अशोक के विभिन्न अभिलेख

अशोक का सारनाथ का लघु स्तंभ लेख

अशोक के विभिन्न अभिलेख हैं इनकी संख्या कई हैं।

सम्राट अशोक संपूर्ण विश्व के इतिहास के महानतम सम्राटों में गिना जाता है क्योंकि जिस नीति का उसने पालन किया वैसा विश्व के किसी भी शासक ने नहीं किया।

शासन के प्रारंभिक समय में सम्राट अशोक शिव का उपासक था बाद में धीरे-धीरे उसका झुकाव बौद्ध धर्म की ओर होने लगा और कलिंग युद्ध के पश्चात भयानक नरसंहार और लोगों के विस्थापन को देखकर उसका ह्रदय द्रवित हो गया।

सम्राट अशोक ने उपगुप्त नामक बौद्ध भिक्षु से बौद्ध धर्म की दीक्षा लिया।

कुछ विद्वानों के अनुसार सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म नहीं स्वीकार किया था वरन उसका धर्म मानव धर्म था सर्वत्र उसने मानवता की सेवा ,माता -पिता की आज्ञा का पालन, जीवो पर दया की बात की है परंतु आधुनिक समय में उसके शिला लेखों से यह ज्ञात होता है कि वह बौद्ध हो गया था । भाब्रू शिलालेख में बुद्ध, संघ और धम्म को उसने प्रणाम किया है तथा गिरनार के शिलालेख में लुंबिनी वन की यात्रा का उल्लेख किया है।

कलिंग युद्ध के पश्चात अशोक ने भेरी घोष(युद्ध के नगाड़ों का घोष ) के स्थान पर धम्म घोष (धर्म की विजय) का रास्ता अपनाया और अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए विभिन्न कार्य किए जिममें से धार्मिक यात्राओं पर बाहर भेजना ,लोक कल्याणकारी कार्यों को करना, लोक कल्याण की बातें लिपिबद्ध करना था।

अशोक के विभिन्न अभिलेख निर्माण की परम्परा यहाँ से शुरू हुई।

सम्राट अशोक ने अपने उपदेशों को जिनका पालन वह स्वयं करता था और  समाज के लिए कल्याणकारी मानता था उन बातों को शिलाओं और स्तंभों पर लिपिबद्ध करा दिया।उन्हें साम्राज्य के विभिन्न भागों में स्थापित कराया जिससे जनता उसको देखें उसे समझे और उनका अनुसरण करें और भविष्य में उसके ना रहने पर भी लोग उन बातों और उपदेशों से लाभान्वित होते रहे।

अशोक के विभिन्न अभिलेख में ब्राम्ही ,खरोष्ठी ,ग्रीक और अरामाइक लिपि का प्रयोग हुआ है। ग्रीक और अरामाइक लिपि के अभिलेख अफगानिस्तान से खरोष्ठी लिपि के अभिलेख उत्तर पश्चिम पाकिस्तान से और अन्य उसके अभिलेख ब्राह्मी लिपि में हैं जो भारत के अन्य भागों से प्राप्त हुए हैं।

उसके शिलालेख की खोज सर्वप्रथम पाद्रेटी फैंथलार ने सन् 1750 ईस्वी में की थी । इस पढ़ने में सबसे पहले सफलता जेम्स प्रिंसेप को 1837 में हुई थी। ये ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपि को अनुवाद करने में सफल हुए थे।

अशोक के विभिन्न अभिलेख में उसे देवानाम प्रिय प्रियदर्शी कहा गया है।

अशोक के विभिन्न अभिलेख को 6 भागों में विभाजित किया जा सकता है-

शिलालेख , लघुशिलालेख , स्तंभलेख , लघुस्तंभलेख गुहा लेख , अन्य लेख।

शिलालेख:-

अशोक के विभिन्न अभिलेख में 14 शिलालेख अति महत्वपूर्ण हैं जो निम्न स्थानों पर पाए गए हैं –

इनकी संख्या 14 है। अशोक के सभी 14 शिलालेख गिरनार (गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र), कालसी (उत्तर प्रदेश में देहरादून के निकट), मानसेहरा,शाहबाजगढ़ी(पाकिस्तान) और एर्रागुड्डी (आंध्र प्रदेश में कुरनूल के निकट), सन्नथी (कर्नाटक) इसके अलावा महाराष्ट्र के सोपारा में तथा उड़ीसा में धौली और जौगढ़ में स्थित हैं।

प्रथम शिलालेख(पशु वध निषिद्ध किया):-

यह धर्मलेख देवताओं के प्रिय प्रियदर्शी राजा ने लिखवाया है । यहां कोई जीव मारकर होम ना किया जाए और सामाजिक कार्य न किया जाए क्योंकि देवताओं के प्रिय प्रियदर्शी राजा समाज में बहुत से दोष देखते हैं परंतु एक प्रकार के ऐसे समाज हैं जिन्हें देवताओं के प्रिय प्रियदर्शी राजा अच्छा समझते हैं ।पहले देवताओं के प्रियदर्शी राजा की पाकशाला में प्रतिदिन कई हजार जीव सूप बनाने के लिए मारे जाते थे पर अब जब यह धर्म लेख लिखा जा रहा है केवल तीन ही जीव प्रति दिन मारे जाते हैं- दो मोर और एक मृग पर मृग का मारा जाना निश्चित नहीं है यह 3 प्राणी भी भविष्य में नहीं मारे जाएंगे।

द्वितीय शिलालेख(विभिन्न देशों में मनुष्य व पशु चिकित्सा का प्रबंध):-

देवा नाम प्रिय प्रियदर्शी राजा चाहते हैं सब जगह और जो समीपवर्ती राज्य हैं चोल ,पांड्य, सतिय पुत्र ,केरल पुत्र और ताम्र पर्णी(श्रीलंका) और अंतियोक(एण्टियोकस ) नामक यवनराज और जो उस अंतियोक के पड़ोसी राजा हैं उन सब के देशों में देवानाम प्रिय प्रियदर्शी राजा ने दो प्रकार के चिकित्सा का प्रबंध किया है एक मनुष्य की चिकित्सा और दूसरा पशुओं की चिकित्सा । औषधियां भी मनुष्य और पशुओं के लिए जहां-जहां नहीं थी वहां-वहां से लाई और रोपी गई हैं इस तरह मूल और फल भी जहां-जहां नहीं थे वहां-वहां सब जगह से लाए और रोपे गए हैं । मार्गों में पशुओं और मनुष्यों के आराम के लिए कुएं खुदवाए गए हैं और वृक्ष लगाए गए हैं।

तृतीय शिलालेख(धर्म कार्य हेतु अधिकारियों की नियुक्ति ):-

देवा नाम प्रिय प्रियदर्शी राजा का कहना है कि- राज्याभिषेक के 12 वर्ष पश्चात मैंने यह आज्ञा दी थी कि मेरे राज में सब जगह युक्त ,रज्जुक और प्रादेशिक राज कर्मचारी पांच वर्ष तक इसी काम के लिए  तथा और कामों के लिए धर्म प्रचार करते हुए दौरा करें कि माता-पिता की सेवा करना अच्छा है मित्र, परिचित, बंधुओं तथा ब्राह्मण और श्रमण को दान देना अच्छा है । जीव हिंसा ना करना अच्छा है थोड़ा व्यय करना और थोड़ा संचय करना अच्छा है परिषद भी युक्त नामक कर्मचारियों को आज्ञा देगी कि वे नियमों का पूरी तरह पालन करें।

चतुर्थ शिलालेख(भेरी घोष को धम्म घोष में बदलना) :-

अतीत काल में कई सौ वर्षों से प्राणियों का वध, जीवो की हिंसा ,बंधुओं का अनादर तथा श्रमणों और ब्राह्मणों का अनादर बढ़ता ही गया पर देवताओं के प्रिय प्रियदर्शी राजा के धर्म आचरण से भेेरी घोष अब धम्मघोष में बदल गया है।…… जो शीलवान नहीं है वह धर्म का आचरण भी नहीं कर सकता इसलिए इसकी वृद्धि करना तथा इसको हानि ना होने देना अच्छा है ।……..राज्य अभिषेक के 12 वर्ष बाद देवताओं के प्रियदर्शी राजा ने यह लिखवाया।

पंचम शिलालेख(धर्म महामात्य नामक नवीन पद का सृजन) :-

देवताओं के प्रिय प्रियदर्शी राजा का कहना है अच्छा काम करना कठिन है जो अच्छा काम करने में लग जाता है वह कठिन काम करता है पर मैंने बहुत से अच्छे काम किए हैं इसलिए यदि मेरे पुत्र ,नाती ,पोते और उसके बाद जो संताने होंगे वे सब कल्प के अंत तक वैसा अनुसरण करेंगे तो पुण्य करेंगे किंतु जो इस कर्तव्य का थोड़ा सा भी त्याग करेगा वह पाप करेगा क्योंकि पाप करना आसान है पूर्व काल में धर्म महा मात्र नामक कर्मचारी नहीं होते थे पर मैंने अपने राज्याभिषेक के 13 वर्ष बाद धर्म महापात्र नियुक्त किए यह धर्म महामात्र सब संप्रदायों के बीच धर्म में रत लोगों के तथा यवन ,कंबोज ,गांधार ,राष्ट्रीक, पीतिनिक और पश्चिमी सीमा पर रहने वाली जातियों में धर्म की स्थापना धर्म की वृद्धि तथा लोगों के हित और सुख के लिए नियुक्त हैं…………..

षष्ठम शिलालेख(लेख लिखवाने की आवश्यकता बताना ):-

देवताओं के प्रिय प्रियदर्शी राजा का कहना है अतीत काल में पहले बराबर हर समय राज्य का काम नहीं होता था और ना हर समय प्रतिनिधियों से समाचार सुना जाता था मैंने यह प्रबन्ध किया है हर समय चाहे मैं खाता हूं अथवा अन्तःपुर में रहूं या गर्भ गृह(शयन कक्ष ) में रहूं या टहलका रहूं या सवारी पर हूं या कुछ कर रहा हूं सभी जगह किसी भी समय पर प्रतिवेदक प्रजा का हाल मुझे सुनाएं मैं प्रजा का काम सभी जगह करता हूं………क्योंकि मैं कितना ही परिश्रम करूं और कितना ही राज कार्य करूंगा मुझे संतोष नहीं होता सब लोगों का हित करना मैं अपना प्रधान कर्तव्य समझता हूं पर सभी लोगों का हित करने से बढ़कर और कोई कार्य नहीं है। जो कुछ मैं पराक्रम करता हूं वह इसलिए कि प्राणियों के प्रति जो मेरा ऋण है उससे मैं उऋण हो जाऊं और इस लोक में लोगों को सुखी करूं तथा परलोक में उन्हें स्वर्ग का लाभ कराऊ । यह धर्म लेख इसलिए लिखवाया गया है कि यह चिर स्थाई रहे और मेरे पुत्र,पोते तथा पर पोते लोगों के हित के लिए पराक्रम करें,पर बहुत अधिक पराक्रम के बिना यह कार्य कठिन है।

सप्तम शिलालेख गिरनार(दान से अधिक संयम का महत्व) :-

देवानाम पियो पियदसि राजा सर्वत इच्छति सवे पासंडा वसेयू ।सवे ते समयम च, भावसुधिं च इछति।  जनों तु उचावच छंदों उचावाच रागो। ते सर्व च कासंती एक देशम च कासंति।विपुले तु पि दाने यस नास्ति समये भावसुधिता च कतानाता व द ढ भतीता च निचा बाढ़्म।

देवा नाम प्रिय प्रियदर्शी राजा इच्छा करते हैं कि सभी धार्मिक संप्रदाय सर्वत्र बसें वे सभी संयम और भाव शुद्धि चाहते हैं परंतु जनसाधारण ऊंची नीची कामना वाले और ऊंच-नीच भावना वाले होते हैं वे या तो संपूर्ण की कामना करते हैं अथवा एक अंश की जो बहुत दान नहीं कर सकता उसका भी संयम ,भाव, कृतज्ञता ,दृढ़भक्ति नित्य बढ़नी चाहिए।

अष्टम शिलालेख(आमोद प्रमोद के स्थान पर धर्म यात्रा) :-

अतीत काल में राजा लोग विहार यात्रा के लिए निकलते थे । इन यात्राओं में मृगया(शिकार) और इसी तरह के दूसरे आमोद होते थे परंतु देवताओं के प्रिय प्रियदर्शी राजा के राज्याभिषेक के 10 वर्ष पश्चात जबसे संबोधि का अनुसरण किया तब से इन धर्म यात्राओं का प्रारंभ हुआ।…..

नवम शिलालेख(व्यर्थ मंगलाचार के स्थान पर धर्म कार्य करना) :-

देवताओं के प्रिय प्रियदर्शी राजा का कहना है लोग विपत्ति में ,पुत्र तथा कन्या के विवाह में ,पुत्र के जन्म में ,परदेश जाते समय और इसी तरह के दूसरे अवसरों पर अनेक प्रकार के बहुत से ऊंचे और नीचे मंगला चार करते हैं। ऐसे अवसरों पर स्त्रियां अनेक प्रकार के तुच्छ और निरर्थक मंगलाचार करती हैं। मंगलाचार करना ही चाहिए परंतु इस प्रकार के मंगलाचार अल्प फल देने वाले होते हैं परंतु धर्म का जो मंगलाचार हैं वह महा फल देने वाला है । इस धर्म के मंगलाचार में दास और सेवकों के प्रति उचित व्यवहार , गुरुओं का आदर , प्राणियों के प्रति अहिंसा और ब्राह्मणों तथा श्रमणों को दान तथा इसी प्रकार के दूसरे मंगल कार्य होते हैं , पिता, पुत्र ,भाई या स्वामी को कहना चाहिए यह मंगलाचार अच्छा है इसे तब तक करना चाहिए जब तक अभीष्ट कार्य सिद्ध ना हो जाए।…. .. 

दशम शिलालेख(प्रजा कल्याण का पुण्य) :-

देवानाम प्रिय प्रियदर्शी राजा यश या कीर्ति को बड़ी वस्तु नहीं समझते जो कुछ भी यश या कीर्ति वह चाहते हैं वो इसलिए कि वर्तमान में और भविष्य में मेरी प्रजा धर्म की सेवा करने और धर्म के व्रत का पालन करने में उत्साहित हो बस केवल इसलिए देवताओं के प्रिय प्रियदर्शी राजा यश और कीर्ति चाहते हैं । देवताओं के प्रिय प्रियदर्शी राजा जो भी पराक्रम करते हैं वह सब परलोक के लिए करते हैं जिससे कि सब लोग दोष से रहित हो जाए। जो अपुण्य है वही दोष है सबकुछ त्यागकर बड़ा पराक्रम किए बिना कोई भी मनुष्य चाहे छोटा हो या बड़ा इस कार्य को नहीं कर सकता बड़े आदमी के लिए तो यह और भी कठिन है।

ग्यारहवां शिलालेख(धर्म से बढ़कर कुछ नहीं) :-

देवताओं की प्रिय प्रियदर्शी राजा का कहना है ऐसा कोई दान नहीं जैसा कि धर्म का दान, ऐसी कोई मित्रता नहीं जैसे कि धर्म के द्वारा मित्रता ,कोई ऐसा बंटवारा नहीं जैसा कि धर्म का बंटवारा, कोई ऐसा संबंध नहीं है जैसा कि धर्म का संबंध । धर्म में यह होता है कि दास और सेवक के साथ उचित व्यवहार किया जाए ,माता-पिता की सेवा की जाए मित्र ,परिचित, स्वजातियों और पड़ोसियों को भी यह कहना चाहिए यह अच्छा कार्य है इसे करना चाहिए जो ऐसा करता है वह इस लोक को सिद्ध करता है और परलोक में भी उसी धर्मदान से अनंत पुण्य का भागी होता है।

बारहवां शिलालेख(प्रत्येक संप्रदाय का सम्मान , धर्म महामात्य, स्त्री महामात्य की नियुक्ति) :-

देवानाम प्रिय प्रियदर्शी राजा सभी संप्रदायों , प्रव्रजित और गृहस्थ की पूजा करते हैं, दान से और विविध प्रकार के सम्मान से उनकी पूजा करते हैं। किंतु दान अथवा पूजा को देवानाम प्रिय उतना महत्व नहीं देते जितना कि इस बात को कि सभी संप्रदायों में सार वृद्धि हो । सार वृद्धि तो बहुत प्रकार की होती है ।उसका यह मूल है जैसे वचन या संयम अर्थात अपने संप्रदाय की प्रशंसा और दूसरे संप्रदाय की निंदा अनवसरों पर नहीं होनी चाहिए ,अवसरों पर स्वल्प होनी चाहिए। प्रत्येक अवसर पर किसी दूसरे संप्रदाय का सम्मान प्रत्येक दशा में होना चाहिए । यदि कोई ऐसा करता है तो वह अपने संप्रदाय की वृद्धि करता है तथा दूसरे संप्रदायों का उपकार इसके विरुद्ध करता हुआ वह अपने संप्रदाय को छिन्न करता है और दूसरे संप्रदाय का अपकार । जो कोई अपने संप्रदाय की प्रशंसा करता है और दूसरे संप्रदाय की निंदा 
वह सब अपने संप्रदाय की भक्ति के कारण कि किस प्रकार उसका प्रकाश हो किंतु ऐसा करते हुए अपने संप्रदाय की अत्यंत हानि करता है। इसलिए समवाय ही साधु है ।
कैसे ? एक दूसरे के धर्म को सुनें और पालन करें । यही देवानाम प्रिय की इच्छा है कि सभी संप्रदाय बहुश्रुत और कल्याणमार्गी हों।जो अपने संप्रदाय में ही अनुरक्त हैं उनसे कहें देवानाम प्रिय प्रियदर्शी राजा दान को इतना महत्व नहीं देते जितना संप्रदायों में सार वृद्धि हो।इस हेतु धर्म महामात्र, स्त्री महामात्र, व्रजभूमिक नामक अधिकारी नियुक्त हैं।

तेरहवां शिलालेख-कुछ अंश(कलिंग युद्ध, युद्ध की अनावश्यकता) :- 

……कलिंग ……एक लाख लोग मारे गए और इससे कई गुना महामारी आदि रोगों से मरे ।उसके बाद अब जबकि कलिंग देश मिल गया है धर्म का तीव्र अध्ययन…… देवताओं के प्रिय को ……लोगों की हत्या, मृत्यु और देश निष्कासन होता है। देवताओं के प्रिय को बहुत दुख और खेद हुआ।….. ब्राह्मण ,श्रमण तथा अन्य ……..माता पिता की सेवा, गुरुजनों की सेवा, मित्र, परिचित, सहायक, जाती, दास ………..परिजनों से वियोग जिनके सहायक और संबंधी विपत्ति में पड़ जाते हैं उन्हें भी इस कारण पीड़ा होती है यह विपत्ति सबके हिस्से में पडती है ।………….यवनों के सिवा जो वर्ग….. जहां मनुष्य एक ना एक संप्रदाय को  मानते हैं …..उस समय जितने आदमी…….   हजारवें हिस्से का नाश भी देवताओं के प्रिय के दुख का कारण होगा।….

चौदहवां शिलालेख(लेख लिखवाने की आवश्यकता) :-

यह धर्मलेख देवताओं के प्रिय प्रियदर्शी राजा ने लिखवाया है । यह लेख कहीं संक्षेप में, कहीं मध्यम रूप में और कहीं विस्तृत रूप में है क्योंकि सभी जगह के लिए सभी बात लागू नहीं होती । मेरा राज बहुत विस्तृत है इसलिए बहुत से लेख लिखवाए गए हैं और बहुत से लगातार लिखवाये जाएंगे । कहीं-कहीं विषय की रोचकता के कारण एक ही बात बार-बार कही गई है जिससे कि लोग उसका आचरण करें।इन लेखों में जो कुछ अपूर्ण लिखा गया हो उसका कारण देश भेद, संक्षिप्त लेख या लिखने वाले की गलती समझनी चाहिए।

स्तंभ लेख:-

अशोक के विभिन्न अभिलेख में स्तम्भ लेख महत्वपूर्ण हैं जो निम्न स्थानों पर पाए गए हैं –

दिल्ली टोपरा (फिरोजशाह तुगलक द्वारा टोपरा से दिल्ली लाया गया), दिल्ली मेरठ(फिरोजशाह तुगलक द्वारा दिल्ली लाया गया) ,लौरिया नंदनगढ़(चंपारण बिहार में स्थित है), लोरिया अरेराज(बिहार चंपारण) ,रामपुरवा(चंपारण बिहार में है इसकी खोज कार लायल ने 1872 ईस्वी में की थी)। उदाहरण स्वरूप-

प्रथम स्तंभ लेख(धर्मानुसार पालन):-

देवा नाम प्रिय प्रियदर्शी राजा कहते हैं राज्याभिषेक के 26 वर्ष बाद मैंने यह धर्म लेख लिखवाया अत्यंत धर्म अनुराग के बिना विशेष आत्म परीक्षा के बिना ,बड़ी सेवा के बिना , पाप से बड़े भय के बिना और महान उत्साह के बिना इस लोक में और परलोक में सुख दुर्लभ है पर मेरी शिक्षा से लोगों का धर्म के प्रति आदर और अनुराग दिन पर दिन बढा है तथा आगे और भी बढ़ेगा मेरे पुरुष चाहे वे ऊंचे पद पर हों या नीचे पद पर अथवा मध्यम पद पर मेरे शिक्षा के अनुसार कार्य करते हैं और ऐसा उपाय करते हैं कि चंचल बुद्धि वाले लोग भी धर्म का आचरण करने के लिए प्रेरित हो । इसी तरह अंत महामात्र भी आचरण करते हैं धर्म के अनुसार पालन करना धर्म के अनुसार काम करना धर्म के अनुसार सुख देना और धर्म के अनुसार रक्षा करना यही विधि है।

द्वितीय स्तंभ लेख(दया,दान,सत्य का पालन):-

देवताओं के प्रिय प्रियदर्शी राजा का कहना है धर्म करना अच्छा है पर धर्म क्या है धर्म यही है कि पाप से दूर रहें बहुत से अच्छे काम करें दया, दान, सत्य और शौच(पवित्रता) का पालन करें मैंने कई प्रकार से चक्षु (आध्यात्मिक दृष्टि)का दान लोगों को दिया है । दोपायों, चौपायों ,पक्षियों और जलचर जीवों पर भी मैंने अनेक कृपा की है ।मैंने उन्हें प्राण दान भी दिया है और भी बहुत से कल्याण के काम मैने किए हैं यह लेख मैने इसलिए लिखवाया है कि लोग इसके अनुसार आचरण करें और यह चिरस्थाई रहे जो इसके अनुसार कार्य करेगा,वह पुण्य का काम करेगा।

तृतीय स्तंभ लेख(आत्म परीक्षण):-

देवानाम प्रिय प्रियदर्शी राजा ऐसा कहते हैं मनुष्य अपने अच्छे काम को देखता है और मन में कहता है मैंने अच्छा काम किया है पर वह अपने बुरे काम को नहीं देखता और मन में नहीं कहता यह पाप मैंने किया है ।इस प्रकार की आत्म परीक्षा बड़ी कठिन है तथा मनुष्य को यह देखना चाहिए कि क्रूरता, निष्ठुरता ,क्रोध, मान, ईर्ष्या सब पाप के कारण और इनके कारण मनुष्य अपना नाश ना होने दें इस बात की ओर विशेष रुप से ध्यान देना चाहिए इस मार्ग से मुझे इस लोक में सुख मिलेगा और इससे मेरा परलोक भी बनेगा।

चतुर्थ स्तंभ लेख(रज्जुक कर्मचारियों की नियुक्ति):-

देवा नाम प्रिय प्रियदर्शी राजा ऐसा कहते हैं राज्य अभिषेक के 26 वर्ष बाद मैंने यह धर्म लेख लिखवाया है मेरे रज्जुक नाम के कर्मचारी लाखों मनुष्यों के ऊपर नियुक्त हैं पुरस्कार तथा दंड देने का अधिकार मैंने उनके अधीन कर दिया है…….. जिस प्रकार कोई मनुष्य अपने बच्चों को निपुण धायों के हाथ सौंप कर निश्चिंत हो जाता है और सोचता है कि यह धाय मेरे बच्चे को सुख पहुंचाने की भरपूर चेष्टा करेगी उसी प्रकार लोगों के हित और सुख पहुंचाने के लिए मैंने रज्जुक नामक कर्मचारी नियुक्ति किए हैं………… मैं चाहता हूं कि व्यवहार में तथा दंड देने में पक्षपात ना हो इसलिए आज से मेरी आज्ञा है कि कारागार में पड़े हुए जिन मनुष्यों को मृत्युदंड निश्चित हो चुका है उन्हें 3 दिन की मोहलत दी जाए ।उनके जाति कुटुंब वाले उनकी ओर से उनके जीवन दान के लिए प्रार्थना करेंगे अंत काल तक ध्यान करते हुए परलोक के लिए दान देंगे या उपवास करेंगे।

पंचम स्तंभ लेख(पशु वध निषिद्ध):-

देवानाम प्रिय प्रियदर्शी राजा का कहना है राज्य अभिषेक के 26 वर्ष बाद मैंने निम्नलिखित प्राणियों का वध करना वर्जित कर दिया है सुग्गा, मैना, अरुण, चकोर, हंस, नांदिमुख, गेलाट, जतुका (चमगादड़) अंबाकपीलीका(दीमक), दुड़ी(कछुवी), बिना हड्डी की मछली ,वेदवेयक ,गंगापुटूक, संकुजमत्स्य,कछुआ, साही, पर्णशश(गिलहरी) ,  स्टमर(बारहसिंगा), सांड,ओकपिंड, पलसत (गैंडा),श्वेत कबूतर ,गांव के कबूतर तथा सब तरह के चौपाये जो ना तो किसी प्रकार के उपयोग में आते हैं ना खाए जाते हैं। दूध पिलाते हुए बकरी , भेंडी, सुअर तथा उनके बच्चों को जो 6 महीने के हों,नहीं मारना चाहिए ।

षष्ठम स्तंभ लेख(लेख की आवश्यकता):-

देवताओं के प्रिय प्रियदर्शी राजा का कहना है राज्याभिषेक के 12 वर्ष बाद मैंने यह धर्म लेख लोगों के सुख और हित के लिए लिखवाए जिससे कि वे पाप मार्गो को त्याग कर भिन्न भिन्न प्रकार से धर्म की वृद्धि करें।

सप्तम स्तंभ लेख(धर्म वृद्धि):-

देवानाम प्रिय प्रियदर्शी राजा ऐसा कहते हैं कि प्राचीन काल में भी राजा लोग यह सोचते थे कि मनुष्य में धर्म कैसे बढ़े परंतु धर्म की वृद्धि नहीं हो सकी इस पर देवताओं के प्रिय प्रियदर्शी राजा का कहना है मेरे मन में विचार आया लोगों को धर्म के अनुकूल कैसे बनाया जाए मैं किस प्रकार उनमें धार्मिक वृद्धि का उत्थान कर सकता हूं इस पर प्रियदर्शी का कहना है कि मेरे मन में विचार आया कि मैं धर्म का आदेश कराऊं तथा लोगों को धर्म संबंधी शिक्षा की आज्ञा दूं जिससे मनुष्य उसका पालन करेंगे।……..

लघु स्तंभ लेख(कुछ का परिचय) :-

अशोक के विभिन्न अभिलेख में लघु स्तम्भ लेख निम्न स्थानों पर पाए गए हैं –

रुक्मिनदेयी, निग्लिहवा( नेपाल) सारनाथ, कौशांबी (उत्तर प्रदेश), सांची (मध्य प्रदेश) और इलाहाबाद से प्राप्त रानी का स्तंभलेख।

सारनाथ का लघु स्तंभ लेख(संघ में फूट को रोकना):-

यह लेख सारनाथ में नियुक्त महामात्यों को संबोधित किया गया है-देवताओं के प्रिय……………. पाटलिपुत्र में ……. कोई संघ में फूट ना डाले। जो कोई चाहे वह भिक्षु हो या भिक्षुणी संघ में फूट डालेगा उसको श्वेत वस्त्र पहना कर उस स्थान में रखा जाएगा जो भिक्षु और भिक्षुणियों के योग्य नहीं है ।इस प्रकार मेरी यह आज्ञा भिक्षु संघ और भिक्षुणी संघ को बता दी जाए देवताओं के प्रिय ऐसा कहते हैं – इस प्रकार का एक लेख आप लोगों के पास आप के कार्यालय में रहे और ऐसा ही एक लेख आप लोग उपासको के पास रखें। उपासक लोग हर उपवास के दिन इस आज्ञा पर अपना विश्वास दृढ़ करने के लिए आएं। निश्चित रूप से हर उपवास के दिन प्रत्येक महामात्र इस आज्ञा पर अपना विश्वास जताने तथा इसका प्रचार करने के लिए उपवास में सम्मिलित हो जहां पर आप लोगों का अधिकार हो वहां वहां आप सर्वत्र इस आज्ञा के अनुसार प्रचार करें इसी प्रकार आप लोग सब कोर्टों और विषयों में भी अधिकारियों को इस आज्ञा के अनुसार प्रचार करने के लिए भेजें।

रुक्मिन देयी का लघु स्तंभ लेख(लुंबिनी ग्राम की यात्रा):-

ब्राह्मी लिपि में लिखा लेख

देवान पियेन पियदसिन लाजिन वीसतिवसाभिसीतेनअतन आगाच महीयते हिंद बुधे जाते सक्यमुनीतिसिविगभीचा कलापित सिलायमे च उसपापितेहिंद भगवं जातेति लुम्मिनिगामे उबलिके कटअठभगिए च।

देवताओं के प्रिय प्रियदर्शी राजा ने राज्याभिषेक के २० वें वर्ष बाद स्वयं आकर इस स्थान की पूजा की क्योंकि यहां शाक्यमुनि बुद्ध का जन्म हुआ था यहां पत्थर की एक प्राचीर बनवाई गई और पत्थर का एक स्तम्भ खड़ा किया गया। बुद्ध भगवान यहां जन्मे थे इसलिए लुंबिनी ग्राम को कर से मुक्त कर दिया गया और पैदावार का आठवां भाग भी जो राजा का हक था उसी ग्राम को दे दिया गया।

लघु शिलालेख(कुछ का परिचय) :-

अशोक के विभिन्न अभिलेख में लघु शिलालेख निम्न स्थानों पर पाए गए हैं –

सासाराम (बिहार ) रूपनाथ , गुर्जरा(मध्य प्रदेश), भाब्रू (राजस्थान ), ब्रम्हगिरी ,सिद्धपुर , जटिंग रामेश्वर गोवि मठ ,पालकी मुंडू (कर्नाटक )राजुल मंडगिरी , मास्की, एर्रा गुड्डी (आंध्र प्रदेश ),अहरौरा (उत्तर प्रदेश )   अमर पुरी (नई दिल्ली)आदि हैं।

मास्की का लघु शिलालेख(धर्म विस्तार):-

देवताओं के प्रिय अशोक की ओर से ऐसा कहना है ढाई वर्ष से अधिक हुये है जब मैं साक्य हुआ एक वर्ष से अधिक हुये जब से मैं संघ में आया हूं। पूरी तरह उद्योग  किया है। जंबूद्धीप में जो देवता पहले मनुष्य के साथ नहीं मिलते जुलते थे वे अब मनुष्यों से मिलजुल गए हैं छोटे लोग भी धर्म का पालन करें तो इस उद्देश्य को प्राप्त कर सकते हैं यह नहीं समझना चाहिए कि केवल बड़े लोग ही कर सकते हैं । छोटे लोग और बड़े लोग सभी से यह कहना चाहिए कि यदि आप इस तरह करेंगे तो यह कल्याणकारी होगा और चिरस्थाई रहेगा तथा इसका विस्तार होगा, कम से कम डेढ़ गुना विस्तार होगा।

ब्रह्मगिरी का लघु शिलालेख(माता – पिता,गुरु का आदर):-

ब्रह्मगिरी का ब्राह्मी लिपि में लिखा अशोक का अभिलेख
ब्राम्ही लिपि में लिखा ब्रह्मगिरि का लघु स्तम्भ लेख

सोनगिरी से आर्यपुत्र और महामात्रों की ओर से इसिला के महामात्रों को आरोग्य की शुभकामना कहना और यह सूचित करना कि देवताओं के प्रिय आज्ञा देते हैं कि ढाई वर्षों से अधिक हुए कि मैं उपासक हुआ परंतु एक वर्ष तक मैंने उद्योग नहीं किया । अब एक वर्ष से अधिक हुआ जब से मैं संघ में आया हूं तब से मैंने खूब उद्योग किया है।जंबूद्धीप (भारत) में जो देवता अबतक मनुष्यों के साथ नहीं मिलते जुलते थे अब वे मनुष्यों से मिलजुल गए हैं । यह उद्योग का फल है……….यह अनुशासन मैंने उस समय प्रसारित किया जब मैं प्रवास में था और प्रवास के 256 दिन हो चुके थे……..माता पिता की सेवा करनी चाहिए इसी प्रकार गुरु की भी सेवा करनी चाहिए प्राणियों के गुणों को आचरण में लाना चाहिए। इसी प्रकार शिष्य को आचार्य का आदर करना चाहिए और अपने जाति भाइयों के प्रति उचित बर्ताव करना चाहिए…… चपड़ नामक लिपिकार ने यह लिखा।

भाब्रू का लघु शिलालेख(बुद्ध,धम्म और संघ में श्रद्धा):-

मगध के राजा प्रियदर्शी संघ को अभिवादन पूर्वक कहते हैं और आशा करते हैं कि वे विघ्न रहित और सुख पूर्वक होंगे । हे भदंत गण आपको विदित है कि बुद्ध, धम्म और संघ में हमारी कितनी भक्ति और श्रद्धा है । हे भदंत गण जो कुछ भगवान बुद्ध ने कहा है सो सब अच्छा है परंतु भदंत गण जिसको मैं समझता हूं कि इससे सद् धर्म स्थाई रहेगा उसको अवश्य पढ़ें जानने योग्य धर्म ग्रंथों के नाम यहां पर लिखता हूं। विनय समुकस (विनय का महत्व), अलिय वसाणी (आर्य वंश) , अनागत भयानी (आने वाला भय),मुनि गाथा( मुनियों का गान), मुनिये सुते (मुनियों के संबंध में उपदेश) ,उपतिस पसिने(उपतिष्य का प्रश्न), लाघु लोवादे ( राहुल को उपदेश), के बारे में कहा है।

गुहा लेख:-

अशोक के विभिन्न अभिलेख में गुहा लेख का महत्वपूर्ण स्थान है –

यह बिहार में गया के पास बराबर की पहाड़ियों में मिलते हैं

प्रथम गुहा लेख:-

राजा प्रियदर्शी ने अभिषेक के बारहवें वर्ष में न्यग्रोथ गुफा आजीवकों को दी।

द्वितीय गुहा लेख :-

स्खलतित पर्वत पर यह गुहा शासन के बारहवें  वर्ष में आजीवकों को दी गई।

तृतीय गुहा लेख:-

यह  गुफा बाढ़ के पानी से बचने के लिए राजा के अभिषेक के 19 वें वर्ष में आजीवकों को दी गई थी।

अशोक का एक अन्य महत्वपूर्ण शिलालेख कंधार से अप्रैल १९५८(1958)में प्राप्त हुआ है। यह शिलालेख एक विशाल शिला पर शरिकुन नामक स्थान पर प्राप्त हुआ है ।यह द्विभाषी शिलालेख है जिसे ग्रीक और अरामाइक दोनों भाषाओं में लिखा गया है वास्तव में यह शिलालेख ग्रीक भाषा में है परंतु इसका अनुवाद ईरानी भाषा में किया गया है । इस शिलालेख में अशोक ने पशुओं और मनुष्यों के प्रति प्रेम का संदेश दिया है । इस लेख में ग्रीक भाषा की 14 पंक्तियां हैं तथा अरामाईक भाषा की 8 पंक्तियां हैं।

अशोक के विभिन्न अभिलेख अलग अलग स्थानों पर पाए गए हैं।

इस प्रकार सम्राट अशोक ने अपने शिलालेखों, लघु शिलालेखों , स्तंभ लेखों के द्वारा संपूर्ण राज्य की जनता को संदेश देने का प्रयत्न किया तथा जिस धर्म को उसने अनुभव किया और कलिंग युद्ध के पश्चात जिस मानवतावादी विचारधारा की समझ उसके हृदय में प्रकट हुई उसका लाभ उसने अपने संपूर्ण राज्य में अपनी जनता को देने का प्रयास किया ।यद्यपि अशोक बौद्ध हो गया था और उसके विचार बौद्ध धर्म से प्रभावित भी थे परन्तु उसने अपनी जनता को जिस धर्म के पालन का उपदेश दिया वह शुद्ध मानव धर्म था। अशोक के शिलालेख उसके राज्य के सीमावर्ती क्षेत्रों व राज्य के अन्य विभिन्न स्थानों पर स्थापित किए गए थे।

इसे भी देखें:-

अशोक के लेख (विकिपीडिया)

अशोक महान

मौर्य कालीन सभ्यता संस्कृति

चंद्रगुप्त मौर्य

अशोक के बाद मौर्यवंश

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