कुमारगुप्त प्रथम

चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के पश्चात 414 ईसवी में उसका पुत्र कुमारगुप्त प्रथम सिंहासन पर आसीन हुआ। उत्तराधिकार में उसने चंद्रगुप्त द्वितीय से एक बड़ा साम्राज्य प्राप्त किया था। उसकी किसी भी विजय के विषय में कोई भी जानकारी नहीं प्राप्त होती। मंदसौर शिलालेख के अनुसार कुमारगुप्त का शासन सागर तक  विस्तृत था। उसके सिक्कों से भी साम्राज्य की विशालता का पता चलता है। कुमारगुप्त प्रथम ने महेन्द्रादित्य की उपाधि धारण की थी।

कुमारगुप्त ने अश्वमेध शैली के सोने के सिक्के चलवाए थे  जिसके एक तरफ खंभे से बंधा हुआ अश्वमेध का घोड़ा और दूसरी ओर हाथ में चंवर लिए राजमहिषी का चित्र अंकित है। कुमारगुप्त के कुछ सिक्कों पर घोड़े के नीचे अश्वमेध लिखा है और दूसरी तरफ अश्वमेध महेंद्र लिखा हुआ है इस आधार पर अनुमान लगाया जाता है कि कुमारगुप्त ने अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया था परंतु किस उपलक्ष में किया था यह पता नहीं चल सका है।

पुष्यमित्रों का विद्रोह :-

कुमारगुप्त के शासन के अंतिम समय में पुष्यमित्र वंश के लोगों ने नर्मदा नदी के किनारे विद्रोह किया परंतु यह विद्रोह दबा दिया गया।

हूणों का आक्रमण:-

उसी समय पश्चिमोत्तर भारत पर हूणों का जबरदस्त आक्रमण हुआ और संभवतया उन्होंने कुछ स्थानों पर अधिकार भी स्थापित कर लिया इस परिस्थिति में कुमारगुप्त ने अपने पुत्र स्कंद गुप्त को उनका सामना करने के लिए भेजा। स्कंद गुप्त ने अत्यंत साहस और वीरता का परिचय दिया तथा हूणों के साथ उसका भयंकर युद्ध हुआ।

यह युुद्ध इतना भयानक था कि स्कंद गुप्त को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। अंत में वह हूणों को परास्त करने में और मार भगाने में सफल हुआ।

इसके अतिरिक्त कुमारगुप्त का शासन अपेक्षाकृत शांत रहा उसके समय में विभिन्न कलाओं की उन्नति हुई जिसमें वास्तु कला, मूर्तिकला, चित्रकला, साहित्य आदि हैं।

कुमार गुप्त ने ही नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना किया था।

कुमारगुप्त की मृत्यु 455 ईसवी में हुई थी। उसके पश्चात उसका पुत्र स्कंद गुप्त सिंहासन पर बैठा।

कुमारगुप्त के सिक्के:-

कुमारगुप्त प्रथम अश्वमेध (सोने के सिक्के )

कुमारगुप्त के सिक्के गुप्त कालीन सिक्कों में सबसे अधिक कलात्मक हैं।कुमारगुप्त के अश्वमेध प्रकार के सिक्के पर एक तरफ यज्ञ का अश्व बंधा है और दूसरी तरफ राजमहिषी का चित्र उत्कीर्ण है।

कुमारगुप्त के धनुर्धर प्रकार के सिक्के भी प्राप्त हुए हैं।

इसके अलावा अन्य प्रकार के सिक्कों पर सिंह से युद्ध करते हुए  सम्राट का चित्र और दूसरी तरफ सिंह पर आसीन दुर्गा का चित्र अंकित है।
कुमारगुप्त का राजा रानी  प्रकार के सिक्के प्राप्त हुए हैं जिसमें वृद्ध राजा और युवती रानी का चित्र उत्तीर्ण है।

कुमारगुप्त प्रथम कार्तिकेय

अन्य प्रकार की सिक्कों में कुमारगुप्त का मोर को फल खिलाते हुए चित्र है इसकी दूसरी तरफ मयूर पर बैठे हुए कुमार कार्तिकेय का चित्र उत्तीर्ण है।

इसके अतिरिक्त अश्वारोही प्रकार के सिक्के भी प्राप्त हुए हैं।

कुमारगुप्त प्रथम के चांदी और तांबे के सिक्के भी प्राप्त हुए हैं।

कुमारगुप्त प्रथम के चांदी के सिक्के

कुमारगुप्त के समय में प्रचलित सिक्कों का वजन 125 और 129 ग्रेन है।

इसे भी देखें:-

गुप्त शासन का राजनैतिक,सामाजिक और सांस्कृतिक स्वरूप

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