गहड़वाल वंश

गहड़वाल वंश की उत्पत्ति के बारे में विद्वानों में मतभेद है कुछ विद्वान इन्हें राठौर और कुछ राष्ट्रकूट शासकों की शाखा का मानते हैं कुछ अन्य विद्वानों के अनुसार यह प्राचीन कौशांबी के चंद्रवंशी क्षत्रिय की संतान थे और राजनीतिक शक्ति के रूप में उनका उदय मिर्जापुर की पहाड़ियों के आसपास के प्रदेश में हुआ।
इस कारण ये गहढ़वाल (गुहा वाले) कहलाए।

इतिहास जानने के स्रोत:-

लक्ष्मीधर कृत कृत्य कल्पतरु,चंदबरदाई कृत पृथ्वीराज रासो,मेरुत्तुंग कृत प्रबंध चिंतामणि, चंद्रावती के लेख, कुमारदेवी का सारनाथ अभिलेख,मदनवर्मा का मऊ अभिलेख आदि प्रमुख हैं।

इनकी प्रारंभिक राजधानी वाराणसी थी इनका प्रथम ज्ञात शक्तिशाली राजा चंद्र देव था। जिसने अपनी शक्ति का विस्तार किया और 1085-86 ईसवी में कन्नौज के राजा गोपाल को हराकर उस पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया।

इसके अतिरिक्त कौशल और इंद्रप्रस्थ पर भी उसने अपना अधिकार बनाए रखा और तुर्कों को आगे नहीं बढ़ने दिया। उसने बंगाल के सेन वंश को भी पूर्व में आगे बढ़ने से रोका।
चंद्र देव का पुत्र मदन पाल हुआ वह आयुर्वेद का अच्छा जानकार था।

गहड़वाल शासक गोविंद चंद्र:-

मदन पाल का पुत्र गोविंद चंद्र शक्तिशाली शासक हुआ। जब वह युवराज था तभी उसने तुर्कों के आक्रमण को विफल किया था।

1114 ईसवी में वह सिंहासन पर बैठा।

बंगाल के पाल शासकों की शक्ति को कमजोर देखकर उसने पश्चिमी मगध पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। उसका राज्य पूर्वी मालवा तक विस्तृत था।

उसकी रानी कुमार देवी बौद्ध थी और उसने सारनाथ में बौद्ध विहार का निर्माण कराया।

गोविंद चंद्र विद्वानों का आश्रय दाता था उसके मंत्री लक्ष्मीधर ने कानून और राजनीति पर प्रसिद्ध ग्रंथ कृत्य कल्पतरु लिखा।

गहड़वाल वंश के शासक गोविंद चंद्र के पश्चात उसका पुत्र विजय चंद्र 1154- 55 के आसपास गद्दी पर आसीन हुआ उसने तुर्कों के आक्रमण का सफल प्रतिरोध किया और अमीर खुसरो के पुत्र खुसरो मलिक को हराकर भगा दिया उसके समय में गढ़वाल राज्य पूरी तरह सुरक्षित था परंतु चौहान शासक बीसलदेव ने उससे दिल्ली छीन लिया।

गहड़वाल शासक जयचंद:-

विजयचंद के पश्चात उसका पुत्र जयचंद 1170 ईसवी में गद्दी पर बैठा उसके पास एक विशाल सेना थी उसने तुर्कों को, गुजरात के सोलंकियों एवं देवगिरी के यादवों को हराया था।
पूर्व में गया तक उसका राज्य विस्तृत था। 

उसकी पुत्री का नाम संयोगिता था। उसने संयोगिता के विवाह के लिए स्वयंवर रचा और उसमें पृथ्वीराज को आमंत्रित नहीं किया।

उस स्वयंवर से चाहमान शासक पृथ्वीराज तृतीय ने संयोगिता का अपहरण कर लिया इसके कारण उनकी शत्रुता बहुत बढ़ गई।

जब मुहम्मद गोरी ने भारत पर आक्रमण किया तो उसने पृथ्वीराज की सहायता नहीं की बल्कि गोरी को आक्रमण का निमंत्रण दे डाला।

इसी कारण अपनी योग्यता के बाद भी वह महान अपयश का भागी बना।

शिहबुद्दीन मोहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज को हराने के बाद 1194 ईसवी में कन्नौज पर आक्रमण किया। जयचंद चंदावर के युद्ध में लड़ता हुआ मारा गया।

शिहाबुद्दीन गोरी ने कन्नौज राज्य को लूटा और काफी धन संपदा अपने साथ ले गया।

जयचंद विद्वानों का आश्रयदाता था और उसकी सभा में श्रीहर्ष नामक प्रसिद्ध कवि रहता था जिसने खंडन खंड काव्यनैषध चरित की रचना की थी।

जयचंद के बाद उसका पुत्र हरिश्चंद्र गद्दी पर बैठा ।1198 ईसवी में तुर्क शासक इल्तुतमिश ने कन्नौज पर अधिकार करके गहढ़वाल वंश का अंत कर दिया।

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