चंदेल वंश

चंदेल वंश की उत्पत्ति के विषय में इतिहासकारों में मतभेद है। 
विद्वानों के अनुसार  नवी शती में बुंदेलखंड में चंदेलों की उत्पत्ति हुई। उनके द्वारा उत्कीर्ण कराए गए लेखों में खुद को चंद्रवंशी कहा गया है और चंद्रात्रेय उनके आदि पुरुष थे।

अनुश्रुतियों के अनुसार काशी के गहढ़वाल राजा इंद्रजीत के पुरोहित हेरंब की पुत्री हेमवती का चंद्रमा से एक पुत्र उत्पन्न हुआ जिसका नाम चंद्रात्रेय हुआ और उसी ने चंद्रमा की सहायता से बुंदेलखंड में अपना राज्य स्थापित किया।

स्मिथ के अनुसार यह मध्य भारत की आदिवासी जाति गोड़ों और भरों के मिश्रण से उत्पन्न हुए थे।

आर.बी. रसल के अनुसार चंदेल गहढ़वाल वंश के थे चंदेरी की वजह से उनका चंदेल नाम पड़ा।

अन्य विद्वानों के अनुसार ये महोबा के क्षत्रिय जमीदार थे।

चंदेल इतिहास जानने के स्रोत :-

परमार्दिदेव का बटेश्वर लेख, कीर्ति वर्मा का महोबा लेख,धंग का खजुराहो लेख, चंदबरदाई कृत महोबा खंड,जयानक भट्ट कृत पृथ्वीराज विजय,सोमेश्वर कृत कीर्ति कौमुदी, फरिश्ता कृत तारीखे फरिश्ता,निजामुद्दीन का तबकाते अकबरी आदि ग्रंथ प्रमुख हैं।

चंदेल वंश का प्रथम राजा नन्नुक था और उसके पौत्र का नाम जय सिंह था जो जेजा के नाम से प्रसिद्ध था उसी के नाम पर चंदेलों का स्थान जेजाक भुक्ति कहलाया।

सबसे पहले चंदेल शासक प्रतिहार शासकों के सामंत थे बाद में धीरे-धीरे उन्होंने अपनी शक्ति का विकास किया। हर्ष देव चंदेल इनका एक शक्तिशाली राजा था उसने प्रतिहार शासकों की राज्य के लिए संघर्ष में भोज  द्वितीय के विरुद्ध महीपाल  को राजा बनने में सहायता दिया जिससे उसकी प्रतिष्ठा बढ़ गई।

यशोवर्मन:-

हर्ष देव का पुत्र यशोवर्मन हुआ जो कि एक विजयी राजा था मालवा, चेदि और महाकौशल को जीतकर अपने राज्य में मिलाया।वह नाम मात्र की प्रतिहारों की अधीनता स्वीकार करता था जबकि वास्तव में स्वतंत्र था।

उसने प्रतिहार राजा देवपाल से भगवान विष्णु की प्रतिमा बल पूर्वक उपहार में प्राप्त कर ली और इसे खजुराहो में स्थापित कर दिया।

यशोवर्मन ने प्रतिहारों के प्रसिद्ध दुर्ग कालिंजर पर भी अपना अधिकार कर लिया।

धंग:-

यशोवर्मन का पुत्र धंग 950 ईसवी में गद्दी पर बैठा वह उससे भी अधिक प्रतापी सिद्ध हुआ।

धंग ने पूर्ण स्वतंत्र राजा की भांति राज्य किया और उसने परम भट्ठारक की उपाधि का प्रयोग किया इसका वर्णन 999 ईसवी के खजुराहो लेख में हुआ है।

उसने प्रतिहारों से गोपाद्रि (ग्वालियर) छीन लिया।
धंग एक विजेता शासक था और उसका राज्य ग्वालियर से लेकर वाराणसी तक तथा दक्षिण में मालवा तक व उत्तर में यमुना नदी तक विस्तृत था। 

खजुराहो में 1002 के एक लेख के अनुसार कोशल जिसमें पश्चिमी उड़ीसा दक्षिण पूर्वी मध्य प्रदेश था शामिल था, क्रथ (विदर्भ के आसपास का क्षेत्र) सिंघल और कुंतल (बनवासी) क्षेत्र के राजा उसकी आज्ञा मानते थे । इससे अनुमान लगता है कि ये क्षेत्र या तो उसके अधिकार में थे या पूर्ण प्रभाव में।
धंग हिन्दू शाही राजा जयपाल द्वारा तुर्कों के  विरुद्ध बनाए गए संघ में सम्मिलित हुआ था।

धंग चंदेल वंश का सबसे प्रतापी शासक था और लगभग 100 वर्ष तक जीवित रहा, अंत में प्रयाग में जाकर संगम में उसने जल समाधि ले ली ।

गंड:-

धंग के पश्चात उसका पुत्र गंड गद्दी पर बैठा ।उसने 1008 ईसवी में महमूद गजनवी के विरुद्ध जयपाल के पुत्र आनंदपाल द्वारा बनाए गए संघ में भाग लिया था।

प्रतिहार राजा जयपाल ने जब महमूद की अधीनता स्वीकार कर लिया तब गंड ने अपने पुत्र विद्याधर को जयपाल को सबक सिखाने के लिए भेजा और विद्याधर ने जयपाल को मारकर उसके पुत्र त्रिलोचन पाल को गद्दी पर बैठा दिया जिससे महमूद गजनबी अत्यंत रूष्ट हुआ और उसने चंदेल राज्य पर आक्रमण कर दिया परंतु लंबे घेरे के बाद भी दुर्गों पर अधिकार ना कर सका और आस पास के क्षेत्रों में लूटपाट कर वापस चला गया।

गंड का उत्तराधिकारी विद्याधर हुआ। वह 1025 ईसवी में राजा बना। उसका शासन 1030 ईसवी तक था। वह भी एक वीर और साहसी शासक था।

एक लेख से ज्ञात होता है कि उसके अधीन रहकर भोज, परमार और कलचुरी शासक ने तुर्कों को मध्य भारत से बाहर निकाला था।

कीर्ति वर्मा:-

उसके पश्चात चंदेल वंश का शक्तिशाली शासक कीर्ति वर्मा हुआ जिसने कलचुरी शासक को परास्त किया था।
उसके दरबार में कृष्ण मिश्र नामक एक प्रसिद्ध विद्वान रहते थे उन्होंने प्रबोध चंद्रोदय नामक नाटक की रचना की थी जिनमें नाटक के माध्यम से वेदांत दर्शन के सिद्धांत बताए गए थे।

कीर्ति वर्मा के बाद मदन वर्मा चंदेल राजा हुआ इसका परमारों और गुजरात के सोलंकियों से भी युद्ध हुआ।
गहड़वालों ने इसकी शक्ति से आतंकित होकर इसके साथ मित्रता की।

परमार्दिदेव:-

चंदेल वंश का अंतिम शासक परमार्दिदेव था जिसे परमल कहा जाता था।  परमल का समकालीन अजमेर का चौहान राजा पृथ्वीराज तृतीय था, चौहानों और चंदेलों में इस समय युद्ध होते रहते थे और पृथ्वीराज ने परमल पर आक्रमण करके उसे दुर्बल कर दिया। 

1203 ईस्वी में गहड़वालो को परास्त करने के बाद कुतुबुद्दीन ऐबक ने कालिंजर पर आक्रमण किया।परमार्दि ने उसका विरोध किया परंतु हार गया। उसके मंत्री अजय देव ने तुर्कों का कुछ दिन तक सामना किया परंतु अंत में रसद की कमी हो जाने के कारण आत्म समर्पण कर दिया जिसके बाद तुर्कों का आधिपत्य कालिंजर और महोबा पर हो गया।

अब चंदेलों का राज्य बुंदेलखंड में बचा रहा। 

परमार्दि का पुत्र त्रैलोक्य वर्मा 1203 ईसवी में गद्दी पर बैठा जिसने कालिंजर पर पुनः अधिकार किया परंतु 1232 ईसवी में मुसलमानों ने फिर से इस पर आक्रमण प्रारंभ कर दिया। मुगल शासक अकबर के समय रानी दुर्गावती यहां पर शासन करती थी।

अकबर ने 1564 ईसवी में साम्राज्य विस्तार के लिए इस राज्य पर आक्रमण किया जिससे रानी दुर्गावती  लड़ते हुए वीर गति को प्राप्त हुई और यह राज्य मुगल साम्राज्य में मिला लिया गया।

इसे भी देखें:-

राजपूत काल का इतिहास


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