आर्यों का राज्य विस्तार

आर्यों का राज्य और उनके वंश के विस्तार का ज्ञान मुख्यतया धर्म ग्रंथों से प्राप्त होता है और इनमें श्रीमद भागवत महापुराण व विष्णुपुराण प्रमुख हैं।

आर्यों को देवताओं तथा ऋषियों की सन्तान कहा गया है इसका कारण है कि इनके पूर्व पुरुष ऋषि थे जिन्होंने एकान्त स्थान पर बैठ कर प्रकृति और मनुष्य की प्रकृति का गहन चिंतन किया और एक श्रेष्ठ सभ्यता का निर्माण किया व नियम बनाये। ऋग्वेद ऋषियों और उनकी उपासना का ज्ञान देता है। यथा—

ऋग्वेद के मंडल-2 सूक्त-9 छ-1 में अग्निदेव को अदब्ध व्रत प्रमतिर्वशिष्ठः सहस्त्रम्भरः शुचिजिह्वो अग्निः( नियमों पर आरूढ़ ,आश्रय दाता,हजारों का भरण पोषण करने में समर्थ और सत्यवक्ता अग्नि) कहा गया है।

इसे भी देखें:-

ऋग्वैदिक अथवा पूर्व वैदिक काल में आर्यों का जीवन संचरण

विष्णु पुराण के अनुसार ब्रह्मा जी ने भृगु ,पुलस्त्य ,पुलह ,क्रतु ,अंगिरा ,मारीचि ,दक्ष ,अत्रि और वशिष्ट की उत्पत्ति की और इन ऋषियों से अनेक ऐतिहासिक सन्तानों की उत्पत्ति हुई। इन्होने भारत व उसके बाहर आर्यों के विस्तार का मार्ग प्रशस्त किया।

आर्यों का राज्य वंश हुए और इन्होंने सर्वत्र अपने राज्य का विस्तार किया। इनमें सूर्य वंश और चंद्र वंश प्रमुख हैं इन्हीं की सन्तानें सम्पूर्ण आर्यावर्त फिर भारत के अन्य भागों और अंत में सर्वत्र विस्तारित हुईं।

सूर्यवंशी राजाओं का राज्य विस्तार:-

महर्षि मरीचि से कश्यप ऋषि की उत्पत्ति हुई और कश्यप और उनकी पत्नी अदिति से विवस्वान की उत्पत्ति हुई विवस्वान और संज्ञा से वैवस्वत मनु की उत्पत्ति हुई।

मनु मानवों के पहले राजा हुए। मनु के पहले न कोई राज्य था ना कोई नियम मनु ने समाज के लिए नियम बनाये और उसे समाज में लागू किया। मनु के अनुयाई मानव कहलाये और मनु का वंश मानव वंश अथवा सूर्य (विवस्वान) वंश कहलाया।

महाराजा मनु और श्रद्धा के दस पुत्र इक्ष्वाकु ,नृग ,शर्याति ,दिष्ट ,धृष्ट ,करूष ,नरिष्यन्त ,पृषध्र ,नभग ,कवि और एक पुत्री इला हुई। मनु का एक अन्य पुत्र सुद्दुम्न का भी वर्णन है।

मनु पुत्र इक्ष्वाकु का वंश :-

महाराजा मनु के बड़े पुत्र इक्ष्वाकु हुए इनके कई पुत्र हुए परन्तु तीन मुख्य हुए विकुक्षि ,निमि ,दण्ड।

विकुक्षि :-

राजा विकुक्षि के पुत्र पुरंजय के पुत्र शाबस्त ने शाबस्तीपुरी का निर्माण किया जो आधुनिक श्राबस्ती (अयोध्या ) के पास था।

विकुक्षि के बारहवें वंश में सम्राट मान्धाता हुए जो एक महान राजा हुए उन्होंने अपने राज्य का बहुत विस्तार किया उन्होंने यदु के छठवें वंश में उत्पन्न शशिबिन्दु की पुत्री बिंदु मती से विवाह करके अपने प्रभाव का विस्तार किया। मान्धाता के तीन पुत्र पुरुकुत्स ,अम्बरीष और मुचुकुन्द हुए।

मान्धाता पुत्र पुरुकुत्स और उनके वंशज :-

पुरुकुत्स की पत्नी नर्मदा नाग जाति की कन्या थी। नाग जाति के लोग गन्धर्वों से बहुत परेशान थे और उन्होंने अपनी बहन नर्मदा को प्रेरित किया जिससे नर्मदा का कहने पर पुरुकुत्स वहाँ सेना लेकर गया और गन्धर्वो को पराजित करके नाग जाति की रक्षा की। सम्भवता इसी वजह से रेवा नदी का नाम नर्मदा पड़ा।

बाहु व सगर :-

इक्ष्वाकु वंशीय मान्धाता के पुत्र पुरुकुत्स की सत्रहवीं पीढ़ी में बाहु नामक राजा हुआ। बाहु हैहह ,तालजंघीय क्षत्रियों से पराजित होकर अपनी रानी के साथ वन में चला गया था तथा और्व ऋषि के आश्रम के समीप रहने लगा बाद में उसकी मृत्यु हो गयी उसके मरने के दौरान उसकी रानी गर्भवती थी इसी समय रानी की सौत ने उसे विष दे दिया लेकिन ऋषि के आशीर्वाद से बालक जीवित बच गया। विष अर्थात गर के साथ ही जन्म लेने के कारण उसका नाम सगर पड़ा। राजा सगर ने बड़े होकर हैहह व तालजंघीय राजाओं को दबाया व यवनों और म्लेक्षों को भी परास्त किया।

सगर का पुत्र असमंजस दुष्ट प्रकृति का था जबकि पोता अंशुमान धर्मपरायण। अंशुमान का पुत्र दिलीप और दिलीप का पुत्र भागीरथ हुआ। भगीरथ को गंगा को धरती पर लाने का श्रेय मिला और राजा भगीरथ के नाम पर गंगा का एक नाम भागीरथी भी पड़ा । भागवत महापुराण के अनुसार भगीरथ के अट्ठारहवें वंश में दशरथ राजा हुए। राजा दशरथ के चार पुत्र राम ,भरत ,लक्ष्मण ,शत्रुघ्न हुए

श्री राम और उनके भाई :-

राम एक आदर्श राजा और विष्णु के अवतार थे। राम के पुत्र कुश ने कुशावती नगरी बसायी जो आधुनिक कुशीनगर के पास थी। लव ने शरावती नगर बसाया।

भरत के पुत्र तक्ष ने तक्षशिला और पुष्कल ने पुष्कलावती नगर बसाया। तक्षशिला झेलम नदी के उत्तर में और पुष्कलावती पेशावर के आस पास थी।

शत्रुघ्न ने श्री राम के आदेश पर मधु के पुत्र लवण नामक दैत्य का वध किया और मधुरा (संभवतः मथुरा) नगरी की स्थापना की। यह नगरी शत्रुघ्न पुत्र शूरसेन के नाम पर शूरसेन भी कहलायी। अपने पुुत्र शत्रुघाती के लिए शत्रुघ्न ने विदिशा राष्ट्र बसाया।(स. वाल्मीकि रामायण उत्तर कांड)

लक्ष्मण के पुत्र अंगद ने अंगदीया नगरी बसाई जो आधुनिक बस्ती जिले के पास थी। चंद्रकेतु ने गोरखपुर में मल्ल राष्ट्र की स्थापना किया।

राम पुत्र कुश के वंशज वृहद्रल ने महाभारत युद्ध में भाग लिया था और उसे अभिमन्यु ने मारा था।

वृहद्रल की 29 वीं पीढ़ी में सुमित्र नामक राजा हुआ जो इक्ष्वाकु वंश का अंतिम राजा था।

इक्ष्वाकु पुत्र निमि :-

इक्ष्वाकु के पुत्र निमि के विदेह नामक पुत्र हुआ इसे मिथि भी कहा जाता है इसी के नाम पर मिथिला नगरी का नाम हुआ। निमि के 14 वें वंश में सीरध्वज राजा हुए इन्हे राजा जनक भी कहा जाता है इन्ही की पुत्री सीता का विवाह श्री राम से हुआ था। जनक वंशीय अंतिम राजा कृति था।

मनु पुत्र दिष्ट :-

उनके पुत्र दिष्ट के वंशज करन्धम एक दिग्विजयी राजा हुए। दिष्ट के 27 वें वंश में तृणबिन्दु राजा हुए और उनके पुत्र विशाल ने वैशाली नगरी (मुजफ्फरपुर ,दरभंगा के पास )की स्थापना किया।

मनु पुत्र शर्याति :-

आर्यों का राज्य गुजरात में भी फैला।

मनु के पुत्र शर्याति के पुत्र आनर्त के नाम पर उत्तरी गुजरात में आनर्त देश की स्थापना हुई उसकी राजधानी कुशस्थली (जहाँ द्वारिकापुरी है ) थी।

आनर्त के पुत्र रेवत के बाद वहाँ पुण्यजन नामक राक्षस जाति के लोगों ने आक्रमण किया और उनकी नगरी को नष्ट कर दिया। रेवत के भाई पराजित होकर विभिन्न स्थानों पर चले गए और क्षत्रियों के राज्य स्थापित किये।

मनु पुत्र धृष्ट :-

महाराजा मनु के पुत्र धृष्ट के वंशज धार्ष्टक क्षत्रिय हुए। उन्होंने पंजाब में अपना राज्य स्थापित किया। इन्हे उत्तरीय प्रांतों का रक्षक कहा गया।

मनु पुत्र करूष :-

उनके पुत्र करूष से कारुष क्षत्रिय हुए। इन्होने दक्षिण पश्चिम बिहार में अपना राज्य स्थापित किया।

मनु पुत्र नभग :-

महाराजा मनु पुत्र नभग के नाभाग उससे अंबरीश फिर विरुप उससे पृषदश्व तथा पृषदश्व से रतीरथ हुआ।

मनु पुत्र नरिष्यन्त :-

आर्यों का राज्य नरिष्यन्त के कारण मध्य एशिया की ओर विस्तृत हुआ ऐसा धर्म ग्रंथों से संकेत मिलता है।

मनु पुत्र नरिष्यन्त के चित्रसेन फिर ऋक्ष और फिर मीढ़वान हुए। नारिष्यन्त के कुछ वंशज पश्चिमोत्तर दर्रे से होकर मध्य एशिया गए और कुछ दक्षिण को चले गए।

सुद्दुम्न :-

मनु का एक अन्य पुत्र के बारे में जानकारी मिलती है उसका नाम सुद्दुम्न था। उसने पूर्वी भाग मुख्यतया बिहार के पास अपना राज्य स्थापित किया।

सुद्दुम्न के तीन पुत्र हुए उत्कल ,गय और विमल। उत्कल से उड़ीसा का प्रान्त और गय से गया का प्रान्त बसा।

चंद्रवंशी राजाओं का राज्य विस्तार :-

आर्यों का राज्य वंश में सूर्य वंश के बाद चंद्र वंश महत्वपूर्ण राजवंश था इसका विकास सूर्यवंश से भी अधिक हुआ।

महर्षि अत्रि और अनुसूया से चंद्र की उत्पत्ति हुई। चंद्र से बुध की उत्पत्ति हुई और बुध का विवाह मनु की पुत्री इला से हुआ।

बुध की पत्नी इला से पुरुरवा की उत्पत्ति हुई जो संसार में ऐल पुरुरवा के नाम से विख्यात हुए। पुरुरवा के कई पुत्र हुए जिसमें से उनके पुत्र आयु ने राहु की कन्या से विवाह किया।

पुरुरवा के पुत्र आयु के वंशज :-

आयु के नहुष ,क्षत्रवृद्धि ,रम्भ ,रजि ,अनेना ये पांच पुत्र हुए।

क्षत्रवृद्धि के सुहोत्र, सुहोत्र के काश्य ,काश और गृहतसमद नामक तीन पुत्र हुए।

काश्य के वंशज काश्यवंशीय कहलाये। काश्य का पुत्र काशीराज काशेय हुआ। काशेय से राष्ट्र फिर दीर्घतमा और फिर धन्वन्तरि हुए जो कि आयुर्वेद के प्रणेता थे। उन्होंने संपूर्ण आयुर्वेद को आठ भागों में विभक्त किया।

आयु का पुत्र रजि धर्म विरोधी था। रम्भ सन्तान हीन था।

नहुष का वंश :-

पुरुरवा के पुत्र आयु के पुत्र नहुष के वंश का बहुत विस्तार हुआ।

नहुष के पांच पुत्र कृति ,वियाति ,आयाति ,संयाति ,ययाति और यति हुए।

ययाति :-

ययाति भारत के सम्राट थे उनका राज्य बहुत विस्तृत था। ययाति की दो रानियाँ थीं देवयानी और शर्मिष्ठा।

राजा ययाति के देवयानी से यदु और दुर्वसु तथा शर्मिष्ठा से द्रुह्यु ,अनु व पुरु हुए।

ययाति पुत्र यदु का वंश :-

महाराजा ययाति पुत्र यदु के सहस्त्रजित ,क्रोष्टु ,नल और नहुष ये चार पुत्र हुए।

सहस्त्रजित :-

सहस्त्रजित का पुत्र शतजित हुआ उसके तीन पुत्रों में से एक का नाम हैहय हुआ। हैहय के पाँचवें वंश में महिष्मान नामक राजा हुआ इसी ने माहिष्मती पुरी(दक्षिणी मध्यप्रदेश ) का निर्माण किया।

महिष्मान के तीसरे वंश में धनक नामक राजा हुआ। धनक के चार पुत्रों में से एक कृतवीर्य हुआ। कृतवीर्य का पुत्र अर्जुन हुआ जिसे कार्तवीर्य व सहस्त्रबाहु भी कहा जाता है।

कार्तवीर्य अर्जुन बड़ा ही प्रतापी राजा हुआ। अर्जुन ने बड़े पैमाने पर दिग्विजय किया उसने दक्षिण के राजाओं को अपने अधीन किया और राक्षस जाति को दबा कर रखा। उस समय लंका का राजा रावण दिग्विजय के अभियान पर था और दिग्विजय के उद्देश्य से रावण ने नर्मदा नदी के किनारे माहिष्मती पुरी के पास डेरा डाला। कार्तवीर्य अर्जुन (सहस्त्रबाहु) को जब यह पता चला तो उसने रावण पर आक्रमण करके उसे बंदी बना लिया और बहुत समय बाद छोड़ा।

सहस्त्रबाहु अपने बल के घमंड में उद्दंड हो गया था और ऋषियों का अपमान करने लगा था इसलिए जमदग्नि पुत्र भगवान परशुराम ने उसका वध कर दिया। सहस्त्रबाहु के मरने के बाद राक्षस जातियाँ फिर से सक्रिय हो गयीं।

सहस्त्रबाहु अर्जुन के पांच मुख्य पुत्रों में से जयध्वज का पुत्र तालजंघ हुआ। तालजंघ की वजह से उसके वंशज तालजंघीय क्षत्रिय कहलाये। तालजंघ के कई पुत्र थे राजा सगर ने उनका वध किया था।

तालजंघ का पुत्र वीतिहोत्र था जिसके मधु और मधु के वृष्णि हुए। मधु के नाम पर ये माधव वंशीय और वृष्णि के नाम पर वृष्णिवंशीय कहलाये। ये सभी राजा यदु के वंशज थे इसलिए यादव कहलाये। (स. भागवत महापुराण )

यदु पुत्र क्रोष्टु :-

यदु के एक अन्य पुत्र क्रोष्टु थे। क्रोष्टु के पांचवें वंश में शशिबिन्दु राजा हुए। शशिबिन्दु के एक पुत्र पृथुश्रवा के पांचवें वंश में परावृत राजा हुए परावृत के पुत्र ज्यामघ के विदर्भ नामक एक पुत्र हुआ। विदर्भ के तीन पुत्र क्रथ ,कैशिक और रोमपाद हुए।

विदर्भ पुत्र क्रथ के वंशज सत्वत से सात्वत वंश चला। सत्वत के सात पुत्र थे भजन ,भजमान ,दिव्य ,अन्धक ,देववृद्ध ,महाभोज ,वृष्णि।

सत्वत के पुत्र वृष्णि के वंश में अक्रूर जी का जन्म हुआ था। सत्वत पुत्र महाभोज की सन्तानें भोजवंशी (मृत्तिकावरपुर निवासी ) कहलाये।

यदु पुत्र क्रोष्टु के वंशज सत्वत के पुत्र अन्धक के चार पुत्र हुए कुकर ,भजमान ,शुचिकम्बल और बर्हिष।

अन्धक पुत्र कुकर के आठवें वंश में आहुक नामक पुत्र हुआ ,उसके देवक और उग्रसेन दो पुत्र हुए। देवक की पुत्री देवकी का विवाह वसुदेव जी से हुआ।

उग्रसेन का पुत्र कंस हुआ।

अन्धक पुत्र भजमान के वंशज देवगर्भ हुए उनके शूरसेन नामक पुत्र हुआ उससे वसुदेव जी का जन्म हुआ। वसुदेव से भगवान श्री कृष्ण और बलराम हुए।

वसुदेव के पिता शूरसेन की कई पुत्रियाँ थीं उन्होंने निःसन्तान कुन्ति भोज को अपनी पृथा (कुन्ती )नामक पुत्री गोद दे दी थी।

यदु पुत्र क्रोष्टु के वंशज विदर्भ पुत्र रोमपाद के वंश में चेदि ने जन्म लिया और उनसे चैद्य राजा हुए ।चेदि के नाम पर चेदि राज्य का निर्माण हुआ।इसी में शिशुपाल हुआ जिसका वध भगवान श्री कृष्ण ने किया था।

सम्राट ययाति का पुत्र दुर्वसु का वंश मरुत पर समाप्त हो जाता है क्योंकि वह निः सन्तान था और उसने पुरु वंशीय दुष्यंत को अपना पुत्र स्वीकार कर लिया था।

ययाति पुत्र द्रुह्यु :-

आर्यों का राज्य अब आधुनिक पाकिस्तान तक विस्तृत हुआ।

ययाति के पुत्र द्रुह्यु के चौथे वंश में गांधार राजा हुआ उसने गांधार देश(पाकिस्तान और पूर्वी अफगानिस्तान ) की स्थापना किया। गांधार का वंशज प्रचेता हुआ ,इस प्रचेता के कई पुत्र हुए ये सभी उत्तर दिशा में म्लेक्षों के अधिपति बने।

ययाति पुत्र अनु :-

उनके पुत्र अनु के तीन पुत्र हुए इनमे सभानल के तीसरी पीढ़ी में पुरंजय नामक राजा हुआ जो एक प्रतापी राजा था। पुरंजय के वंशज महामना के दो पुत्र उशीनर और तितिक्षु हुए।

उशीनर के पुत्र शिवि के वृषादर्भ, सुवीर ,कैकय ,मद्रक नामक पुत्र हुए और इन्ही के नाम पर ये राज्य सुवीर (पाकिस्तान में सिंधु नदी के किनारे नवाब शाह ,बेंद के आसपास ),मद्र (स्यालकोट के दक्षिण ),कैकय (पंजाब) स्थापित हुए।

तितिक्षु का वंशज बलि हुआ। दीर्घतमा ऋषि के आशीर्वाद से बलि के बालि के छः पुत्र अंग ,बंग ,कलिंग ,सुह्य ,पुण्ड्र अन्ध्र हुए। इन्होंने अपने ही नाम पर ये राज्य स्थापित किये। जिनमे अंग (उत्तरी पूर्वी बिहार ),बंग (बंगाल ),कलिंग (उड़ीसा ),सुह्य (म्यांमार के पास ),पुण्ड्र (असम बंगाल ),अन्ध्र (आंध्र प्रदेश ) हैं।

आर्यों का राज्य बलि के पुत्रों ने पूर्वी भागों तक विस्तृत किया।

बलि के पुत्र अंग के चौथे वंशज चित्ररथ हुए जिनका दूसरा नाम रोमपाद था ये श्री राम के पिता दशरथ के मित्र थे। राजा दशरथ ने इन्हे संतानहीन जानकार अपनी शान्ता नाम की कन्या चित्ररथ को गोद दे दी थी। शांता का विवाह बाद में ऋष्य श्रृंग ऋषि से हुआ। चित्ररथ के वंश में चम्प नामक राजा हुए इन्होने चम्पा नगरी(भागलपुर ,मुंगेर ) बसायी। यही का राजा महाभारत काल का दुर्योधन का मित्र कर्ण हुआ।

ययाति पुत्र पुरु :-

पुरुरवा के वंशज ययाति के पुत्र पुरु के 21 वें वंश में अन्तिनार राजा हुआ जिसके वंशज दुष्यंत पुत्र भरत हुए

भरत शकुंतला के पुत्र और चक्रवर्ती सम्राट थे कहा जाता है कि उन्ही के नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा।

भरत के वंशज सुहोत्र का पुत्र हस्ति हुआ। हस्ति ने हस्तिनापुर नगरी(वर्तमान मेरठ के पास ) का निर्माण किया हस्ति के तीन पुत्र अजमीढ़ ,द्विमीढ़ व पुरुमीढ़ हुए।

पुरु के वंशज हस्ति के पुत्र अजमीढ़ और उसकी पत्नी नलिनी से नील की उत्पत्ति हुई। नील के वंशज हर्यश्व के पांच पुत्र हुए -सञ्जय, काम्पिल्य , वृहदिषु ,यवीनर और मुद्गल। हर्यश्व ने कहा था कि ये मेरे पांच पुत्र पाँच देशों पर शासन करने में समर्थ हैं , ये लोग सम्मिलित रूप से पांचाल कहलाये। मुद्गल का पुत्र दिवोदास हुआ और पुत्री अहिल्या हुई जिसका विवाह गौतम ऋषि से हुआ था। दिवोदास के वंश में राजा द्रुपद हुआ।

पुरु के वंशज हस्ति के पुत्र अजमीढ़ का एक अन्य पुत्र ऋक्ष हुआ जिसका पुत्र संवरण और संवरण का पुत्र कुरु हुआ जिसने धर्म क्षेत्र कुरुक्षेत्र का निर्माण किया।

कुरु के पुत्र सुधन्वा के वंश में वृहद्रथ हुआ और उसका पुत्र जरासंध हुआ।

कुरु के पुत्र जन्हु के वंश में प्रतीप राजा हुआ। प्रतीप के तीन पुत्र देवापि ,शांतनु और बाह्लीक हुए।

शान्तनु के गंगा से भीष्म जो कि ब्रह्मचारी थे और सत्यवती से विचित्रवीर्य और चित्रांगद हुए। विचित्रवीर्य से धृतराष्ट्र और पाण्डु हुए इन्हीं से कौरव और पाण्डव हुए। बाद में पाण्डव अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित को राज्य सौंपकर तप करने चले गए।

परीक्षित का पुत्र जन्मेजय हुआ उसकी चौथी पीढ़ी में निचक्नु राजा हुआ। बाढ़ के कारण जब हस्तिनापुर गंगा में बह गयी तो उसने कौशाम्बी को अपनी राजधानी बनाया। निचक्नु से होते हुए यह वंश शतानीक ,उदयन। …अंत में दंडपाणि उसके पुत्र निरमित्र तक जाता है।

निष्कर्ष:-

आर्यों का राज्य का विस्तार संपूर्ण भारतवर्ष और अंत में विश्व के अन्य भागों तक गया। आर्य राजाओं के कई पुत्रों का वर्णन नहीं मिलता उन्होंने भी अपने राज्य अवश्य स्थापित किये होंगे।

नोट :-आर्यों की वंशावली का वर्णन भागवत महापुराण और विष्णु पुराण में दिया गया है पर कहीं -कहीं अपवाद वश इक्का-दुक्का नामों में अंतर आ गया है।

इसे भी देखें:-

आर्यों की उत्पत्ति और विकास

आर्य वंश

2 thoughts on “आर्यों का राज्य विस्तार

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