चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य

समुद्रगुप्त के पश्चात उसका बड़ा लड़का राम गुप्त सिंहासन पर बैठा इसके विषय में जानकारी देने का मुख्य स्रोत देवीचंद्रगुप्तम नामक नाटक है जिसे विशाखदत्त ने लिखा था। राम गुप्त अपने पिता के विपरीत एक दुर्बल और असावधान शासक था। शकों ने गिरि दुर्ग नामक स्थान पर उसे घेर लिया था। इस पर विवश होकर राम गुप्त ने शक शासक  के साथ एक अत्यंत ही अपमानजनक संधि की जिसके अनुसार उसे अपनी रानी ध्रुव देवी को शकों को समर्पित करना था।

इस परिस्थिति को उसके छोटे भाई चंद्रगुप्त ने संभाला उसने ध्रुव देवी के वेश में अपने सैनिकों के साथ छावनी में प्रवेश किया और शक राजा को मार डाला। अंत में षड्यंत्र द्वारा राम गुप्त की मृत्यु हुई और चंद्र गुप्त शासक बना और उसने ध्रुव देवी से विवाह कर लिया। बाणभट्ट के हर्ष चरित्र में राम गुप्त का वर्णन है।

चंद्रगुप्त द्वितीय की माता का नाम दत्तदेवी था। चंद्रगुप्त ने अनेक उपाधियां धारण की थी जिनमें उसकी सबसे प्रमुख उपाधि विक्रमादित्य थी।

समुद्रगुप्त को अपने साम्राज्य का संगठन करने का पर्याप्त अवसर नहीं मिल पाया था। जिन राज्यों को उसने अपने अधीन किया था वे उससे स्वतंत्र होने की चेष्टा कर रहे थे और विदेशी मुख्यतया शक शासक उसके राज्य पर आक्रमण करने की ताक में बैठे थे।

इन परिस्थितियों में चंद्रगुप्त ने दिग्विजय आरंभ किया

सबसे पहले उसने मध्य भारत के गणराज्यों पर आक्रमण किया और उनको अपने राज्य में मिलाया।

इसके पश्चात उसने अवंती प्रांत के शक क्षत्रप रूद्रसिंह तृतीय को पराजित किया और अवंती को अपने राज्य में सम्मिलित कर लिया इसके बाद से शकों का कोई भी वर्णन नहीं मिलता है इस उपलक्ष में चंद्रगुप्त ने मालवा में चांदी के सिक्के चलाये।

इसके पश्चात चंद्रगुप्त ने पूरब के प्रत्यंत राज्यों को परास्त किया जो उसके विरुद्ध संगठन बना रहे थे जिनमें कामरूप, दवाक आदि के राज्य थे।

पूर्व के राज्यों को पराजित करने के पश्चात चंद्रगुप्त द्वितीय ने पश्चिमोत्तर भारत की ओर प्रस्थान किया वहां पहुंचकर उसने कुषाण साम्राज्य पर आक्रमण करके उन्हें पराजित किया। महरौली के लौह स्तंभ पर उत्कीर्ण लेख के अनुसार चंद्रगुप्त ने सिंधु नदी की सातों सहायक नदियों को पार करके वाह्लीकों को हराया (तीत्वा सप्तमुखानि येन समरे सिंधोर्जिता वह्लिकाः) । इससे यह अर्थ निकलता है कि उसने हिंदुकुश तक अपना विजय अभियान किया था।

महरौली स्तंभ लेख के अनुसार चंद्रगुप्त ने दक्षिण के राज्यों से पुनः अपना आधिपत्य स्वीकार कराया।

वैवाहिक संबंध:-

प्राचीन भारत में राज्यों के बीच कूटनीतिक संबंध का एक प्रमुख आधार वैवाहिक संबंध भी था । कहीं पर कन्या दी जाती थी और कहीं से कन्या ली जाती थी इस प्रक्रिया से राजा आपस में संबंधी हो जाते हैं और राज्य को स्थिरता प्राप्त होती है।

चंद्रगुप्त ने इस नीति का भरपूर पालन किया है उसने अनेक शक्तिशाली राजवंशों में वैवाहिक संबंध स्थापित किए और उन्हें अपना मित्र बना लिया।

चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य ने अपनी पुत्री प्रभावती गुप्ता का विवाह शक्तिशाली वाकाटक राज्य के राजा रूद्र सेन द्वितीय के साथ किया। कुछ समय बाद ही रुद्रसेन द्वितीय की मृत्यु हो गयी और उसके पुत्र अल्पवयस्क थे जिससे प्रभावती गुप्ता ने राज्य का भार संभाला और उसने सम्राट चंद्र गुप्त विक्रमादित्य के संरक्षण में लगभग 410 ईसवी तक राज्य किया ।

उसने स्वयं नाग सामंत कुबेर नाग की लड़की कुबेर नागा से विवाह किया तथा कर्नाटक के कदंब वंशी राज्य में भी वैवाहिक संबंध स्थापित किए गए।

चंद्रगुप्त के समय में राज्य की अभूतपूर्व उन्नति हुई उसने बहुतायत में सोने के सिक्के चलाएं उसके दरबार में विभिन्न क्षेत्र के विद्वानों की एक टोली रहती थी जिन्हे नवरत्न कहा जाता था। उस समय में साहित्य एवं कला की अभूतपूर्व उन्नति हुई।

चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के समय में चीनी यात्री फाह्यान भारत आया था वह कुछ समय तक चंद्रगुप्त द्वितीय के दरबार में रहा उसने गुप्त साम्राज्य की बहुत प्रशंसा की है।

चंद्रगुप्त की मृत्यु 414 ईसवी में हुई। उसकी मृत्यु के पश्चात उसका पुत्र कुमारगुप्त प्रथम सिंहासन पर बैठा।

साहित्य और कला की उन्नति:-

चंद्र गुप्त द्वितीय साहित्य और कला का प्रेमी था उसके समय में इनकी अभूतपूर्व उन्नति हुई। उसके दरबार में चीनी विद्वान फाह्यान छः साल तक रहा था।

कुछ विद्वान महाकवि कालिदास को भी चन्द्रगुप्त कालीन मानते हैं। उसके दरबार में विद्वान सदैव आश्रय पाते थे।

चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के मंत्री कामन्दक ने कामन्दक नीति सार की रचना की।

उसके समय के विद्वान वाराहमिहिर ने पंच सिद्धांतिका नामक ग्रन्थ लिखा।

शल्य चिकित्सा पद्धति के प्रणेता आयुर्वेदाचार्य धन्वन्तरि गुप्त चन्द्रगुप्त द्वितीय कालीन माने जाते हैं।

पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के उल्लेख से सम्बंधित ग्रन्थ ब्रह्मस्फुट के रचयिता ब्रह्मगुप्त चंद्र गुप्त विक्रमादित्य के दरबार के विद्वान् माने जाते हैं।

महरौली के स्तम्भ लेख में चन्द्रगुप्त की विजयों का उल्लेख है। यह स्तम्भ लेख खुली जगह पर है पर इसमें अभी तक जंग नहीं लगा।

चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य को महरौली स्तम्भ लेख में चंद्र कहा गया है।

उदयगिरि के गुहालेख में उसे सम्पूर्ण पृथ्वी का विजेता कहा गया है।

चंद्र गुप्त द्वितीय के सिक्के:-

गुप्त कालीन सिक्के अत्यंत उच्च कोटि के हैं सोने के सिक्कों को कर्षापण ,सुवर्ण कहा जाता था। चांदी के सिक्कों को रूप्यका कहा जाता था।

चंद्रगुप्त द्वितीय के कई प्रकार के सिक्के प्राप्त होते हैं ये सोने चांदी और तांबे के हैं।

चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य चक्र विक्रम (सोने के सिक्के )

इसमें एक प्रकार के सिक्के पर राजा का चित्र खड़ी मुद्रा में है उसका एक हाथ तलवार की मूठ पर है और उसके पीछे एक वामन व्यक्ति क्षत्र पकड़ा हुआ है और सिक्के के दूसरी तरफ कमल पर खड़ी लक्ष्मी का चित्र है।

चन्द्रगुप्त द्वितीय सिंह निहन्ता (सोने के सिक्के )

अन्य प्रकार के सिक्कों में सम्राट को सिंह से युद्ध करते हुए दिखाया गया है और सिक्के के दूसरे पट पर शेर पर आसीन लक्ष्मी का चित्र उत्कीर्ण है।

अन्य प्रकार के सिक्के पर सम्राट घोड़े पर सवार है इसके अलावा चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के धनुर्धर प्रकार के सिक्के प्राप्त होते हैं।
चंद्रगुप्त द्वितीय के  सोने के सिक्कों की माप 121, 125 और 132 ग्रेन हैं।
चंद्रगुप्त की विक्रमादित्य की चांदी के सिक्कों पर सम्राट के कमर से ऊपर के शरीर का चित्र है और दूसरी तरफ गरुड़ का चित्र इस पर परम भागवत महाराजाधिराज श्री चंद्रगुप्त विक्रमादित्य अंकित है।चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के कुछ तांबे के सिक्के भी प्राप्त हुए हैं जिनपर गरुड़ का चित्र उत्कीर्ण है।

चन्द्रगुप्त के समय में गुप्त वंश राजनैतिक ,सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से संगठित था।

इसे भी देखें:-

गुप्त शासन का राजनैतिक,सामाजिक और सांस्कृतिक स्वरूप

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