गुप्त वंश का प्रारम्भ और प्रारंभिक शासक

आंध्र सातवाहन वंश के पश्चात भारत में काफी समय तक किसी शक्तिशाली राजवंश का उदय नहीं हुआ इस परिस्थिति में विदेशियों ने भारत कर पर आक्रमण करने प्रारंभ कर दिए। विदेशियों का भारत पर आक्रमण पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत से हुआ इस कड़ी में बाख्त्री यवन, शक, पल्हव, कुषाण जैसी जातियों ने भारत पर अनेक आक्रमण किए और कुछ भागों पर अपना अधिकार स्थापित करने में भी सफलता प्राप्त की यद्यपि सातवाहन साम्राज्य के पश्चात भारत में छोटे-छोटे गणतंत्र एवं राजवंशों ने राज्य किया और उन्होंने विदेशी जातियों का काफी विरोध किया परंतु उन्हें रोकने में पूरी तरह से सफल ना हो सके।

275 ईसवी में गुप्त वंश का उदय हुआ। गुप्त वंश का प्रथम शासक श्री गुप्त था। समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति में श्री गुप्त का नाम उसके आदि पूर्वज के रूप में प्राप्त होता है। श्री गुप्त सामंत की स्थिति में था। प्रयाग प्रशस्ति में श्री गुप्त को महाराजा की उपाधि से विभूषित किया गया जिससे अनुमान लगाया जाता है की वह छोटे भाग पर राज्य करता था।

शासकों का मूल निवास:-

गुप्त शासकों के मूल निवास स्थान के संबंध में विद्वानों में मतभेद है। कुछ विद्वान इत्सिंग नामक विदेशी यात्री के यात्रा विवरण के आधार पर गुप्तों को बंगाली बताते हैं जबकि पुराणों में प्रयाग, साकेत का शासक बताया गया है। समुद्रगुप्त के प्रयाग प्रशस्ति से भी गुप्त शासकों का वंश परिचय मिलता है।
अनेक इतिहासकारों ने गुप्त शासकों को अपने अपने हिसाब से जातियों में बांटा है परंतु निश्चित निष्कर्ष पर पहुंचना कठिन हो गया क्योंकि गुप्त शासकों ने अपने किसी भी अभिलेख में कहीं भी अपनी जाति का उल्लेख नहीं किया है।

काशी प्रसाद जायसवाल गुप्त शासकों को जाट कहते हैं इसके लिए उन्होंने कौमुदी महोत्सव का विवरण दिया है परन्तु कौमुदी महोत्सव की ऐतिहासिकता संदिग्ध है।

गुप्त शासकों को वैश्य मानने वालों में एलन नामक इतिहासकार प्रमुख हैं। उन्होंने इसके लिए मनुस्मृति का सहारा लिया है जिसमें ब्राह्मण के लिए शर्मा, क्षत्रिय के लिए वर्मा, वैश्य के लिए गुप्त और शूद्र के लिए दास की उपाधि निर्धारित की गई है परंतु यहां पर ध्यान देने योग्य है कि गुप्त शासकों का गुप्त नाम जातिसूचक ना होकर उपाधि सूचक है।

गुप्त शासकों को क्षत्रिय मानने वाले इतिहासकारों में वासुदेव उपाध्याय,रमेश चंद्र मजूमदार आदि हैं। इसके लिए उन्होंने शिवगुप्त के शीरपुर प्रशस्ति का उल्लेख किया है इसमें गुप्त शासकों को क्षत्रिय बताया गया है। इसके अलावा गुप्त शासकों ने लिच्छवी क्षत्रियों में अपने पुत्रों के विवाह किए।

लिच्छवियों के साथ वैवाहिक संबंध किसी को क्षत्रिय बताने के लिए पर्याप्त नहीं है क्योंकि गुप्त शासकों ने अनेक वर्णों में विवाह किए और उच्च वर्ग के वर व निम्न वर्ग की कन्या के साथ अनुलोम विवाह भारतीय समाज में प्रचलित था।

दशरथ शर्मा और कुछ अन्य लेखक गुप्त शासकों को ब्राह्मण कहते हैं इसके लिए सबसे ठोस प्रमाण चंद्रगुप्त द्वितीय की पुत्री प्रभावती गुप्ता के पुणे ताम्रपत्र को बताया गया है इसमें वह अपने आप को धारण गोत्र का बताती है। चंद्रगुप्त द्वितीय की पुत्री प्रभावती गुप्ता का विवाह वाकाटक नरेश रूद्र सेन द्वितीय से हुआ था जोकि विष्णु वृद्धि गोत्र का था।बौद्ध लेखक परमार्थ के अनुसार बालादित्य ने अपनी बहन का विवाह वसुरात नामक ब्राह्मण के साथ किया था।

परंतु मात्र वैवाहिक संबंध ही किसी के गोत्र निर्धारण का आधार नहीं हो सकते।

यह कहना थोड़ा कठिन है की गुप्त शासक किस वंश से संबंधित थे परंतु उस काल में ब्राह्मण वंश का अभ्युदय चल रहा था इसलिए उनके इसी वंश के होने की अधिक संभावना है।

गुप्त वंश का इतिहास जानने के स्रोत:-

गुप्त वंश का इतिहास जानने के अनेक स्रोत उपलब्ध हैं जिनमें प्रमुख हैं –

प्रयाग प्रशस्ति,चीनी यात्री फाह्यान का यात्रा विवरण,शूद्रक कृत मृच्छकटिकम, विशाखदत्त कृत देवी चंद्रगुप्त ,महरौली का लौह स्तंभ,स्कंदगुप्त का भीतरी स्तंभ लेख,गुप्त कालीन सिक्के आदि।

श्री गुप्त के पश्चात घटोत्कच गुप्त वंश का दूसरा शासक हुआ उसने महाराजा की उपाधि धारण की थी।

चंद्रगुप्त प्रथम:-

गुप्त वंश का पहला वास्तविक शासक चंद्रगुप्त प्रथम था। उसका राज्य पूर्णतया स्वतंत्र था और उसने अपने राज्य का विस्तार भी किया। चंद्रगुप्त प्रथम का राज्याभिषेक 319 ईसा पूर्व में हुआ।
चंद्रगुप्त प्रथम का राज्य प्रयाग से लेकर कोशल तक तथा बिहार के कुछ भागों तक विस्तृत था।

चंद्रगुप्त प्रथम के जीवन की महत्वपूर्ण घटना लिच्छवियों से वैवाहिक संबंध था इससे उसकी शक्ति काफी बढ़ गई। लिच्छवी राजकुमारी कुमार देवी से चंद्रगुप्त प्रथम का विवाह हुआ था चंद्रगुप्त के राजा रानी प्रकार की स्वर्ण मुद्रा से इस बात का पता चलता है जिसमें मुद्रा के एक तरफ चंद्रगुप्त और कुमार देवी का चित्र अंकित है तथा दूसरी तरफ लिच्छवयाः लिखा हुआ है।

चंद्रगुप्त प्रथम ने महाराजाधिराज की उपाधि धारण की थी और अपने राज्यारोहण की  तिथि से गुप्त संवत प्रारंभ किया ।

चंद्रगुप्त प्रथम की मृत्यु 335 ईसवी में हुई।उसके पश्चात उसका पुत्र समुद्रगुप्त सिंहासन पर बैठा।

Leave A Comment