उत्तरवर्ती गुप्त शासक

स्कंद गुप्त के पश्चात गुप्त साम्राज्य का धीरे धीरे ह्रास होने लगा। इसके कई कारण थे जिनमें प्रमुख कारण बाहरी आक्रमण और आंतरिक दुर्बलता था।

बाहरी आक्रमणों ने गुप्त शासन व्यवस्था को आघात पहुंचाना प्रारंभ कर दिया। उस समय की परिस्थितियों में अत्यंत योग्य एवं जागरूक शासक ही राज्य की सुरक्षा में समर्थ हो सकता था जिसका  बाद के राजाओं में अभाव दिखाई देता है।

उत्तर गुप्त कालीन राजाओं का परिचय निम्न प्रकार है:-

पुरुगुप्त:-

पुरुगुप्त स्कंद गुप्त का सौतेला भाई था स्कंद गुप्त की मृत्यु के पश्चात वह सिंहासन पर बैठा उसका शासन अधिक समय तक नहीं चला। वह वृद्धावस्था में राजा बना था। उसने प्रकाशादित्य और श्री विक्रम की उपाधि धारण की थी। उसके सिक्कों से पता चलता है कि उसके समय में उसके चाचा गोविंदगुप्त ने मालवा में अपनी सत्ता स्थापित कर ली थी। 

नरसिंह गुप्त बालादित्य:-

उसके विषय में विशेष जानकारी नहीं प्राप्त होती है । इसने अपने नाम से सिक्के चलाए थे इन्हीं से इसके विषय में जानकारी प्राप्त होती है।

कुमारगुप्त द्वितीय:-

इसके पश्चात कुमारगुप्त द्वितीय शासक बना सारनाथ में स्थित बुद्ध मूर्तियों पर लेख मिले हैं इसमें उसका नाम दिया गया है।

बुद्धगुप्त:-

बुद्धगुप्त के प्राप्त सोने चांदी के सिक्कों पर 175 ईसवी अंकित है जो कि गुप्त संवत है गणना करने के पश्चात उसका समय 494-95 ईसवी के आसपास ठहरता है। सारनाथ में भी मिली बुद्ध मूर्ति पर लेख लिखा हुआ है जिसमें उसका नाम उत्कीर्ण है।  उसका राज्य बंगाल, वाराणसी, यमुना के पास के प्रदेश और नर्मदा के क्षेत्र तक विस्तृत था।

भानुगुप्त बालादित्य:-

बुद्ध गुप्त के पश्चात भानु गुप्त सिंहासन पर बैठा। उसने बालादित्य की उपाधि धारण की थी। एरण से एक लेख मिला हुआ है जिसके अनुसार लगभग 510-511 ईसवी में गोपराज भानु गुप्त के साथ एरण गया था और किसी युद्ध में मारा गया परंतु इस युद्ध में भानु गुप्त को विजय प्राप्त हुई थी और उसने गोप राज की याद में एक स्मारक बनवाया था।

कुमारगुप्त तृतीय:-

भीतरी नामक स्थान पर सोने की मोहर प्राप्त हुई है जिसमें धनुर्धर प्रकार के सिक्के मिले हैं जो कुमारगुप्त तृतीय के बताए गए हैं।

विष्णुगुप्त:-

कोलकाता के कालीघाट से कुछ सिक्के प्राप्त हुए हैं जो सोने के धनुर्धर भांति के हैं जिनमें दाहिने हाथ के नीचे विष्णु और राजा के पैरों के बीच में ‘ रु ‘ लिखा हुआ है तथा पिछले भाग पर श्री चंद्रादित्य लिखा हुआ है। इसे बंगाल के शासक समाचार देव ने परास्त किया था।
इस प्रकार गुप्त वंश का महान शासन समाप्त हुआ।

परन्तु विद्वान इस बात पर एकमत नहीं है कि गुप्त वंश के इतने ही शासक हुए क्योंकि नरेन्द्रादित्य ,जयगुप्त ,हरिगुप्त ,वीर सेन के भी सिक्के प्राप्त हुए हैं।

बौद्ध ग्रन्थ में भी वज्र और तथागत राजाओं के नाम प्राप्त होते हैं।

गुप्त वंश के पतन के कारण :-

हूणों का आक्रमण:-

स्कंद गुप्त के समय से ही हूण भारी जमाव के साथ हिंदूकुश के दक्षिण में इकट्ठा होने लगे थे वे अत्यंत ही बर्बर परंतु युद्ध कला में प्रवीण थे स्कंद गुप्त ने उन्हें लगातार पराजित किया और आगे बढ़ने नहीं दिया परंतु उसके पश्चात कोई भी शासक इतना जागरूक और कर्मठ नहीं हुआ जिसके कारण हूणों और अन्य  शक्तियों को लगातार आक्रमण करने का अवसर मिल गया।लगातार आक्रमण और संघर्ष से गुप्त साम्राज्य कमजोर होता चला गया।

आंतरिक दुर्बलता:-

गुप्त शासकों की शासन व्यवस्था मांडलिक प्रणाली पर आधारित थी। दिग्विजयी शासकों ने विभिन्न राज्यों को अपने अधीन करके उन्हें आंतरिक मामलों में स्वतंत्र कर दिया। उन्हें विशेष अवसरों पर दरबार में उपस्थित होना पड़ता था इसके अलावा वे राजा को  समय-समय पर कर व उपहार  देते थे आवश्यकता पड़ने पर सहायता भी करते थे। जब तक राजा शक्तिशाली था तब तक उसकी आज्ञा का पालन हुआ परंतु  जैसे-जैसे गुप्त शासक कमजोर होते चले गए प्रांतीय अधीन शासकों ने स्वतंत्र होना प्रारंभ कर दिया।

शासकों की अयोग्यता:-

बाद के गुप्त शासकों में योग्यता का अभाव दिखाई देता है जिस कारण से वे अपने साम्राज्य को सुरक्षित ना कर सके। जब राज्य में बाह्य एवं आंतरिक दोनों तरफ से समस्या हो तो ऐसी परिस्थिति में अत्यंत योग्य शासक ही इसे संभाल सकता है।  जिसका स्कंद गुप्त के बाद के शासकों में अभाव दिखाई देता है।

इन्हे भी देखें:-

समुद्रगुप्त

चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य

कुमारगुप्त प्रथम

गुप्त कालीन सिक्के

गुप्त शासन का राजनैतिक,सामाजिक और सांस्कृतिक स्वरूप

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