ऋग्वैदिक अथवा पूर्व वैदिक काल में आर्यों का जीवन संचरण

वेद का अर्थ होता है ज्ञान (ऋग्वैदिक काल को पूर्व वैदिक काल कहा जाता है)

वेद के तीन भाग हैं -1 -ऋचा (श्लोक ) , 2-साम(लय के साथ गायन ),3-यजुष (यज्ञ की विधियों से सम्बंधित गद्द )

महर्षि वेदव्यास जिन्हें नारायण का अंशावतार भी कहा जाता है उन्होंने वेदों का संकलन किया। पहले वेदों के मंत्र व पद अलग-अलग जगहों पर थे ,वेदव्यास जी ने उन्हें संकलित और वर्गीकृत किया। उनके अनुसार ऋग्वेद ,यजुर्वेद और सामवेद मिलकर त्रयी कहलाते हैं। एक चौथा वेद अथर्ववेद है जिसमें तंत्र मंत्र और औषधियों का वर्णन किया गया है।

ऋग्वेद प्रारम्भिक आर्यों के जीवन पर प्रकाश डालने वाला एक मात्र महत्वपूर्ण ग्रन्थ है। इस विषय में प्राप्त अन्य सभी ग्रंथों ने ऋग्वेद का ही सहारा लिया है।

ऋग्वैदिक काल में आर्यों का जीवन सरल था।

इस ग्रंथ को ऋषियों ने अपौरुषेय कहा है अर्थात इसकी रचना किसी व्यक्ति ने नहीं की। ये कब रचा गया कोई नहीं जानता।

ऋग्वेद में वर्णित आर्यों के जीवन व रहन-सहन की मनोरम झांकी इस प्रकार है –

ऋग्वैदिक काल में सामाजिक जीवन :-

आर्य संस्कृति ग्रामीण संस्कृति थी। आर्य परिवार ग्रामों में निवास करते थे। ग्राम के मुखिया का चुनाव होता था और उसे ग्रामणी कहा जाता था।आर्यों का समाज सिंधु घाटी सभ्यता के विपरीत पितृ सत्तात्मक था।

कुल या परिवार :-

आर्यों के समाज की सबसे छोटी इकाई कुल थी जिसमें माता-पिता ,भाई और अविवाहित बहन सम्मिलित थे। इसका मुखिया परिवार का सबसे वयोवृद्ध और अनुभवी व्यक्ति होता था जिसे कुलप कहा जाता था। वह अपने परिवार पर असीमित अधिकारों से सम्पन्न होकर शासन करता था। उसके पास दंड देने का भी अधिकार था।

विवाह संस्कार :-

कई प्रकार के विवाह प्रचलित थे जिसमे ब्रह्म विवाह सबसे उत्तम और गन्धर्व विवाह मध्यम श्रेणी का माना जाता था।

ब्रह्म विवाह में पिता और परिवार वाले आपस में मिलकर वर और कन्या की सहमति से पुत्री का विवाह कराते थे। ऋग्वेद में वर्णित सोम और सूर्या का विवाह इसका उदाहरण है।

इसके अतिरिक्त कन्याओं को अपना पति चुनने का भी अधिकार था। मेलों ,उत्सवों पर वे ऐसा कर सकती थीं।

समाज में बाल विवाह की प्रथा प्रचलित नहीं थी।

मुख्यतया एक विवाह की ही प्रथा थी बहु विवाह अपवाद स्वरुप ही थे। समाज में विधवा विवाह होते थे और पति के ना रहने पर नियोग प्रथा भी प्रचलित थी।

विवाह के समय दिया गया उपहार व दान स्वैक्षिक था इसे वहतु कहते थे।

जीवन भर विवाह ना करने वाली स्त्रियां अमाजू कहलाती थीं। इनका भरण-पोषण पिता या भाई करता था।

पुत्र के जन्म पर विशेष उल्लास होता था। आर्य लोग पुत्र प्राप्ति के लिए प्रार्थना करते थे। कन्या के जन्म पर उल्लास नहीं रहता था परन्तु दोनों की समान देखभाल की जाती थी सम्भवता आर्यों को अनेक जातियों से लगातार संघर्ष करना पड़ता था जिसके लिए पुरुषों की आवश्यकता पड़ती थी इसलिए वे पुत्र के लिए प्रार्थना करते थे।

स्याम ते त इन्द्र ये त ऊती अवस्यव ऊर्जं वर्धयन्तः। शुष्मिन्तम यं चाकनाम देवस्मे रयिं रासि विरवन्तं।13 ।(ऋग्वेद,मंडल -2 ,सूक्त-13)

अर्थात – हे इंद्रदेव !हम रक्षा की कामना से आपको तेजस्वी बनाते हैं ,अतः सदैव हम आपके संरक्षण में रहें। हमारी कामना के अनुरूप पुत्रों से युक्त धन हमें प्रदान करें।

स्त्रियों की दशा :-

संपूर्ण ऋग्वैदिक काल में स्त्रियों का सम्माननीय स्थान था। स्त्रियां माता ,पुत्री और पत्नी के रूप में सम्मान पाती थीं। पर्दा प्रथा नहीं थी। पुरुषों के साथ स्त्रियों का भी लालन पालन समुचित प्रकार से किया जाता था।वे स्वतंत्र रूप से विचरण कर सकती थीं। कई स्त्रियों ने वेदों की ऋचाएँ भी लिखी हैं विदुषी स्त्रियों में विश्ववरा ,अपाला ,घोषा आदि प्रमुख हैं। परन्तु स्त्री को शासक बनने का अधिकार नहीं था। सम्भवता आर्य सदैव संघर्ष में लगे रहते थे जिसके लिए शक्तिशाली नेतृत्व की आवश्यकता थी।

वस्त्र व आभूषण :-

आर्य सादे वस्त्र पहनते थे परन्तु ये वस्त्र बनाने की कला में पारंगत थे। आर्य मुख्यतया तीन प्रकार के वस्त्र पहनते थे –

वास –ऊपर पहना जाने वाला वस्त्र जैसे -उत्तरीय,शाल ,चोली।

अधिवास –नीचे पहना जाने वाला वस्त्र जैसे -धोती ,साड़ी।

ऊष्णीय –सिर पे बांधने वाली पगड़ी।

इसके अतिरिक्त नीवी एक प्रकार का वस्त्र था जो अंदर पहना जाता था जैसे -लंगोट आदि।

स्त्री पुरुष दोनों आभूषण और श्रृंगार के शौक़ीन थे। इनके मुख्य आभूषण कर्ण शोभन ,निष्कग्रीव ,मणिग्रीव, खादि (कंगन ) आदि थे।

भोजन :-

आर्यों का भोजन शाकाहारी और मांसाहारी दोनों प्रकार का था। शाकाहारी में चावल ,जौ ,दूध दही ,घी और गोरस का प्रयोग होता था। मांसाहारी में भेड़ ,बकरी ,बछड़े का मांस खाया जाता था। गाय को अहन्या कहा जाता था और उसको मारना वर्जित था।

मनोरंजन के साधन :-

घुड़दौड़ ,रथदौड़ ,पशुओं की लड़ाई ,जुआ आदि। यद्द्यपि जुआ निंदनीय कर्म माना जाता था पर इसका प्रयोग बहुत होता था। लोग जुए में अपना सर्वस्व तक लुटा देते थे। इसके अतिरिक्त नृत्य ,संगीत ,कलाबाजी ,मेला से भी मनोरंजन होता था।

आर्थिक जीवन :-

ऋग्वैदिक काल में आर्यों का मुख्य व्यवसाय पशुपालन था। जो जितनी अधिक गायें पालता था वह उतना धनवान माना जाता था। लोग सौ ,हजार गायें तक पालते थे। गायें व्यापार में विनिमय का साधन भी थीं।

इसके आलावा वे कृषि के बारे में भी जानते थे ऋग्वेद में

हलवाहा के लिए –कीवाश शब्द का प्रयोग किया गया है।

हल के लिए ——-लांगल शब्द

बैलों के लिए ——वृक

कुँए के लिए ——-अवत

जुते हुए खेत ——उर्वरा

गोबर की खाद —-करीष कही जाती थी।

ऋग्वैदिक काल में आर्यों को सोने ,चांदी ,लोहे का ज्ञान था। सोने के आभूषण निष्क का मुद्रा के रूप में भी प्रयोग होता था।

व्यापारी को ——पाणि कहा जाता था।

सूदखोर ——– वेकनाट कहलाता था।

आर्यों के जीवन में धन का बहुत महत्व था वे धन ,घर प्राप्ति के किये देवों की प्रार्थना करते थे।

तमित सखित् ईमहे तं राय तं सुवीर्ये।स शक्रउत नः शकदिन्द्रो वसु दयमानः।6।(ऋग्वेद मंडल-1 ,सूक्त -10 )

अर्थात – हम उन इंद्र के पास मित्रता के लिए ,धन प्राप्ति और उत्तम बल-वृद्धि के लिए स्तुति करने जाते हैं। वे इन्द्रदेव बल और धन प्रदान करते हुए हमें संरक्षित करते हैं।

ऋग्वैदिक काल में राजनीतिक जीवन :-

आर्यों ने अपनी सामाजिक उन्नति और शत्रुओं पर विजय के लिए राजनीतिक रूप से अपनी संस्थाओं को सशक्त बना लिया था।

ऋग्वैदिक आर्यों की सबसे छोटी इकाई कुल थी जिसका मुखिया कुलप कहलाता था जो परिवार का सबसे वयोवृद्ध व्यक्ति होता था।

अनेक कुलों से मिलकर ग्राम बनता था जिसका मुखिया ग्रामणी कहलाता था।

कई ग्राम मिलकर विश बनाते थे जिनका मुखिया विशपति कहलाता था।

अनेक विश मिलकर जन बनाते थे जिनका मुखिया राजन कहलाता था।

राजा का चुनाव जनता द्वारा किया जाता था। परन्तु बहुत बाद में धीरे -धीरे यह पद पैतृक हो गया फिर भी राजा जनता के प्रति पूर्ण उत्तरदायी था। राजा अपने जन की सुरक्षा का पूर्ण उत्तरदायित्व लेता था। इस सुरक्षा और व्यस्था के बदले लोग राजा को स्वैक्षिक कर देते थे जिसे बलि कहा जाता था।

आर्यों की दो महत्वपूर्ण राजनैतिक संस्थायें थीं –

सभा :-

इसे उच्च सदन भी कहा जा सकता है। यह समाज से ही आए हुए श्रेष्ठ बुद्धिमान और अनुभवी व्यक्तियों की संस्था थी ,सभा के सदस्यों को सभेय,सभासद पुकारा जाता था।सभा के अध्यक्ष को सभापति पुकारा जाता था। सभा के सदस्यों को पितर कहा जाता था जिससे ज्ञात होता था कि वे उम्रदार और अनुभवी व्यक्ति होते थे। यह राजा के ऊपर पूरा नियंत्रण करती थी और उसे विभिन्न विषयों पर सलाह देती थी।

समिति :-

समिति निम्न सदन जैसा था यह सामान्य जनता का प्रतिनिधित्व करती थी। सभी जन इसके स्वाभाविक सदस्य होते थे। सामान्य नियम और विभिन्न विषयों पर इसमें बात होती थी।राजा का चुनाव इसी में से होता था। इसके अध्यक्ष को ईशान कहा जाता था। इनमे आपस में मत भिन्नता भी हो जाती थी इसीलिए इसकी एकता के लिए प्रार्थना की गई है। समिति में स्त्रियाँ भी जाती थीं और इसमें उनके द्वारा ऋक गान किया जाता था।

आर्यों की सबसे प्राचीन संस्था जो जनसभा थी उसे विदथ कहा जाता था।

जनता द्वारा प्राप्त स्वैक्षिक कर बलि का बंटवारा राजा के अनुयाइयों के बीच करने वाला अधिकारी भागदुध कहलाता था।

ऋग्वैदिक काल में दुर्ग की रक्षा करने वाले को पुरप कहा जाता था।

ऋग्वेद का सबसे महत्वपूर्ण युद्ध राजा सुदास और दस विरोधी राजाओं के संघ के बीच परुष्णी(रावी) नदी के तट पर लड़ा गया जिसमे सुदास विजयी हुए। इस युद्ध में राजा सुदास के पुरोहित वशिष्ठ ऋषि और अन्य दस राजाओं के पुरोहित विश्वामित्र ऋषि थे। दस राजाओं में पांच आर्य(पुरु ,यदु ,तुर्वसु ,द्रुह्यु ,अनु ) और पांच अनार्य(अकिन्न,पक्थ ,भलानश,विषाणी ,शिवि ) राजा थे। इस युद्ध का वर्णन ऋग्वेद के 7 वें मंडल में दिया है।

ऋग्वैदिक काल में आर्यों को सदैव सशस्त्र संघर्ष करते रहना पड़ता था क्योंकि उनके आस- पास कुछ ऐसी शक्तियां सक्रिय रहती थीं जो उन्हें चैन नहीं लेने देती थीं यह इस बात से प्रामाणिक होता है कि ऋग्वेद में जगह जगह शत्रु पर विजय के लिए देवों से प्रार्थना की गयी है।

वयं शूरेभिरस्तृभिरिन्द्र त्वया युजावयं। सासहयाम पृतन्यतः।4।( ऋग्वेद म -1 सू -8 )

अर्थात -हे इन्द्रदेव आपके द्वारा संरक्षित कुशल शस्त्र चालक वीरों के साथ हम अपने शत्रुओं को परास्त करें।

धार्मिक जीवन :-

आर्य बाहरी कर्मकाण्डों से पूरी तरह मुक्त थे। वे शुद्ध रूप से प्रकृति के पुजारी थे। उन्होंने प्रकृति की गोद में रहते हुए जो कुछ अनुभव किया उससे वे प्रफुल्लित हो जाते थे और उसका गान करने लगते थे। जैसे –

यः पुष्पिणिश्च प्रसवश्च धर्माणाधिदाने व्यश्वनीरधारयः।

यश्चासमा अजनो विद्दुतो दिव उरुरुर्वो अमित सास्युक धयः।(ऋग्वेद म -२ सू -13 छ -5 )

अर्थात – हे इन्द्रदेव आपने खेतों में फूल और फल वाली औषधियों को गुणवान बनाकर उनका संरक्षण किया। आपने प्रकाशित सूर्य को नाना किरणे प्रदान की आपकी महानता से ही सुदूर तक विस्तृत पर्वतों का प्रादुर्भाव हुआ। ऐसे महान आप प्रशंसा के योग्य हैं।

कभी कभी वे प्रकृति के रूप को समझ नहीं पाते तो उससे भय भीत हो जाते,उसे ध्यान से समझने का प्रयास करते और उसकी प्रार्थना भी करते । जैसे –

आ यो वना तात्रिषाणो न भाति वार्ण पथा रथ्येव स्वानीत।कृष्णाध्वा तपू रणवाश्चिकेत द्दौरिव स्मयमानो नभोभिः। (ऋ. म -2 सू -6 छ -6 )

अर्थात –जैसे प्यासा व्यक्ति पानी पीता है ,उसी प्रकार द्रुतिगति से वनों को जलाने वाले अग्निदेव ,रथ को वहन करने वाले घोड़े की भांति शब्द करते हैं। वह कृष्ण धूम मार्ग से जाने वाले ,सभी को ताप देने वाले ,रमणीय अग्नि देव नक्षत्रों से प्रकाशित आकाश की तरह सुशोभित होते हैं।

ऋग्वैदिक आर्य यज्ञ को विशेष महत्व देते थे और यज्ञ को देवों को प्रसन्न करने का उपयुक्त साधन मानते थे। पूरा ऋग्वेद यज्ञ की स्तुतियों से भरा पड़ा है। इनके मुख्य देवता निम्न हैं –

इन्द्र –

इंद्र वैदिक आर्यों के सबसे लोकप्रिय देवता हैं इनका वर्णन ऋग्वेद में लगभग 250 सूक्तों में आया है। ये सर्वशक्तिमान देवता हैं इनके पास मन की गति से चलने वाले घोड़े हैं। इन्द्र शत्रु संहारक और संगठन के देवता हैं। इनका वर्णन ऋग्वेद में कुछ इस प्रकार से किया गया है –

युञ्जन्ति ब्रध्नमरूषम चरन्तं परि तस्थुषः। रोचन्ते रोचना दिवि।(ऋ. म -1 सू -6 छ -1 )

अर्थात –द्दु लोक में आदित्य(सूर्य ) रूप में ,भूमि पर अहिंसक अग्नि रूप में ,अंतरिक्ष में सर्वत्त प्रसरणशील वायु के रूप में उपस्थित हैं। उन्हें उक्त तीनों लोकों के प्राणी अपने कार्य में देवत्व रूप से सम्बद्ध मानते हैं।

अग्नि –

ऋग्वेद में अग्नि बहुत महत्व पूर्ण देवता हैं लगभग 200 सूक्तों में इनका गायन किया गया है। अग्नि की खोज वैसे भी मनुष्य की क्रान्तिकारी उपलब्धि है।ऋग्वेद में अग्नि को पालक ,रक्षक और देवताओं व मनुष्यों के बीच की कड़ी माना गया है।

नू ते पूर्वस्यावसो अधीतो तृतीये विदथे मन्म शांसि(ऋ.म -2 सू -6 छ -8)

अर्थात –हे अग्नि देव आपने पूर्व समय में भी हमारा संरक्षण किया है ,अतः हम तीसरे सवन में भी मनोहारी स्त्रोत का उच्चारण करके उसका स्मरण करते हैं।

आर्य देवताओं का आवाहन करने के लिए हवन में अग्नि को प्रकट करते थे ,उनका विश्वास था कि अग्नि के माध्यम से देवताओं तक उनकी प्रार्थना पहुँचती है। जैसे –

मधुमन्तम तनूनपाद यज्ञं देवेषु नः कवे। अद्द्या कृणुहि वीतये।(ऋ.म-1,सू-13,छ-2)

ऊर्ध्व गामी ,मेधावी हे अग्निदेव !हमारी रक्षा के लिए प्राणवर्धक -मधुर हवियों को देवों के निमित्त प्राप्त करें और उनतक पहुचायें।

पर्जन्य –

पर्जन्य जल बरसाने वाले देव हैं ,ये वायवीय देवता हैं। पर्जन्य जल के साथ प्राणतत्व का भी वर्षं करके वनस्पतियों को पुष्ट बनाते हैं। पर्जन्य का अर्थ मेघ है।

वरुण-

वरुण देवता जल के देवता माने जाते हैं। ये सम्पूर्ण भुवनों के राजा माने जाते हैं( तेन विश्वस्य भुवनस्य राजा)। इन्हे रात्रि देवता भी कहा जाता है।

द्दौ –

द्दौ का अर्थ आकाश के रूप में लिया गया है ये आकाश के देवता हैं। स्वतंत्र रूप से इनका 8 बार प्रयोग किया गया है बाकी समय किसी न किसी के साथ इनका प्रयोग हुआ है।इनका पिता के रूप में और पृथ्वी को माता के रूप में प्रयोग हुआ है।

वायु –

वायु देव सभी देवों में तीव्र गति वाले हैं इन्हें समस्त देवताओं की आत्मा कहा जाता है। वायु की गति तिरछी होती है।

सविता –

ऋग्वेद में सविता का वर्णन है सविता का अर्थ उदय होने से पूर्व सूर्य से लिया जाता है (उदयात पूर्व भावी सविता ) .इन्हें देवताओं का जनक कहा गया है। गायत्री मन्त्र से इन्ही की स्तुति की गई है।

ऊषा –

इसकी स्तुति में ऋग्वेद के 20 सूक्त हैं। ऋग्वेद में इन्हे अंधकार को भगाने वाली ,समस्त प्राणियों को जगाने वाली और देवों पर भी उपकार करने वाली बताया गया है। आर्यों ने उषा काल को जिस प्रकार से देखा अनुभव किया उसी प्रकार से ऋग्वेद में उसका बड़ा ही मनोरम वर्णन किया है।

सोम –

ऋग्वेद में सोम का वर्णन कई बार आया है ये पुष्टि कारक एवं बलवर्धक हैं। इनका वर्णन वनस्पति के रूप में ही अधिक हुआ है। सोमलता से सोमरस निकालकर यज्ञ में आहुति द्वारा देवताओं को प्रसन्न किया जाता था।

रितुर्जनित्री तस्या अपस्परि मक्षू जात आविशद्दासु वर्धते। तदाहना अभवत पिप्युषी पर्योअशोः पीयूषं प्रथमं तदुक्थ्यं। (ऋ. म -2 ,सू -13 ,छ -1 )

अर्थात –वर्षा से सोम की उत्पत्ति होती है ,यह सोम जल में मिलकर बढ़ता है। श्रेष्ठ रस वाली लता कूटकर निकालने योग्य होती है। यह प्रशंसनीय सोमरस इन्द्रदेव का हविष्यान्न है।

इसके अतिरिक्त पूषा ,पृथ्वी ,इन्द्रवायु ,इन्द्राग्नि ,सरस्वान आदि का भी वर्णन है।

हमने देखा कि ऋग्वैदिक काल के आर्य कितनी उच्च बौद्धिक क्षमता से युक्त थे जिस समय संसार की जातियों में बोली का भी ठीक से अविष्कार नहीं हुआ था उस समय वेदों की ऋचाओं का गायन किया जाता था।

आर्यों के अन्दर समय के साथ मानवता और समस्त समाज के कल्याण का भाव जागृत होता चला गया और वे मानवीय गुणों से ओतप्रोत थे जैसे ऋग्वेद मंडल-2 सूक्त-9 छ-1 में अग्निदेव को अदब्ध व्रत प्रमतिर्वशिष्ठः सहस्त्रम्भरः शुचिजिह्वो अग्निः( नियमों पर आरूढ़ ,आश्रय दाता,हजारों का भरण पोषण करने में समर्थ और सत्यवक्ता अग्नि) कहा गया है।

आर्यों ने ईश्वर की रचना का गुणगान किया और ईश्वर के द्वारा जीवों के भरण पोषण के लिए की गयी व्यस्था के कारण उसे धन्यवाद भी दिया। जैसे यो भोजनम च दयसे च वर्धनमार्दादा शुष्कम मधुमददुदोहिथ।(ऋ.म-2,सू-13,छ-6) अर्थात- “हे इन्द्रदेव आप वृद्धि के साधन और भोजन प्रदान करते हैं,गीले पौधों से सूखे पदार्थ प्रदान कराते हैं।”

इस प्रकार हम देखते हैं कि ऋग्वैदिक सभ्यता और संस्कृति अत्यंत उन्नत और महान संस्कृति है। धीरे -धीरे बाद में उत्तर वैदिक काल में इसका उत्तरोत्तर विकास होता गया।

इन्हे भी देखें:-

आर्यों की उत्पत्ति और विकास

11 thoughts on “ऋग्वैदिक अथवा पूर्व वैदिक काल में आर्यों का जीवन संचरण

  1. Ashutosh

    Quite informative and good to learn

    1. rahulti332

      thanks for giving a trusted base to this artical

  2. Justin

    I don’t typically comment on posts, but as a long time reader
    I thought I’d drop in and wish you all the best during these troubling times.

    From all of us at Royal CBD, I hope you stay well with the COVID19 pandemic progressing at an alarming rate.

    Justin Hamilton
    Royal CBD

    1. rahulti332

      THANKS

  3. Royal CBD

    Greate pieces. Keep posting such kind of info on your page.

    Im really impressed by your site.
    Hello there, You’ve done a fantastic job. I will definitely digg it and
    in my view recommend to my friends. I’m sure they will be benefited from this site.

    1. rahulti332

      thanks

  4. Roy

    Ahaa, its good discussion on the topic of this piece of writing here at this
    web site, I have read all that, so now me also commenting at
    this place.

  5. http://needlevalve6455.angelfire.com/index.blog/1800898/steel-wcb-parameters-and-analogues/

    I every time spent my half an hour to read this website’s articles everyday along with a cup of coffee.

  6. omega replica watches

    All that I wanted I got.

  7. replica breitling

    Definitely fantastic, really worth buying, thank you!

  8. panerai replica

    Beautiful, bold watch. Love that you can see the gears moving front and back.

Leave A Comment