कौटिल्य कृत अर्थशास्त्र

कौटिल्य कृत अर्थशास्त्र के अनुसार :-

राजा भूमि प्राप्त करने के लिए युद्ध करते हैं और भूमि से अर्थ(संपत्ति ) की उत्पत्ति होती है इस‌ प्रकार भूमि प्राप्त करने के लिए राजा के द्वारा किया गया प्रयास, दूसरे राज्यों के साथ संबंध और युद्ध अर्थशास्त्र के अंतर्गत आते हैं अतः इसका अर्थशास्त्र नाम दिया जाना उचित है।

प्रथम दृष्टया अर्थशास्त्र का नाम सुनने से यह अनुमान लगाया जाता है कि यह धन की प्राप्ति अथवा धन के प्रबंधन से संबंधित ग्रंथ होगा परंतु वास्तव में यह राजनीति शास्त्र से संबंधित ग्रंथ है।

अर्थशास्त्र ग्रन्थ का रचनाकार :-

अर्थशास्त्र के रचयिता नाम विष्णुगुप्त था वे राजनीतिशास्त्र के प्रकांड विद्वान एवं तक्षशिला में दंड नीति के आचार्य थे उनके पिता का नाम चणक था इसलिए उन्हें चाणक्य कहा गया तथा शत्रुओं को परास्त करने के लिए इन्होंने कुटिल नीति का पालन किया इसलिए कौटिल्य कहलाए।

आचार्य चाणक्य महात्मा बुद्ध के देह त्याग(483 ई.पू.) के लगभग 150 वर्ष बाद हुए थे।

चाणक्य का मगध के शासक धनानंद ने अपमान किया था। इस अपमान का बदला लेने के लिए उन्होंनेे नंद वंश का विनाश करने की प्रतिज्ञा की थी । धनानंद का विनाश करके उन्होंने खंड- खंड में बंटे हुए भारत को चंद्रगुप्त मौर्य की सहायता से संगठित किया और एक श्रेष्ठ शासन व्यवस्था स्थापित किया।

आचार्य को सिंहासन का मोह नहीं था क्योंकि उनका जीवन एक सन्यासी की तरह था।वे ब्रह्मचारी थे और जीवन भर अविवाहित रहे।

लुप्त ग्रन्थ की पुनः प्राप्ति:-

अर्थशास्त्र ग्रंथ की रचना चाणक्य ने की। बाद में यह ग्रंथ लुप्त हो गया और काफी समय तक लुप्त रहा। सन 1905 में दक्षिण भारत के तंजोर जिला निवासी एक ब्राह्मण ने मैसूर गवर्नमेंट प्राचीन पुस्तकालय में कौटिल्य कृत अर्थशास्त्र की एक हस्तलिखित प्रति सौंपी ।पुस्तकालय के अध्यक्ष श्याम शास्त्री ने इसका एक संस्करण प्रकाशित किया ।बाद में सन 1915 में इसका अंग्रेजी अनुवाद भी किया गया और यह अनुवाद भट्टस्वामी की आंशिक टीका के आधार पर किया गया था जो पुस्तक के साथ प्राप्त हुई थी। इस पुस्तक के संपूर्ण अंश नहीं मिल पाए हैं जितना अंश प्राप्त हो सका है उससे यह पुस्तक राजनीति शास्त्र का अमृत कही जा सकती है।

कौटिल्य कृत अर्थशास्त्र चाणक्य द्वारा रचित राजनीति शास्त्र का एक महान ग्रंथ है। अर्थशास्त्र भारत के इतिहास का ही नहीं वरन संपूर्ण विश्व इतिहास का एक अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ है ।

अर्थशास्त्र में राजनीति, कूटनीति और दो राज्यों के मध्य संबंध स्थापित करने से संबंधित ऐसे- ऐसे नियमों का वर्णन किया गया है जिन्हें देखने के बाद प्राचीन काल में भारतीय विद्वानों की महान बुद्धि का पता चलता है।

आधुनिक समय में विभिन्न राज्यों द्वारा विश्व कूटनीति के संबंध स्थापित करने के लिए अर्थशास्त्र का मार्गदर्शन लिया जाता है।अर्थशास्त्र में राजा के कर्तव्य ,दूसरे राज्य से सम्बन्ध स्थापित करने का तरीका ,राजा और राज्य को सुरक्षित बनाये रखने का तरीका इन सभी कूटनीतिक बातों का वर्णन है।

राजा अथवा राष्ट्राध्यक्ष के कर्तव्य:-

दयामास्थाय परमां धम्माद विचलन्‌‍‍‍‍ नृदप।पीड़ितानाम नाथानाम कुर्य्यादश्रुपमार्ज्जनम।।

अर्थात राजा अपने धर्म से विचलित ना हो, पर दया में स्थित हो, पीड़ित अनाथ जनों का क्लेश दूर करें ।यह उसका प्रथम कर्तव्य है।
 किसी कारण से भी प्राणियों पर क्रूरता ना करना यही सब का परम कर्तव्य है तथा राजा का कर्तव्य है जो व्यक्ति दुखी पीड़ित हों उनका स्नेह पूर्वक पालन पोषण करें।

आचार्य विष्णुगुप्त ने अर्थशास्त्र में लिखा है कि –

ऐसा कौनसा कुलीन श्रेष्ठ पुरुष होगा जो अपने थोड़े से सुख के लिए कमजोर प्राणियों को बिना विचारे पीड़ित करे ऐसा करने वाला प्राणी निश्चय ही अधम अर्थात नीच होता है।

जिस समय कोई राजा कोई गलत काम करता हो या अनुचित कर्तव्य करता हो तो मंत्रियों का यह कर्तव्य है कि उसे गलत काम करने से रोके और राजा का कर्तव्य है कि वह गुरुजनों और मंत्रियों के वचनों को माने।

संवर्धयेत्सदा कोशमाप्तैस्तज्ज्ञैरधिष्ठितम।काले चास्य व्ययं कुर्य्यात्रिवर्गपरिवृद्धये।।

अर्थात विभिन्न कार्यों के ज्ञाता विद्वानों जैसे- अर्थशास्त्र के ज्ञाता, धन के लेनदेन से संबंधित विषयों के ज्ञाता, भूमि की उपज से संबंधित विषयों के ज्ञाता व्यक्तियों को राजकार्य में ले तथा उनसे राजकीय कोष की वृद्धि करें तथा उस धन को त्रिवर्ग धर्म, अर्थ, काम की प्राप्ति के लिए व्यय करें अर्थात राजकोष के धन को जनकल्याण के लिए खर्च करें।

कौटिल्य कृत अर्थशास्त्र के अनुसार:-

धर्मार्थं क्षीण कोशस्य कृषत्वमपि शोभते।सुरै पीतावशेषस्य सरद्धिमरूचेरिव।।

अर्थात धर्म कार्य यानी लोक कल्याण के कार्य में राजकोष का धन घट भी जाए तो उस घटे हुए राजकोष की भी शोभा होती है ।आचार्य कौटिल्य के अनुसार जिस प्रकार शरद ऋतु में देवताओं के द्वारा अमृत पी लेने से चंद्रमा क्षीण हो जाता है तो भी शरद कालीन चंद्रमा पूज्य होता है।।

 उद्वेजयति तीक्ष्णेन मृदुना परिभूयते।तस्ताद्धथार्हतो दण्डं नयेत्पक्षमनाश्रित‌:।।

कठोर दंड से प्रजा विचलित होती है कोमल दंड से तिरस्कार करने लगती है इस कारण बिना पक्षपात के ना तो अधिक कठोर दंड दे ना ही अधिक कोमल बर्ताव करें राजा इसी प्रकार से अपना सम्मान प्राप्त कर सकता है।
प्रजात्मश्रेयसे राजा कुर्वीतात्मजरक्षणम।लोलुभ्यमानास्तेअर्थैषु हन्युरेनमरक्षिता:।।

अर्थात प्रजा और अपने कल्याण के निमित्त राजा अपने पुत्र की रक्षा करें यदि अपने पुत्रों की राजा रक्षा नहीं करता है तो वे पुत्र राज्य लोभ में आकर राजा की हत्या कर देते हैं।

अर्थात यदि राजा अपने पुत्रों की देखभाल और उनका ध्यान नहीं रखता है तो वे दूसरों के हाथ में भी पड़ सकते हैं और दूसरों के कहे अनुसार चल कर राजा का व प्रजा का नुकसान कर सकते हैं।

आचार्य चाणक्य के अनुसार:-यदि राजपुत्र राजा के द्वारा रक्षित भी हों तो भी यदि वे राजा की किसी कमी को देख लेते हैं तो निसंदेह शेर के बच्चों के समान अपने ही रक्षक को मार डालते हैं।

दुर्बुद्धि वाले राजपुत्र का भी त्याग नहीं करना चाहिए यदि उसे निकाला जाएगा तो वह शत्रु का आश्रय लेकर पिता को मार देगा।

कौटिल्य कृत अर्थशास्त्र के अनुसार राजा की सुरक्षा की व्यवस्था:-

आचार्य चाणक्य ने एक राष्ट्राध्यक्ष की सुरक्षा के लिए जो -जो व्यवस्था बताई है उसका अनुसरण आधुनिक समय में बड़ी आसानी से उसी रूप में ही किया जा सकता है वर्तमान समय में किसी देश के प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति की सुरक्षा व्यवस्था का यह आधार हो सकता है।

विष परीक्षण:-

याने शय्यासने पाने भोज्ये वस्त्रे विभूषणे ‌। शर्वत्रैवाप्रमत्त: स्याद्वर्ज्जेत विषदूषितम।।

अर्थात सवारी, सय्या, आसन, भोजन, वस्त्र ,आभूषण इतनी वस्तुओं के व्यवहार में राजा सदा सतर्क रहें इसमें विष मिलाया जा सकता है।

कौटिल्य कृत अर्थशास्त्र में लिखा है कि – राजा विष को दूर करने वाली औषधियों के जल से प्रतिदिन स्नान करे विष के जानने वाले वैद्यों के परीक्षा करने के बाद ही भोजन ग्रहण करे।

भोज्य पदार्थ में विष मिला होने पर सावधानी:-

भोजन की परीक्षा करने के निमित्त पहले अग्नि को दें फिर पक्षियों को लेकर उसकी चेष्टा का अध्ययन करें।

यदि अग्नि से नीला धुआं निकले और फूटने के समान शब्द हो अथवा पक्षी भोजन करके मर जाए तो उस अन्न में विष मिला हुआ है।

आचार्य चाणक्य ने विष के परीक्षण के लिए विभिन्न उपाय बताये हैं इन उपायों के जरिए हम आसानी से पता लगा सकते हैं कि किस खाद्य अथवा पेय पदार्थ में विष मिला हुआ है

अस्न्विनता मादकत्यमाशु चलम शल्यम विवर्णता। अन्नस्य  विषदिग्धस्य तथोष्मा स्निग्धमेचक:।।

विष मिला हुआ भोजन को यदि गरम ना भी किया गया हो तो वह जरूरत से अधिक गर्म हो जाता है और उसमें चिकनाहट आ जाती है।

खाने में जहर मिला हुआ है तो वह जल्दी सूख जाएगा अगर उसे पकाया जाता है तो उसमें काला फेन उठेगा उसकी गंध और उसको छूने से यह सब अलग प्रकार से ही हो जाएगा।

जिस भोजन में जहर मिलाया गया है उसको पकाने पर भाप नहीं निकलेगी और वह ऊपर की तरफ अधिक उबलेगा और उसमे बहुत अधिक मात्रा में फेन उठता है। 

खरं मृदु: स्यानमृदुन: खरत्वं वदन्ति के चाल्पकजंतु घातम।

अर्थात जिस वस्तु में जहर मिला हुआ है वह अगर नरम है तो कठोर हो जाती है और यदि कठोर है तो वह नरम हो जाती है अपना स्वभाव बदल देती है।

यदि विष सूखे भोजन में मिला हुआ है तो वह छोटे-छोटे भागों में बिखर जाता है और उसका रंग बदल जाता है अर्थात कुरंग हो जाता है।

कौटिल्य कृत अर्थशास्त्र के अनुसार किसी पेय पदार्थ में विष मिले होने पर जानकारी:-

रसस्य नीला पयसश्व ताम्र मद्यस्य तोपस्य च कोकिलाभा।श्यामासरन्ध्राविषदूषितस्य मध्ये भवत्यूर्धवगता च लेखा।।

यदि किसी रस में विष मिला हुआ है तो उस रस की सतह नीली हो जाती है ।यदि दूध में जहर मिला हुआ है तो उसकी सतह तांबे के रंग की हो जाती है। यदि शराब में और जल में जहर मिलाया गया है तो उसका रंग काला पड़ जाता है और उसके मध्य में छेद की तरह होकर बुलबुले जैसा ऊपर की तरफ उठता हुआ दिखाई देता है।

किसी धातु के ऊपर जहर लगाया गया हो तो उस पर मैल के जैसे जम जाता है और उसका रंग,उसका भार यह सब बदल जाता है।

कौटिल्य कृत अर्थशास्त्र के अनुसार राजा के लिए सावधानी :-

कार्येद्भुवनशोधमादो मातुरंतिकमपि प्रविविक्षु:। आप्तशस्व्यनुगत: प्रविशेच्च संकटेषु गहनेषु न तिष्ठेत्।।

पहले भवन का शोधन करें तथा उसका सही प्रकार से निरीक्षण करें। आचार्य चाणक्य के अनुसार चाहे अपनी माता के समीप ही क्यों न जाना हो जहां जाना हो उस स्थान का भली प्रकार से परीक्षण करने के बाद शस्त्रधारी पुरुषों के साथ ही उसमें प्रवेश करें।

जिस समय मौसम ठीक ना हो बवंडर चल रहा हो धूल भरी आंधियां उठ रही हैं या तेज बारिश हो रही हो अथवा बड़ी तेज गर्मी या अंधेरा हो उस समय कहीं पर आना-जाना ना करें।

यदि कहीं पर आना जाना हो तो आने जाने के मार्ग का सही प्रकार से निरीक्षण करें और आम जनता को उस स्थान से आने-जाने की रोक लगा दे उसके बाद ही गमन करें।यह प्रयोग आधुनिक काल के लगभग सभी देशों के महत्वपूर्ण व्यक्तियों के संबंध में किया जाता है।

भीड़भाड़ वाली जगह अथवा जो पानी की जगह हो वहां पर न जाए और अगर जाना जरूरी है तो अधिक समय तक वहां ना रुके।

राजा के शयन कक्ष के बाहर उसके अन्तःपुर के रक्षकों की दैनिक टुकड़ी सदैव तैनात रहे और राजा के अंत:पुर में रहने वाले लोगों के आने-जाने की कोई रोक ना रहे परंतु वे कोई न कोई चिह्न लेकर ही जाएं और उनके आने जाने का कारण अवश्य ज्ञात हो इसके अतिरिक्त राजा के सेवक बिना वर्दी के ना रहें।

कौटिल्य कृत अर्थशास्त्र के अनुसार पत्नी के सम्मुख जाने पर राजा की सावधानी:-

ना हि देवीगृहं गच्छेदात्मीयात्सन्निवेशनात्।  अत्यर्थवल्लभोअपीह विश्वासं स्त्रीषु न व्रजेत।।

राजा को चाहिए कि वह बिना अपनी निजी सुरक्षा व्यवस्था के रानी के पास भी ना जाए कैसी भी प्रिय हो परंतु स्त्री का सर्वथा विश्वास ना करे।।
इस अविश्वास का कारण बताते हुए आचार्य चाणक्य ने कई इतिहास के उदाहरण प्रस्तुत किए हैं। उनके अनुसार:-

स्त्री के घर में छुपे हुए भद्रसेन नामक राजा को उसके भाई ने ही मार डाला था और माता के बिस्तर में छुपकर उसी के पुत्र ने अपने पिता कारुष को मार डाला था।।

 देवी तु काशीराजेंद्रम् निजघान रहोगतम।        लाजान विषेण संयोज्य मधुनेति विलोभित:।।

काशीराज की खीर में विष मिलाकर उसी की पत्नी ने ही उसे मार डाला था।

अर्थशास्त्र ग्रन्थ के रचनाकार ने इसके अतरिक्त सौवीर का उदाहरण दिया है जिनकी पत्नी ने उनके पहनने वाली मणि पर जहर लेपित कर दिया था जिससे उनकी मृत्यु हो गई और जारुष को उसकी पत्नी ने दर्पण से मार दिया था। विदूरथ की पत्नी ने अपने बालों में शस्त्र छुपाकर राजा को मार डाला था।

इन्हीं सब ऐतिहासिक घटनाओं को देखते हुए आचार्य चाणक्य  इस निर्णय पर पहुंचे थे कि राष्ट्र का जो प्रमुख होता है वह वास्तव में एक परिवारिक व्यक्ति की अपेक्षा कहीं अधिक राष्ट्र का मुखिया होता है। एक अच्छा राजा अपनी जनता को सुखी रख सकता है ।अपने राष्ट्र को सुरक्षित रख सकता है इसलिए राजा व्यक्तिगत संबंधियों की अपेक्षा राष्ट्र की अमानत अधिक होता है और उसकी सुरक्षा प्रत्येक प्रकार से करनी चाहिए क्योंकि राष्ट्र का प्रमुख और यदि वह योग्य भी है तो उसको समाप्त करने के लिए देश के शत्रुओं के द्वारा लगातार प्रयत्न किया जाता है जिससे वे राज्य और उसकी जनता को अपने अधीन कर सकें।

कौटिल्य कृत अर्थशास्त्र के अनुसार शत्रुओं के साथ व्यवहार:- 

 तस्मादुत्थानयोगेन प्रतापं जनयेत्परम।

अर्थात राजा को अपने शत्रुओं पर सदैव दबदबा बनाए रखना चाहिए उन्हें कभी भी अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहिए

अरि मित्रस्य मित्रस्य पीड़नं पृथ्वीपति:। कुर्वीतोभयमित्रेण मित्रमित्रेण चैव हि।।

राजा शत्रु के मित्र का अथवा शत्रु के मित्र के मित्र का पीड़न अपने मित्र अथवा मित्र के मित्र से कराएं।

इसका अर्थ हुआ कि राजा को अन्य राज्यों से मैत्री संबंध स्थापित करनी चाहिए और यदि शत्रु राज्य उसे परेशान करता है अथवा कोई शत्रु राज्य का राजा अपने किसी मित्र राजा से उस राजा को परेशान करने का प्रयत्न करता है तो राजा को उसके आसपास स्थित अपने मित्र राजाओं से उस शत्रु के मित्र राजा को परेशान करवाना चाहिए।

इस प्रकार से चारों तरफ से पीड़ित होकर वह राजा नाश को प्राप्त होता है अथवा अपने वश में हो जाता है।

वर्तते पक्षपातेन मित्रं यदुभयात्मकम्।

राजा को चाहिए कि ऐसे मित्र को शीघ्र नष्ट कर दे जो दोनों तरफ से मिला हुआ हो क्योंकि वह विश्वास के कभी भी योग्य नहीं होता और राजा का नुकसान कर सकता है। 

सर्वोपायेन कुर्वीत सामान्यं मित्रमात्मसात्। भवंति मित्रादुच्छिन्न: सुखत्छेद्धा हि शत्रव:।।

जिस भी उपाय से बन पड़े शत्रुओं के जो सामान्य मित्र हैं उन्हें अपनी तरफ मिला के रखना चाहिए और धीरे-धीरे शत्रु को उनके मित्रों से रहित कर दें बिना मित्र के शत्रु आसानी से समाप्त हो सकता है।

आचार्य चाणक्य के अनुसार राजा को चाहिए की प्रजा की हर प्रकार से देखभाल करें और उनकी हमदर्दी हमेशा प्राप्त करने का प्रयास करें जिस राजा के साथ उसकी प्रजा हो जाती है वह अजय हो जाता है।

  यदि किसी शत्रु को मार देने से दूसरा शत्रु उठ खड़ा हो तो उसका नाश नहीं करना चाहिए बल्कि विभिन्न उपायों से उसे अपने अधीन करना चाहिए।

कौटिल्य कृत अर्थशास्त्र के अतिविरोध से बचें:-

आत्मा बलं वा सुहृदो धनानि वृथा भवंतीह निमेषमात्रात्।मुहुर्मुहश्वाकुलितानितानि तस्मान्नविद्वान्नतिविग्रही स्यात।।

अपना शरीर ,बल,सुहृद वर्ग और धन एक पल मात्र में दूसरे के हो जाते हैं उनकी स्थिति निश्चित नहीं रहती है और वे भी प्रभावित हो जाते हैं। इस कारण से विद्वान को इन सब के भरोसे रह कर कभी किसी से भी विग्रह नहीं करना चाहिए। उसे अति विरोध से बचना चाहिए।

कौटिल्य कृत अर्थशास्त्र के अनुसार धन से ,मान से अथवा औषधियों का प्रयोग करने के द्वारा बुद्धिमान राजा को अपने शत्रु के प्रमुख पुरुषों को भ्रमित कर देना चाहिए या अपने पक्ष में मिलाने का प्रयास करना चाहिए। शत्रु के आमात्यों से मिलकर उस राजा को मजबूर कर दे।

युद्ध आवश्यक हो जाये तो क्या करें:-

अन्योदेशस्तुकालो वा प्रभूतौ चाक्षयव्यौ। श्रान्तोपजापाद्विश्वस्तं यस्मात्सैन्यं परस्य च। अल्जप प्रसारो हन्तव्य इत्युपेक्षया भृतैर्बलै:।। 

अर्थात जब युद्ध करना आवश्यक हो जाए तो शत्रु के देश की पूरी जानकारी ली जाए किस समय आक्रमण किया जाए इसकी योजना बनाई जाए। अपने और शत्रु की हानि और युद्ध में लगे हुए खर्चे इन सब को देख कर लड़ाई करना चाहिए । शत्रु की सेना जब थकी हुई हो तो चढाई करें इसके अलावा शत्रु की सेना में फूट डाल दिया जाए। अपने लोगों के द्वारा उनमें चुगली आदि के द्वारा भेद पैदा कर दिया जाए ।इस प्रकार का प्रयोजन किया जाए कि सेना के नायक अपने सैनिकों को अपमानित करें इसके पश्चात ही चढ़ाई किया जाए तो सफलता अवश्य प्राप्त होती है।

कौटिल्य कृत अर्थशास्त्र में आचार्य चाणक्य ने युद्ध जीतने के लिए प्रत्येक प्रकार के उपाय को सही माना है क्योंकि अत्याचारी के सम्मुख पराजित होने से देश और जनता पर भारी विपत्तियां आ जाती है और लूट -खसोट के द्वारा राज्य बर्बाद हो जाता है।

कौटिल्य कृत अर्थशास्त्र में बताया गया है कि शत्रु की सेना यदि बड़ी दिखे तो उसे शराब की लत में फंसा कर उसको दुर्बल कर दें। जब दुश्मन थका हुआ हो तो दिन के तीसरे पहर में युद्ध करके उसका विनाश करें। रात को सोते हुए दुश्मन को भी मारा जा सकता है।निशि विश्रम्मसंसुप्तम ततसौक्तिक विधान वित।

राजा अपने राज्य में कैसे रहे:-

इतिमंत्रबलान्महीपतिर्महतो दुष्टभुजंग मानिव।विनयेन्नयमार्गमास्थितो वशमुद्योग समन्वितो रिपून।।
इस प्रकार से राजा अपने सहयोग बल से बड़े शत्रुओं को भी दुष्ट सर्प के समान वश में करने का प्रयत्न करता रहे तथा स्वयं नीत के मार्ग में अपने आप को लगाए रहें और उन्नति करने का प्रयास करें।

इसका अर्थ यह हुआ कि राजा या राज्य प्रमुख को चाहिए कि अपने आस पड़ोस के व अपने से शत्रुता रखने वाले राज्यों के बारे में हमेशा जानकारी रखें। साम, दाम, दंड, भेद हर नीति का प्रयोग करते हुए उसे अपने वश में रखने का प्रयत्न करता रहे जबकि स्वयं अपने राज्य का पालन पोषण न्याय और इमानदारी के साथ करें तथा अपनी वह अपनी जनता की उन्नति करें।

कौटिल्य कृत अर्थशास्त्र के अनुसार मंत्रणा:-

कौटिल्य मंत्रणा पर विशेष बल देते थे उनके अनुसार मंत्रणा सदैव गुप्त होनी चाहिए

निस्तंभे निर्गवाक्षे च निर्भेद्ये अंतर संश्रये। प्रसादा पर्यारण्ये वा मन्त्रयेता विभावितः।।

जिस स्थान में स्तम्भों की आड़ ना हो ,झरोखे न हों, कोई आ न सकता हो, दुर्भेद्य हो ,अंतर में कोई वस्तु न हो,ऐसे स्थान में महल के ऊपर या निर्जन वन में व्याकुलता रहित चित्त से मन्त्र की सम्मति करें।

दूत और गुप्तचर:-

आचार्य चाणक्य ने अर्थशास्त्र में दूतों के दो प्रकार बताएं पहला है प्रकट दूसरा है गुप्त।

प्रकट दूत वह होता है जो राजा की किसी सूचना को दूसरे राज्य तक पहुंचाए वह दूसरे राज्य में राजा के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करें जिसे सभी लोग जानते हैं।

जबकि गुप्त दूत को गुप्तचर कहा जाता है

प्रकट दूत:-

प्रगल्भ: स्मृतिमान्वागमी शास्त्र चास्य च निष्ठित:। अभ्यस्त कर्मा नृपतेर्दूतो भावितुर्महति।।

दूत बातचीत की कला में निपुण किसी बातों को याद रखने वाला, विशेष वक्ता ,अस्त्र-शस्त्र में पारंगत और अपने कार्य का अभ्यास किया हुआ राजा का सच्चा सहायक होना चाहिए।

दूत का कर्तव्य होता है कि वह राजा की आज्ञा से विभिन्न स्थानों पर जाये और दूसरे के राज्य का भेद प्राप्त करें अर्थात उसकी कमियों को जानने का प्रयत्न करें।

अंतः पालास्तु कुर्वीत मित्राण्याटविकांस्तथा। जल स्थलानि मार्गोष्च विद्यात्वबलसिद्धये।।

ऐसे आदमी को अपने निवास स्थान की सुरक्षा में नियुक्त करें जो उसके मित्रों तथा वनों एवं पहाड़ियों के आसपास रहने वाले लोगों और उनके द्वारा अपनी सेना की सुविधा के लिए उसके आवागमन के लिए जल और स्थल मार्गों को जानने का प्रयास करें।

दूत का कर्तव्य होता है कि वह अपने राजा और अपनी प्रजा की कभी भी बुराई ना करें तथा उसकी कमियों को ना बताएं इसके अलावा बहुत ही  नम्र वाणी से बातचीत करें।यदि राजा के समीप रहे तो अपने भाव को छुपाते हुए उसकी कमियों को जानने का प्रयास करें।

गुप्तचर अथवा गुप्त दूत:-

बाल:कृषीवलो लिंड़्गी भिच्छुको अध्यापकस्तथा।संस्था: स्युश्चारसंस्थित्यै दत्तदाया:शुभाशया:।।

बालक, किसान, वनवासी, भिक्षा मांगने वाले ,अध्यापक यह सब दूतों के वेश की मर्यादा हैं ।दूतों को इस प्रकार के भेष बनाकर रहना चाहिए और इन सब कार्यों को करते हुए अपने राज्य के हित के लिए प्रयास करें।

खाना बनाने वाले ,बिस्तर लगाने वाले, सिंगार करने वाले ,भोजन कराने वाले ,शरीर दबाने वाले, फल आदि देने वाले ,आभूषण देने वाले इस प्रकार से जिसको जिस भी कार्य में अभ्यास है उसको उसी कार्य में राज परिवार के व्यक्तियों के मध्य दूत के रूप में नियुक्त करें और वे राजा और प्रमुख व्यक्तियों की विशेषताओं को, उनकी गतिविधियों को, उनकी योजनाओं को जानने व समझने का प्रयास करें।
आचार्य चाणक्य ने अर्थशास्त्र में लिखा है कि संपूर्ण जगत की इच्छा को जानते हुए जैसे सूर्य की किरणें जल को ग्रहण करती हैं इस प्रकार से सब की व्यवस्था को समझ लें।

अनेकशिल्पाध्ययनप्रवीणाश्चरेयुर्बहुलिड़्गरूपा:।

अनेक शिल्प विद्या व अध्यापन विद्या में चतुर दूत गण अनेक प्रकार के रूप धारण कर स्थान स्थान पर विचरण करें।

अंत में अर्थशास्त्र के रचयिता ने यह भी कहा है:-

स्वपक्षे परपक्ष च यो न विद चिकर्षितम्। जाग्रन्नापि सुषुप्तोअसौ न भुय: प्रतिबद्धयते।।

जो राजा अपने पक्ष के और विरोधी पक्ष के व्यक्तियों के कार्य करने की इच्छा को नहीं जानता है वह राजा जागता हुआ भी सोता है और फिर जागता ही नहीं है।

कृषि व्यापार एवं कर व्यवस्था:-


शुल्क व्यवहारों वाह्ममाभ्यान्तरं चातिथ्यम् निष्काम्यं, प्रवेश्यं च शुल्कम्।

कौटिल्य कृत अर्थशास्त्र के अनुसार कर वसूली के प्रकार:-

इसके तीन प्रकार हैं –

बाह्य कर –अपने राज्य में उत्पन्न होने वाले वस्तुओं पर लगने वाली चुंगी

अभ्यांतर-राजधानी के भीतर उत्पन्न होने वाली वस्तुओं पर चुंगी

आतिथ्य-विदेश से आने वाले माल पर चुंगी।

इसके दो प्रकार भी हैं नंबर एक निष्काम्य और नंबर दो प्रवेश्य

बाहर जाने वाले माल पर लगाई जाने वाली चुंगी को निष्काम्य कहा जाता है और बाहर देश से आने वाले माल पर लगायी जाने वाली चुंगी को प्रवेश्य कहा जाता है।

आयातित माल पर उसकी लागत का पांचवा हिस्सा चुंगी के रूप में लिया जाना चाहिए।इसके अलावा फल ,मूल, साग, सब्जी पर उनकी उपज का छठा हिस्सा, शंख, हीरामणि, हार आदि पर कर लगाने चाहिए। कपड़ों पर भी उसी हिसाब से चुंगी लगाई जाए।

आचार्य चाणक्य ने अर्थशास्त्र में कर प्रणाली का बड़ा ही विस्तृत वर्णन दिया है। प्रत्येक वस्तु पर कितना कर लिया जाए और किन-किन वस्तुओं पर कर लगाया जाए सब का वर्णन दिया गया है।

मौर्य काल में रुपजीवा अर्थात वैश्याऔं से भी कर लिया जाता था।रूपजीवा भेगद्वयगुणं भासं दद्यु:।

जल व्यापार के सम्बन्ध में:-

मौर्य काल में नदी मार्ग से काफी मात्रा में व्यापार होता था इसका वर्णन अर्थशास्त्र में किया गया है।

पत्तनाध्यक्ष निबंधं पन्यपत्तन चारित्रम नावध्यक्ष: पालयेत।

नगर के अध्यक्ष द्वारा नियत किए गए बंदरगाह संबंधी नियमों को नाव का अध्यक्ष भली-भांति पालन करें।

द्वाताहतां तां पितेवानुगृड़्कीयात्।                उदकप्राप्तं पण्यशुल्कमर्धशुल्कं आ कुर्याति।

यदि दिशाओं का अंदाजा ना लग सके, तूफान में नौका फंस जाए तो  नौका अध्यक्ष का यह कर्तव्य बनता है कि वह पिता के समान बनकर नाव में स्थित लोगों को बचाने का प्रयास करें‌। यदि नाव में पानी लग जाए और माल का नुकसान हो जाए तो जितनी मात्रा में नुकसान हो उसी हिसाब से उसके टैक्स को कम कर दें अगर पूरा नुकसान हो जाए तो कर माफ कर दे

याश्चानिध्विकासिन्य: प्रोषितविधवा व्यंगा: कन्यका वाअअमानं विभृयुस्ता: स्दावदासीभिरनुसार्य सोपग्रहं कर्म कारयितव्या:।

जो स्त्रियां पर्दा नसीन हों, जिनके पति परदेश गए हो, विधवा हो ,लूली- लंगडी हों, जिनका विवाह ना हुआ हो, जो आत्मनिर्भर रहना चाहती हों ऐसे स्त्रियों के संबंध में सूत व्यवसाय के अध्यक्ष को चाहिए कि दासियों द्वारा भेज कर उनसे सूत कटवाए और उनके साथ अच्छा व्यवहार करें।

कौटिल्य कृत अर्थशास्त्र के अनुसार फसल बोन का समय :-

इसके अलावा आचार्य चाणक्य ने सारी बातों को बताया है कि फसल कब बोई जाए। अर्थशास्त्र के अनुसार वर्षा जल को मापने के लिए एक हाथ मुंह वाला कुंड बनाया जाए जब उस कुंड में 16 द्रोण पानी भर जाए तो समझ जाना चाहिए कि रेतीली जमीन पर फसल बोई जा सकती है और जहां पर अधिक बारिश होती हो वहां 24 द्रोण पानी भरे ,दक्षिणी प्रदेशों में साढे 13 द्रोण पानी भरे, मालव प्रदेश के लिए 23 द्रोण पानी ,पश्चिमी प्रदेश के लिए अधिक से अधिक पानी भरे और हिमालय प्रदेश तथा नहरी प्रांतों के लिए समय-समय पर पानी मिले इस प्रकार फसल बोना चाहिए।

कौटिल्य कृत अर्थशास्त्र के अनुसार सरकारी जंगलों या ऋषियों के आश्रम के समीप रहने वाले बाघों , भैंसों, मोर तथा मछलियों के मरने पर प्रतिबंध लगा दिया जाए जो भी व्यक्ति उनको मारे या उनको नुकसान पहुंचाए उसको दंडित किया जाए।

अर्थशास्त्र ग्रन्थ में राज्य से संबंधित व राज्य की उन्नति से संबंधित राजा के कर्तव्य आदि सभी बातों को अच्छी तरह से समाहित किया गया है। जिस भी प्रकार से राज्य की उन्नति हो वह कार्य किया जाए।राजा द्वारा अन्य राज्यों के साथ संबंध, गुप्तचरों को भेजना ,युद्ध, व्यापार कर प्रणाली, कृषि आदि सभी बातों को अर्थशास्त्र में समाहित किया गया है।

अर्थशास्त्र एक महान ग्रंथ है।अर्थशास्त्र नामक पुस्तक को पढ़ने के बाद प्राचीन भारत में भारतीय विद्वानों की संगठन क्षमता, व्यवस्था कौशल देखकर अत्यंत आश्चर्य होता है। अर्थशास्त्र में वर्णित व्यवस्थाओं का सीधे-सीधे अनुसरण कर राज्य को ठीक प्रकार से चलाया जा सकता है और राज्य की और उसकी जनता की सुरक्षा व उन्नति सुनिश्चित की जा सकती है।

इन्हें भी देखें:-

चंद्रगुप्त मौर्य

बिन्दुसार

अशोक के अभिलेख

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