चाहमान वंश

चाहमान वंश(चौहान वंश) का उदय शाकंभरी के आसपास हुआ। वे अपने आपको सूर्यवंशी क्षत्रीय कहते थे। ये प्रारंभ में सामंत की स्थिति में थे। बाद में इस वंश के चाहमान नामक शक्तिशाली विजेता ने स्वतंत्र राज्य की स्थापना की और उसी के नाम से ये चाहमान वंशीय कहलाए।

चाहमान वंश(चौहान वंश) राजपूत वंश था जिसके बारे में चंदबरदाई ने पृथ्वीराज रासो में लिखा था।इस ग्रंथ के अनुसार प्रतिहार,चालुक्य, परमार, चौहानों की उत्पत्ति वशिष्ठ, गौतम, अगस्त्य आदि ऋषियों की यज्ञ की रक्षा के लिए अग्नि कुंड से होने की बात कही है।

इस वंश के प्रारंभिक राजा वासुदेव और गूवक थे।

चाहमान वंश का इतिहास जानने के स्रोत:-

चंदबरदाई कृत पृथ्वीराज रासो, जोधराज कृत हम्मीर रासो,जयानक भट्ट कृत पृथ्वीराज विजय। मिन्हाजुद्दिन का तबकाते नासिरी,अबुल फजल का आइने अकबरी,अजमेर संग्रहालय का शिलालेख,दिल्ली शिवालिक लेख आदि हैं।

विग्रह राज चौहान वंश का एक प्रसिद्ध राजा था। 973 ईसवी में दुर्लभ राज नामक इनका एक राजा हुआ। इसके पश्चात अन्य कई राजा हुए।

बारहवी शती में अजयराज नामक राजा हुआ जिसने अजयमेरू राज्य की स्थापना किया। जो आधुनिक अजमेर कहलाता है।अजय राज का पुत्र अनुराज हुआ जिसने आना सागर झील और बांध बनवाया था तथा मुस्लिम आक्रमणकारियों का सफल प्रतिरोध किया था। 1150 ईसवी में उसका युद्ध गुजरात के सोलंकी राजा कुमारपाल से भी हुआ था।

अर्णोराज के पश्चात उसका पुत्र चतुर्थ विग्रहराज जिसे बीसलदेव भी कहा जाता है सिंहासन पर बैठा।

बीसलदेव:-

अर्णोराज के पश्चात 1153 ईस्वी में बीसलदेव चाहमानो का राजा हुआ। वह एक प्रतापी राजा था। दिल्ली शिवालिक प्रशस्ति के अनुसार उसने हिमालय और विंध्याचल के बीच के सभी प्रदेशों को जीत लिया था।

मुसलमान पंजाब से आगे बढ़कर अब धीरे-धीरे मध्य भारत की ओर आने लगे थे।

बीसलदेव ने मुस्लिम आक्रांताओं को हराकर मध्य भारत से बाहर निकाल दिया।

बिजोलिया शिलालेख के अनुसार बीसलदेव ने गहड़वाल राजा विजय चंद से दिल्ली जीत लिया था। बीसलदेव एक लोक कल्याणकारी शासक था उसने अर्णो राज द्वारा बनवाई गई अनासागर झील का पुनर्निर्माण कराया।

बीसलदेव स्वयं विद्वान था उसने हरकेलि और ललित विग्रहराज नामक दो नाटकों की रचना की तथा  अजमेर में एक संस्कृत महाविद्यालय का निर्माण करवाया और इन नाटकों को महाविद्यालय की दीवारों पर अंकित करवाया।
इसे बाद में कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा तोड़कर अढ़ाई दिन का झोपड़ा नामक मस्जिद बनवाई गई परंतु उन पत्थरों पर लिखे गए इन नाटकों के कुछ अंश मस्जिद में पाए जाते हैं।

बीसलदेव का पुत्र अपर गांगेय हुआ जिसे बगल करके बीसलदेव के भतीजे द्वितीय पृथ्वीराज ने राज्य हथिया लिया। पृथ्वीराज का उत्तराधिकारी बीसलदेव का छोटा भाई सोमेश्वर हुआ और सोमेश्वर का उत्तराधिकारी पृथ्वीराज तृतीय हुआ।

पृथ्वीराज तृतीय:-

पृथ्वीराज तृतीय 11 से 71 ईसवी में अजमेर के सिंहासन पर बैठा।पृथ्वीराज तृतीय एक साहसी और बहादुर शासक था वह एक युद्ध प्रिय सैनिक था इस कारण उसने अपने आसपास के क्षेत्रों पर आक्रमण किया जिसके कारण अपने पड़ोसी राज्यों से उसकी शत्रुता हो गई।

उसने 1182- 83 में चंदेल राजा परमर्दिदेव पर आक्रमण करके उसे पराजित कर दिया।

उसके समय में गहढ़वाल का शक्तिशाली राजा जयचंद था । पृथ्वीराज के पूर्वज बीसलदेव ने गहढ़वाल शासक विजयचंद्र को पराजित करके दिल्ली उनसे छीन लिया था। जिससे इन दोनों राज्य में शत्रुता हो गई। जब गहढ़वाल राजा जयचंद ने अपनी पुत्री संयोगिता का स्वयंवर निश्चित किया तो उसमें पृथ्वीराज तृतीय को आमंत्रित नहीं किया वरन अपमान स्वरूप उनके दरवाजे पर उसकी मूर्ति खड़ी करवा दी।

इसके पश्चात पृथ्वीराज तृतीय सेना लेकर पहुंच गया और उसने संयोगिता का अपहरण कर लिया इसके परिणाम स्वरूप इन दोनों राज्यों में घोर शत्रुता हो गई।

भारतीय इतिहास को पृथ्वीराज और जयचंद की आपसी शत्रुता बहुत महंगी पड़ी उसी समय शहाबुद्दीन मोहम्मद गोरी के नेतृत्व में तुर्क भारत पर आक्रमण कर रहे थे।

पृथ्वीराज और मोहम्मद गोरी के बीच युद्ध:-

1191 ईसवी में मुहम्मद गोरी ने भारत पर आक्रमण किया। पृथ्वीराज ने उत्तर भारतीय राजाओं का एक सैनिक संघ बनाया और तराइन के युद्ध में तुर्कों से मुठभेड़ की। तुर्क बुरी तरह से हारे और गोरी घायल होकर भाग खड़ा हुआ।

इस पराजय को शहाबुद्दीन गोरी भूल नहीं सका। उसने तैयारी प्रारंभ कर दी और 1192 ईसवी में पूरी तैयारी के साथ उसने आक्रमण किया। पृथ्वीराज को जब इसकी सूचना मिली तो उसने भारतीय राजाओं को संघ बनाने का आमंत्रण दिया परंतु इस संघ में अपनी पुरानी शत्रुता को देखते हुए गहढ़वाल राजा जयचंद सम्मिलित नहीं हुआ वरन गोरी को आक्रमण करने का न्योता भी दे डाला। दोनों सेनाएं तराइन के मैदान में आ गईं। अत्यंत भयानक युद्ध हुआ मोहम्मद गोरी की जीत हुई । पृथ्वीराज चौहान ने निराश होकर अपने घोड़े पर  बैठकर भागने का प्रयास किया परंतु पकड़ लिया गया और पृथ्वीराज रासो के अनुसार बंदी बनाकर गजनी भेज दिया गया।

जोधराज के हम्मीर रासो के अनुसार पृथ्वीराज ने मोहम्मद गोरी को कई बार हराया था परंतु हर बार जीवित छोड़ दिया।
गोरी ने अजमेर का राज्य कुछ वार्षिक कर निश्चित करके पृथ्वीराज के पुत्र को लौटा दिया परंतु पृथ्वीराज के भाई ने उसको हटाकर तुर्कों से स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। जिसके बाद कुतुबुद्दीन ऐबक ने आक्रमण करके अजमेर के चौहान राज्य को समाप्त कर दिया।

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