गुप्त शासन का राजनैतिक,सामाजिक और सांस्कृतिक स्वरुप

गुप्त साम्राज्य अत्यंत विशाल था और उनका राज्य प्राचीन भारतीय दिग्विजय नीति के अंतर्गत पूर्ण विस्तृत था परंतु गुप्त शासकों की शासन व्यवस्था मौर्यों के विपरीत मांडलिक थी जिसमें कई बाहरी प्रांत शासन के अधीन तो थे परंतु उन्हें आंतरिक मामलों में बहुत कुछ स्वतंत्रता प्राप्त थी जबकि मौर्य शासन पूर्णतया केंद्रित शासन था।

गुप्त साम्राज्य की शासन व्यवस्था निम्न प्रकार थी:-

राजा:-

राजा ही राज्य का सर्वोच्च अधिकारी था राज्य की अंतिम सत्ता उसी के अधीन थी। राजा की सहायता के लिए मंत्रिपरिषद थी परंतु राजा उनकी सलाह मानने के लिए बाध्य नहीं था अंतिम निर्णय राजा के हाथ में था किन्तु गुप्त शासक स्वेच्छाचारी नहीं थे वे मंत्रिपरिषद की सलाह का सदैव सम्मान करते थे और मंत्रिपरिषद की सलाह से ही कोई काम करते थे।

गुप्त शासक बड़ी-बड़ी सैनिक उपाधियां धारण करते थे जिनमें महाराजाधिराज, परमेश्वर, पराक्रमांक, प्रकाशादित्य, विक्रमादित्य,बालादित्य आदि।

मंत्री परिषद:-

गुप्त शासन में राजा की सहायता के लिए मंत्रिपरिषद होती थी। यह मंत्रिपरिषद मौर्य शासकों की मंत्रिपरिषद के समान थी परंतु इनका विस्तृत उल्लेख नहीं मिलता है फिर भी विभिन्न लेखों और सिक्कों के आधार पर कई मंत्रियों के पद का पता चलता है:-

महा दंड नायक:-

यह सेनापति था उसका काम सेना का संगठन और उसकी व्यवस्था देखना था।

महा प्रतिहार:-

राज प्रसाद का रक्षक होता था। इसके ऊपर राज्य प्रसाद की सुरक्षा की जिम्मेदारी होती थी।यह राज प्रसाद के अंदर जाने वाले और अंदर से बाहर आने वाले सभी व्यक्तियों पर नजर रखता था।

महाअश्व पति:-

यह अश्व सेना का अध्यक्ष होता था।

संधि विग्रहिक:-

यह विदेश मंत्री के ही समान था इसका काम दूसरे राज्यों के साथ संबंध,संधि एवं युद्ध की देखभाल करना था।

अक्षपटलाधिकृत:-

इसका काम राजकीय कागज और पत्रों के व्यवस्थित रखरखाव की देखभाल करना था।

प्रांतीय शासन:-.

गुप्त शासन काल में साम्राज्य कई प्रांतों में विभाजित किया गया था प्रांतों को भुक्ति या देश कहा जाता था।भुक्ति की देखभाल करनेेे वाले अधिकारी भोग पति, गोप्ता,उपरिक महाराज आदि नामों से पुकारे जाते थे।

प्रादेशिक शासन में उसके मुख्य अधिकारियों के अलावा अनेक पदाधिकारी होते थे।

प्रांतों के नीचे प्रदेश होता था जो कि मंडल के बराबर होता था और प्रदेश के नीचे विषय होता था जो जिले के बराबर होता था। विषय के शासक को विषयपति कहा जाता था।

विषयों (जिलों) का शासन:-

गुप्त शासन कालीन विषयों के शासन की जानकारी सौभाग्य से हमें प्राप्त हो गई है यह जानकारी बंगाल के दामोदरपुर से प्राप्त एक ताम्रपत्र से मिलती है जिसके अनुसार विषयों की राजधानी होती थी इसमें उसका सबसे बड़ा अधिकारी विषय पति रहता था। विषय पति के कार्यालय को अधिकरण कहा जाता था तथा उसके निवास स्थान को अधिष्ठान कहा जाता था।

विषय पति की सहायता के लिए एक परिषद होती थी इसमें निम्नलिखित सदस्य थे:-

पुस्तपाल:-

इसका काम जमीन की गुणवत्ता के आधार पर उसके मूल्य का निर्धारण करना था तथा वह जमीन की खरीद बिक्री की भी देखभाल करता था।
नगर सेठ, श्रेणियों के प्रमुख भी इसके सदस्य होते थे।

सार्थवाह:-

नगर का मुख्य व्यापारी इसका सदस्य होता था।

प्रथम कुलिक:-

यह नगर के कारीगरों का प्रधान था और यह भी परिषद का सदस्य होता था। 

प्रथम कायस्थ:-

यह जिले का मुख्य लेखक होता था और लेख विभाग का प्रमुख अधिकारी भी था।

जिस प्रकार राजा अपने मंत्रिपरिषद की सहायता से शासन करता था उसी प्रकार प्रांतों और विषयों के अधिकारी अपने नीचे के अधिकारियों के साथ मिलकर इकाइयों की देखभाल करते थे।

ग्रामीण शासन:-

ग्राम शासन की सबसे छोटी इकाई थी इसके अधिकारी को ग्रामिक, भोजक अथवा महत्तर कहा जाता था। मुखिया ग्रामिक होता था और महत्तर इसके सदस्य।

मध्य भारत में ग्राम सभा को पंच मंडली कहा जाता था।

गांव की अपनी पंचायत भी होती थी ये ग्राम पंचायतें ग्राम शासन की देखभाल करती थी और विवादों का निपटारा भी करती थीं।

गुप्त शासन में न्याय विभाग:-

गुप्त शासकों की न्याय प्रणाली का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता है परंतु उसी समय लिखी गई नारद स्मृति के  वर्णन से न्याय व्यवस्था की जानकारी प्राप्त होती है।

उस समय न्यायालय चार प्रकार के होते थे:-

कुल,श्रेणी, गण तथा राजकीय न्यायालय ।

वादी पहले कुल में वाद दायर करता था उसके पश्चात श्रेणी में और फिर गण में जाता था यदि वहां भी उसे न्याय नहीं मिलता था तो अंत में वह राजकीय न्यायालय में जाता था जहां पर परिस्थितियों और साक्ष्यों के आधार पर न्याय प्रदान किया जाता था। 

न्यायालय के प्रमुख अधिकारी को विनय स्थिति स्थापक कहा जाता था। न्याय का अंतिम अधिकार राजा के पास रहता था। फाह्यान नामक चीनी यात्री अपने विवरण में लिखता है कि गुप्त काल में अपराध कम होते थे और दंड कोमल था प्राण दंड और शारीरिक दंड बहुत कम दिए जाते थे अपराध के अनुसार कम या अधिक अर्थ दंड दिया जाता था राज्य के विरुद्ध बार बार षडयंत्र करने पर दाहिना हाथ काट लिया जाता था।

आंतरिक सुरक्षा:-

गुप्त शासन में देश आंतरिक मामलों में पूरी तरह सुरक्षित था गुप्त शासकों ने ऐसी सुव्यवस्थित शासन प्रणाली अपनाई थी जिससे कि राज्य में अपराध कम होते थे।

सुरक्षा विभाग के सबसे बड़े अधिकारी को दंडपाशाधिकारी कहा जाता था। लाठी और रस्सी लेकर चलने वाले सिपाही को दंडापाशिक तथा चोर पकड़ने वाले सिपाही को चोरोद्धरणिक कहा जाता था। गुप्त शासन में चाट और भाट नामक सरकारी पदों का उल्लेख मिलता है।

गुप्त शासन में साम्राज्य में गुप्तचर व्यवस्था अत्यंत सशक्त रही होगी इसी कारण से अपराध कम से कम होते थे।

चीनी यात्री फाह्यान गुप्त शासन व्यवस्था से अत्यंत प्रभावित था। उसने अपने विवरण में लिखा है कि मैंने हजारों किलोमीटर की यात्रा की परंतु मुझे कहीं पर भी चोर और डाकू नहीं मिले।

सामाजिक स्थिति:-

गुप्तकालीन समाज मुख्यतः चार वर्णों में बंटा हुआ था तथा यह चारों वर्ण ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र थे।  विभिन्न अभिलेखों से यह पता चलता है कि उस समय वर्ण व्यवस्था अपने आंतरिक रूप में सुदृढ़ थी सभी वर्ण वाले अपने अपने धर्म में स्थित होकर कार्य करते थे। ब्राह्मण का मुख्य कार्य अध्ययन-अध्यापन, यज्ञ हवन आदि कराना था उनका जीवन अत्यंत सादगी पूर्ण था।

क्षत्रिय का काम राष्ट्र की रक्षा सामान्य व्यवस्था स्थापित करना था और वह भी अपने कर्म में पूरी तरह से स्थित थे उस समय देश आंतरिक मामलों में पूरी तरह से सुरक्षित था।

वैश्य व्यापार, पशुपालन के द्वारा समाज को समृद्ध बना रहे थे तथा शूद्र अपने सेवा भाव में रत थे। ये चारों वर्ण परस्पर जुड़े हुए थे।

समाज में इन सबके अतिरिक्त एक अन्य वर्ण था जो कि अपने खान पान व रहन सहन के कारण समाज से बिल्कुल अलग था। इस वर्ग में चांडाल, स्वपच व असभ्य जंगली जातियां आती थीं।

फाह्यान ने अपने यात्रा विवरण में लिखा है कि लोग इनसे किसी प्रकार का संबंध नहीं रखते थे इनका निवास गांव से दूर था। जब इन्हें गांव या नगर में आना होता था तो ये लकड़ी बजाते थे जिससे कि लोग इनसे दूर हट जाएं।

गुप्त काल में सामान्यतया अंतर्जातीय विवाह के उदाहरण भी मिलते हैं जिनमें चंद्रगुप्त द्वितीय के विभिन्न वर्णों में हुआ विवाह था इसके अलावा विधवा विवाह के उदाहरण स्वरूप चंद्रगुप्त द्वितीय का विवाह उसके भाई राम गुप्त की विधवा रूप देगी ध्रुव देगी के साथ हुआ था।

गुप्त काल में स्त्रियों का स्थान:-

समाज में स्त्रियों का बहुत ऊंचा स्थान था वे माता पत्नी और पुत्री के रूप में सम्मान पाती थीं। अनेक राजाओं के साथ उनकी माता का भी उल्लेख हुआ है। वंशावलियों में पिता के साथ माता का भी उल्लेख है। पत्नी का सम्मानपूर्ण स्थान था चंद्रगुप्त प्रथम ने अपनी पत्नी कुमार देवी का नाम अपने सिक्कों पर अपने साथ ही अंकित कराया था। इसके अलावा चंद्रगुप्त द्वितीय की पुत्री प्रभावती गुप्ता एक विदुषी महिला थी उसने वाकाटक राज्य का संचालन किया था।

वैश्या वृत्ति:-

गुप्त समाज में वैश्या वृत्ति भी प्रचलित थी, वैश्याओं को गणिका कहा जाता था तथा वृद्ध  वैश्याओं को कुट्टनी कहा जाता था।

भोजन एवं वस्त्र:-

गुप्त शासक वैष्णव धर्म के अनुयाई थे इसका प्रभाव जनता पर भी पड़ा जनता में मुख्यतः शाकाहार का ही प्रचलन था मांस मछली लहसुन प्याज का प्रयोग नहीं करते थे, नशीले पदार्थों का प्रयोग कम होता था केवल अंत्यज जातियों में ही मांस खाया जाता था।

वस्त्र आभूषण :-

गुप्त शासक सुंदर-सुंदर वस्त्र एवं आभूषणों के शौकीन थे उस समय के प्राप्त मूर्तियों के वस्त्रों और आभूषणों तथा श्रृंगार से अनुमान लगाया जा सकता है कि उस समय राजा और जनता दोनों सुंदर वस्त्रों का प्रयोग करते थे चीन से रेशम का आयात किया जाता था और उनसे रेशमी वस्त्र बनाए जाते थे।

धार्मिक जीवन:-

शुंग शासकों की भांति ही गुप्त शासकों ने भी वैदिक धर्म का पुनरुत्थान किया। उनके पहले भारत में विदेशी सत्ता लगातार संघर्ष कर रही थी जिनका मुकाबला वाकाटकों एवं भारशिवों ने लंबे समय तक किया। गुप्त शासकों द्वारा एक बड़े साम्राज्य की स्थापना करने से राज्य में शांति स्थापित हुई और सीमावर्ती क्षेत्र सुरक्षित हुए। जिससे धर्म के विकास को प्रोत्साहन मिला। गुप्त शासक वैष्णव धर्म के अनुयाई थे। उनके समय में प्राचीन वैदिक धर्म अपने अलग रूप में सामने आता है इस समय तक धीरे-धीरे देवताओं की मानव रूप में पूजा प्रारंभ हो गई थी जिनमें प्रजापति, विष्णु, शिव, ब्रह्मा, वाराह, कृष्ण,बलराम आदि हैं। देवियों में दुर्गा, चामुंडा, लक्ष्मी आदि हैं। गुप्त शासकों ने अनेक मंदिरों का निर्माण कराया।

इस युग में विष्णु लोकरक्षक देवता के रूप में प्रतिष्ठित हुए।

वैष्णव और शैव धर्म के अलावा उस समय बौद्ध और जैन धर्म भी पर्याप्त विकसित थे।

बौद्ध व जैन धर्म:-

चीनी यात्री फाह्यान ने अपने यात्रा वर्णन में बौद्ध धर्म के बारे में प्रकाश डाला है। बौद्ध धर्म के महायान संप्रदाय के उदय होने के बाद प्रारंभ में बुद्ध की मूर्तियों की स्थापना चैत्यों में की गई। इस काल में बौद्ध धर्म धीरे-धीरे वैदिक धर्म से प्रभावित होता जा रहा था और उसका झुकाव उसी तरफ होता जा रहा था।

जैन धर्मावलंबियों की संख्या उस काल में कम थी यह उत्तर भारत से विदेशी आक्रमण के प्रभाव के कारण दक्षिण की ओर खिसकते जा रहे थे।जैन धर्म के कठोर आचार व्यवहार के कारण आमजन का  झुकाव उनकी तरफ कम हो रहा था यह मुख्यतः व्यापारियों का धर्म बनता जा रहा था। 

गुप्त साम्राज्य में सभी धर्मों का पर्याप्त विकास हुआ और धार्मिक संघर्ष की भावना नगण्य थी इसका प्रमुख कारण गुप्त शासकों की उदार धार्मिक नीति थी।

गुप्त शासक यद्यपि वैष्णव धर्म के अनुयाई थे परंतु उन्होंने अन्य सभी धर्मों का समान आदर किया तथा धर्म को राजनीति से पृथक रखा चंद्रगुप्त प्रथम का सेनापति अमरकार्दव बौद्ध था इसके अलावा सम्राट समुद्रगुप्त ने अपने राजकुमारों की शिक्षा दीक्षा के लिए बौद्ध आचार्य वसुबंधु को नियुक्त किया था।

सांस्कृतिक जीवन:-

भाषा:-

गुप्त शासन में संस्कृत भाषा का तीव्र विकास हुआ पहले सम्राट अशोक ने शासकीय व्यवहार की भाषा का माध्यम प्राकृत को बनाया था बाद में शुंग शासकों ने इसे संस्कृत कर दिया परंतु वे प्राकृत भाषा को प्रोत्साहित करते रहे परंतु धीरे-धीरे समय के साथ संस्कृत अपना स्थान प्राप्त करती गई। कनिष्क के समय के बौद्ध विद्वानों ने संस्कृत भाषा में अनेक ग्रंथ लिखे। वाकाटक शासकों और भारशिवों की भाषा भी संस्कृति थी और गुप्त शासन काल आते-आते संस्कृत की महत्ता पूर्ण रूप से स्थापित हो गई थी। गुप्त शासकों ने सर्वत्र अपने लेखों अपने सिक्कों और साहित्य में संस्कृत का प्रयोग किया।

गुप्त शासन में शिक्षा व विश्वविद्यालय:-

उस समय शिक्षा की विशेष प्रगति हुयी गुप्त काल ने अनेक विद्वानों को दिया। काशी,प्रयाग शिक्षा के प्रमुख केन्द्र थे।

नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना कुमारगुप्त प्रथम ने कराई थी।यह स्थान आधुनिक बिहार राज्य के नालंदा में स्थित है। पहले वहां एक छोटा विद्यालय था।नालंदा विश्वविद्यालय की प्रसिद्धि बहुत बढ़ गई और देश विदेश के विद्यार्थी वहां शिक्षा ग्रहण करने आते थे। उस विश्वविद्यालय अंदर आने जाने के लिए पत्थर के रास्ते बने हुए थे,जगह जगह कुएं व जलघड़ी लगी थी। 

साहित्य:-

इस काल में संस्कृत साहित्य का अभूतपूर्व विकास हुआ। कुछ विद्वान कालिदास को चंद्रगुप्त द्वितीय के समय का मानते हैं परंतु यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता।

इसके अतिरिक्त अन्य बहुत से विद्वान गुप्त साम्राज्य के समय में हुए जिनमें वत्सभट्टि, वासुल, वीरसेन, हरिषेण आदि हैं।

जिनमें मुद्राराक्षस और देवीचंद्रगुप्तम के रचयिता विशाखदत्त।

स्वप्नवासवदत्ता के रचयिता सुबंधु, मृच्छकटिकम् नाटक के लेखक शुद्रक, हयग्रीव वध के रचयिता भर्तृमेंठ काव्यालंकार इसी युग की देन हैं।

इसके अतिरिक्त वात्सायन का कामसूत्र, ईश्वरकृष्ण की सांख्यकारिका का लेख व चंद्रगुप्त द्वितीय के मंत्री कामंदक के नीति सार की रचना हुई जो कि राजनीति शास्त्र का ग्रंथ है।

नारद स्मृति की रचना इसी समय में हुई जिसमें न्याय व्यवस्था मुख्यतः दीवानी न्यायालय की व्यवस्था का विस्तृत वर्णन है।

विज्ञान:-

इस युग में ज्योतिष व गणित के कई प्रकांड विद्वान हुए जिनमें आर्यभट्ट ने गणित का ग्रंथ आर्यभट्टीयम लिखा उन्होंने ही सर्वप्रथम यह बताया कि धरती अपनी धुरी पर घूमती है तथा चन्द्रमा पर पृथ्वी की परछाईं पड़ना ग्रहण का कारण है ।

वाराहमिहिर ने ज्योतिष का प्रमुख ग्रंथ पंच सिद्धांतिका लिखा।

ब्रह्मगुप्त ने ब्रह्म स्फुट सिद्धांत नामक ग्रंथ लिखा जिसमें उन्होंने पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति का उल्लेख किया है।

भास्कर प्रथम ने भाष्य खगोल शास्त्र,महाभाष्यर्और लघुभाष्यर्क की रचना की।

नागार्जुन ने रासायन विज्ञान में लौहशास्त्र रसरत्नाकर आदि की रचना की।

विद्वानों का मत है कि आयुर्वेद के प्रकांड विद्वान धनवंतरि भी गुप्तकालीन थे जिन्होंने शल्य चिकित्सा पद्धति का सूत्रपात किया था।

विष्णु शर्मा कृत पंचतंत्र इसी युग की देन है जिसमें अत्यंत रोचक कहानियों के माध्यम से नीति का उपदेश दिया गया है।

इस युग में बौद्ध और जैन धर्म का भी पर्याप्त विकास हुआ इस युग में बौद्ध धर्म व जैन धर्म के भी अनेक विद्वान हुए।

बौद्ध विद्वानों में कुमारजीव, वसुबंधु, परमार्थ, आचार्य मैत्रेय, धर्मपाल, चंद्रगोमिन आदि प्रमुख हैं।

जैन विद्वानों में देवनंदिन, सिद्ध सेनमणि, जिन चंद्रमणि आदि प्रमुख हैं।

ललित कलाएं:-

यह युग ललित कलाओं की दृष्टि से भी स्वर्ण युग था इसमें स्थापत्य कला, मूर्तिकला, चित्रकला, नाटक आदि का चौमुखी विकास हुआ।

स्थापत्य कला:-

गुप्त काल में अजंता, एलोरा(दोनों महाराष्ट्र के औरंगाबाद में स्थित) और बाघ की गुफाएं(मध्य प्रदेश के धार में स्थित) खोदी गई थी और उन पर कलाकृतियां उत्कीर्ण की गई है।

इस काल में देवगढ़ का दशावतार मंदिर, भीतरगांव का मंदिर, बोधगया का महाबोधि मंदिर, एलोरा का विश्वकर्मा चैत्य, सारनाथ का धमेख स्तूप, महरौली का लौह स्तंभ जो अभी तक पूरी तरह सुरक्षित है प्रमुख हैं। इस काल के भवन निर्माण की प्रमुख विशेषता सुंदर सजावटों से अलंकृत खंभे हैं।

मूर्तिकला:-

मूर्तिकला का तीव्र विकास गांधार शैली में हुआ था जहां पर यूनानी शासकों ने यूनानी किस्म की मूर्ति को भारतीय चित्र से संवारा परंतु ये जैसे-जैसे भारत के अंदरूनी भाग में बढ़ती गई उसका स्वरूप बदलता गया गांधार से मथुरा होते हुए पाटलिपुत्र पहुंचने तक मूर्तिकला का पूर्णतया भारतीयकरण हो गया।

मूर्तियां के वस्त्र उनके बाल व बालों की सजावट और भावना प्रधान अभिव्यक्ति अत्यंत उन्नत अवस्था में हो  गई। इस काल में शिव, विष्णु, ब्रह्मा, दुर्गा, पार्वती की मूर्तियां बनने लगी थीं, इसके अलावा बुद्ध, बोधिसत्व की सुंदर मूर्तियां पाई जाती हैं इस काल की सारनाथ में प्राप्त हुई बुद्ध की मूर्ति प्रसिद्ध है जो धर्म चक्र प्रवर्तन मुद्रा में है।इस काल की मूर्ति अपने सौंदर्य,सजीवता,आध्यात्मिकता की अभिव्यक्ति के कारण अत्यंत उन्नत किस्म की लगती है।

इस काल की प्रमुख मूर्तियां हैं-

उदयगिरि से प्राप्त पृथ्वी का उद्धार करती हुई वाराह की मूर्ति, झांसी के देवगढ़ से प्राप्त शेषशायी विष्णु की मूर्ति, काशी से प्राप्त गोवर्धनधारी कृष्ण की मूर्ति, भगवान कार्तिकेय की मूर्ति, भरतपुर से प्राप्त 27 फीट ऊंची बलदेव की मूर्ति और 10 फीट ऊंची लक्ष्मी नारायण की मूर्ति प्रमुख हैं।
सारनाथ की बुद्ध मूर्ति, मथुरा की खड़ी हुई बुद्ध मूर्ति, सुल्तनगंज की बुद्ध की ताम्र मूर्ति, 
जैन धर्म में मथुरा से प्राप्त भगवान महावीर की मूर्ति जिसमें महावीर स्वामी पद्मासन में ध्यान मुद्रा में हैं।

चित्रकला:-

इस काल में बनी अजंता, एलोरा एवं बाघ की गुफाओं में दीवारों और छतों पर रंग बिरंगे रेखा चित्र बने हैं जिनमें मनुष्य, जानवरों, फूल पत्तों आदि के चित्र हैं।

अजंता की गुफा संख्या 16,17 एवं 19 गुप्तकालीन बताई जाती हैं।चित्रकारी की टेंप्रो (सूखे प्लास्टर पर चित्रकारी) एवं फ्रेस्को (गीले प्लास्टर पर चित्रकारी) शैली का प्रयोग हुआ है।

बाघ की गुफाएं ग्वालियर में स्थित है इनकी सबसे पहले खोज 1818 इसवी में डेंजरफील्ड ने की थी।

संगीत कला:-

समुद्रगुप्त स्वयं संगीत का प्रेमी था उसके प्रयाग प्रशस्ति के अनुसार समुद्रगुप्त गंधर्व ललित कला में स्वर्गीय संगीतकार नारद और तुंबुरू को भी लज्जित करता था।

समुद्रगुप्त के सिक्कों में उसे वीणा बजाते हुए चित्रित किया गया है।

नाटक:-

इस काल में लिखे गए अनेक उच्च कोटि के नाटकों से यह पता चलता है कि नाट्य कला उन्नत अवस्था में थी तथा इस काल के साहित्य ग्रंथों में भी रंगमंच के विभिन्न अंगों के नाम और अभिनय के प्रकारों का वर्णन है।

मुद्रा:-

गुप्त काल की मुद्रा जितनी अधिक परिष्कृत और व्यवस्थित है इतनी और किसी काल की नहीं है भारतीयों के अपेक्षा यूनानी सिक्कों को माप तौल के आधार पर अधिक व्यवस्थित तरीके से बनाते थे बाद में भारतीयों ने अपने सिक्कों में भी सुधार किया ये सिक्के गुप्त काल तक आते-आते अत्यंत उच्च कोटि के हो गए। गुप्त काल के दीर्घकालीन शांति के कारण  चौमुखी उन्नति हुई। इनके सोने के सिक्के बहुतायत में प्राप्त होते हैं गुप्त काल में सोने, चांदी, तांबे के सिक्कों पर सम्राटों व देेेवी देवताओं के चित्र उकेरे गए हैं ।

चन्द्रगुप्त प्रथम के सिक्के:-

चन्द्रगुप्त प्रथम राजदंपति (सोने के सिक्के )

सबसे पहला गुप्तकालीन सिक्का चंद्रगुप्त प्रथम का प्राप्त होता है जिसमें एक तरफ चंद्रगुप्त का चित्र बना है उसके बाएं हाथ में ध्वजा और दाएं हाथ में अंगूठी है और वह अपने सामने खड़ी रानी कुमार देवी को उस अंगूठी को दे रहा है उसके दाहिनी तरफ श्रीकुमार देवी और बाईं ओर चंद्रगुप्त लिखा हुआ है। सिक्के के दूसरे पट पर लक्ष्मी का चित्र है जो शेर पर सवार है और उनके पैर के नीचे कमल है तथा वहीं पर लिच्छवयः लिखा है।ये सिक्के सोने के हैं और इनका वजन 111 ग्रेन  है।

इसे देख सकते हैं:-

गुप्त वंश का प्रारम्भ और प्रारंभिक शासक

समुद्रगुप्त के सिक्के:-

इन्होंने कई प्रकार के सिक्के चलाये, इन सिक्कों की धातु सोना और तांबा है।

सम्राट  के सिक्के अलंकार पूर्ण हैं इनपर अनेकों प्रकार के चित्र अलंकृत हैं जिनमें-

समुद्रगुप्त अश्वमेध (सोने के सिक्के )

समुद्रगुप्त के अश्वमेध शैली के सिक्के हैं जिन्हें समुद्रगुप्त ने अश्वमेध यज्ञ के उपलक्ष में जारी किया था सिक्कों के एक तरफ यज्ञ से बंधा हुआ अश्व का चित्र है और उसके चारों ओर गोलाई में राजाधिराज: पृथ्वीम विजित्वा दिवम जयत्याहृतवाजिमेघ: लिखा है तथा दूसरी तरफ चंवर डुलाती हुई राजमहिषी का चित्र है और अश्वमेध पराक्रमः लिखा हुआ है। समुद्रगुप्त के अन्य प्रकार के सिक्के में वह वीणा बजा रहा है और चारों ओर गोलाई में महाराजाधिराज श्री समुद्रगुप्त लिखा है तथा पिछले भाग पर आसन पर विराजमान एक देवी का चित्र है जिसके पास ही समुद्रगुप्त: अंकित है।

इसके अलावा समुद्रगुप्त के गरुड़ध्वज अंकित सिक्के,परशु लिए समुद्रगुप्त के चित्र से अंकित सिक्के,धनुष बाण लिए सिक्के आदि हैं।
समुद्रगुप्त के प्राप्त सोने के सिक्कों की माप 118 ग्रेन के आसपास है इसके अलावा इसके दो तांबे के सिक्के प्राप्त हुए हैं जिनके ऊपर गरुड़ का चित्र और समुद्र लिखा हुआ है।

चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के सिक्के:-

चंद्रगुप्त द्वितीय के कई प्रकार के सिक्के प्राप्त होते हैं ये सोने, चांदी और तांबे के हैं।

इसमें एक प्रकार के सिक्के पर राजा का चित्र खड़ी मुद्रा में है उसका एक हाथ तलवार की मूठ पर है और उसके पीछे एक वामन व्यक्ति क्षत्र पकड़ा हुआ है और सिक्के के दूसरी तरफ कमल पर खड़ी लक्ष्मी का चित्र है।

चन्द्र्गुप्त द्वितीय सिंह निहन्ता (सोने के सिक्के )

अन्य प्रकार के सिक्कों में सम्राट को सिंह से युद्ध करते हुए दिखाया गया है और सिक्के के दूसरे पट पर शेर पर आसीन लक्ष्मी का चित्र उत्कीर्ण है।
अन्य प्रकार के सिक्के पर सम्राट घोड़े पर सवार है इसके अलावा चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के धनुर्धर प्रकार के सिक्के प्राप्त होते हैं।

चंद्रगुप्त द्वितीय के  सोने के सिक्कों की माप 121, 125 और 132 ग्रेन हैं।

चंद्रगुप्त की विक्रमादित्य की चांदी के सिक्कों पर सम्राट के कमर से ऊपर के शरीर का चित्र है और दूसरी तरफ गरुड़ का चित्र इस पर परम भागवत महाराजाधिराज श्री चंद्रगुप्त विक्रमादित्य अंकित है।चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के कुछ तांबे के सिक्के भी प्राप्त हुए हैं जिनपर गरुड़ का चित्र उत्कीर्ण है।

कुमारगुप्त के सिक्के:-

कुमारगुप्त प्रथम अश्वमेध (सोने के सिक्के)

इस राजा के सिक्के सबसे अधिक कलात्मक प्रकार के हैं। के अश्वमेध प्रकार के सिक्के पर एक तरफ यज्ञ का अश्व बंधा है और दूसरी तरफ राजमहिषी का चित्र उत्कीर्ण है।

उसके धनुर्धर प्रकार के सिक्के भी प्राप्त हुए हैं।  
इसके अलावा अन्य प्रकार के सिक्कों पर सिंह से युद्ध करते हुए  सम्राट का चित्र और दूसरी तरफ सिंह पर आसीन दुर्गा का चित्र अंकित है।
कुमारगुप्त के राजा रानी  प्रकार के सिक्के प्राप्त हुए हैं जिसमें वृद्ध राजा और युवती रानी का चित्र उत्तीर्ण है।

अन्य प्रकार की सिक्कों में कुमारगुप्त का मोर को फल खिलाते हुए चित्र है इसकी दूसरी तरफ मयूर पर बैठे हुए कुमार कार्तिकेय का चित्र उत्कीर्ण है।

इसके अतिरिक्त अश्वारोही प्रकार के सिक्के भी प्राप्त हुए हैं।
कुमारगुप्त के समय में प्रचलित सिक्कों का वजन 125 और 129 ग्रेन है।

स्कंदगुप्त के सिक्के:-

स्कंदगुप्त के चांदी के सिक्के

सम्राट के समय के सिक्के केवल दो प्रकार के हैं 

एक प्रकार के सिक्कों में एक ओर धनुष बाण लिए सम्राट का चित्र है और दूसरी ओर कमल पर आसीन लक्ष्मी का चित्र है।

दूसरे प्रकार के सिक्कों में एक ओर सम्राट और राज महिषी का चित्र है बीच में गरुड़ध्वज है और दूसरी ओर हाथ में कमल लिए देवी का चित्र है।
अन्य गुप्त शासकों के भी सिक्के प्राप्त हुए हैं।

गुप्त शासन में आर्थिक जीवन:-

आर्थिक मामलों में भी गुप्त काल भारत का स्वर्ण काल कहा जाता है इस समय भारत का व्यापार और उद्योग अपनी उन्नति के चरमोत्कर्ष पर था। गुप्त शासकों द्वारा बहुतायत में चलाए गए स्वर्ण सिक्कों से  यह बात सिद्ध होती है इसके अलावा कई लेखों से भी इसका प्रमाण प्राप्त होता है।

कृषि:-

भू राजस्व उपज का छठा भाग लिया जाता था।
भूमि को चार भागों में बांटा गया था
कृषि योग्य भूमि क्षेत्र काला टीका कहलाती थी।
निवास योग्य भूमि के वास कहा जाता था।
पशुओं के चरने योग्य भूमि चारागाह भूमि कही जाती थी।
जिस भूमि पर जुताई नहीं होती उसे सिल कहा जाता था।
जंगली भूमि अप्रहत कही जाती थी।
सिंचाई के लिए रहट व नहरों का प्रयोग होता था।

भूमि कर संग्रह करने वाला अधिकारी ध्रुवाधिकरण कहलाता था।

भू अभिलेखों को सुरक्षित रखने वाले अधिकारी महाक्षपटलिक व करणिक कहलाते थे।

जमीन संबंधी विवादों का निपटारा करने वाला अधिकारी न्यायाधिकरण कहलाता था।

ब्राह्मणों को दान में दी जाने वाली भूमि अग्रहार कहलाती थी।

उद्योग धंधे:-

गुप्त शासन में वस्त्र उद्योग उन्नत अवस्था में था, जुलाहों के बनाए गए वस्त्र लोग काफी मात्रा में धारण करते थे। चीन से भी रेशमी वस्त्र आता था। गुप्त साम्राज्य बंगाल की खाड़ी से अरब सागर तक विस्तृत था इसके अतिरिक्त दक्षिण के राज्य  गुप्तों के प्रभाव क्षेत्र में थे इस कारण हिंद महासागर का व्यापारिक मार्ग उनके प्रभाव में था। इस प्रकार स्थल और जल दोनों मार्गों से व्यापार होता था। गुप्त काल के प्रमुख बंदरगाह अरब सागर के तट पर स्थित भृगु कच्छ व बंगाल की खाड़ी के तट पर स्थित ताम्रलिप्ती थे।

प्रमुख कर:-

भूमिकर को भाग कहा जाता था।यह उपज का छठा भाग था।

उपरिकर भी एक प्रकार का भूमि कर था जो उनपर लगाया जाता था जो भूमि के स्वामी नहीं होते थे।

भोग वह कर था जो राजा को सब्जियों, फल,फूल आदि के रूप में दिया जाता था।

इसके अलावा व्यापारियों पर शिल्पियों पर और बंदरगाहों पर कर लगता था।

सीमा व बिक्री की वस्तुओं पर लगने वाला कर शुल्क कहलाता था।

प्रणय कर ग्राम वासियों से चंदे के रूप में लिया जाने वाला कर था।

विष्ठि कर का भी पता चलता है जो बेगार था।

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