराजस्य श्री भोजस्य प्रशस्यते।

जय सिंह:-

भोज के पश्चात जयसिंह उसका उत्तराधिकारी हुआ और उसने चालुक्य शासक सोमेश्वर प्रथम की सहायता लेकर गुजरात के भीम और कलचुरी शासक कर्ण को मालवा से भगा दिया परंतु उसकी शक्ति धीरे-धीरे क्षीण होने लगी उसे लगातार पड़ोसियों के साथ युद्ध करना पड़ा।

कुछ समय बाद परमार शासक उदयादित्य ने अपनी शक्ति को स्थिर किया परंतु उसके वंशज उसे संभाल ना सके और परमार राज्य का धीरे-धीरे ह्रास होने लगा।

अंत में 1305 ईसवी में अलाउद्दीन खिलजी की सेना ने मालवा पर आक्रमण करके परमार राज्य को समाप्त कर दिया।

इसे देख सकते हैं:-

भारत कोश

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